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इस त्रासदी के लिए जिम्मेवार कौन



इस त्रासदी के लिए जिम्मेवार कौन

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चेन्नई में जल प्लावन के परिदृश्य ने पूरे देश को हिला दिया है। स्थिति देखिए। सरकारी रिकॉर्ड में 269 लोगों के मरने की सूचना आ चुकी है। यह जानकारी संसद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दी, इसलिए इस पर यकीन न करने का कोई कारण नहीं है। एक शहर में इतने लोगों का बारिश और बाढ़ से काल-कवलित हो जाना सामान्य मानवीय क्षति नहीं है। वैसे इसे हम अंतिम संख्या नहीं मान सकते। इसका बढ़ना निश्चित है। हजारों लोग भारी बारिश और बाढ़ के कारण बीमार तथा घायल हैं। अस्पताल मरीजों से भर गए हैं तो कुछ का अस्पताल पहुंचना मुश्किल है। अस्पतालों की भी स्थिति बुरी है। अनेक अस्पताल स्वयं बाढ़ के शिकार हैं। चेन्नई हवाई अड्डे पर पानी भरने से पिछले कई दिनों से सारी उड़ानें रद्द हैं। रेलवे स्टेशन भी पानी में डूबा है और कोई रेल आने-जाने की स्थिति नहीं। फंसे पड़े यात्रियों की स्थितियों का अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं। चारों तरफ से सड़क यातायात बाधित हो चुका है जिससे चेन्नई पहुंचना या वहां से निकला कठिन है।

तमिलनाडु सरकार ने अब तक 8,481 करोड़ रुपए का नुकसान होने की बात कही है। एक चौथाई मोबाइल और इससे ज्यादा संख्या मेंं आम टेलीफोन ठप हैं। सरकारी व निजी कार्यालय बंद हैं। कारखाने, वर्कशॉप सब ठप पड़े हैं। एसोचैम ने कारोबारियों के कम से कम पंद्रह हजार करोड़ रुपए के नुकसान का आरंभिक आकलन किया है। स्थिति का अंदाजा इससे भी लगाइए कि डेढ़ सौ वर्षों मेंं पहली बार ‘द हिंदू’ अखबार का चेन्नई संस्करण प्रकाशित न हो सका।

ऐसा नहीं है कि लोगों को पूरी तरह उनके हवाले छोड़ दिया गया है और सरकारें कुछ नहीं कर रहीं। चार सौ बत्तीस राहत-शिविरों में कम से एक लाख लोग पहुंचाए जा चुके हैं। केंद्र ने तत्काल सहायता के रूप में तमिलनाडु को 940.92 करोड़ रुपए प्रदान कर दिया है। इसके अलवा केंद्रीय सहायता कोष का 529.92 करोड़ तथा राज्य आपदा राहत कोष का 139 करोड़ रुपए भी जारी किया जा चुका है। आंध्र के लिए 330 करोड़ की सहायता दी गई है। एनडीआरएफ की तीस टीमें चेन्नई में लगी हैं जिनमें 1014 जवान तथा 110 नावें हैं। सेना के तैंतालीस सौ से ज्यादा जवान राहत और बचाव के काम में लगे हैं। इसके अलावा नौसेना, वायुसेना, तटरक्षक बल, उनके विमान, हेलिकॉप्टर आदि जो भी संभव है सब लगाया गया है। लेकिन इस विभीषिका के सामने सारे प्रबंधन कमजोर पड़ रहे हैं।

जो दृश्य हमारे सामने हैं वे हाहाकार के ही हैं। करीब नब्बे लाख आबादी के शहर में अगर साठ प्रतिशत से ज्यादा लोग पानी से घिर चुके हों तो उनको वहां से निकालना, उन तक राहत पहुंचाना, उनमें से बीमारों को बचाना, मृतकों का अंतिम संस्कार करना…गर्भवती महिलाओं को अस्तपाल पहुंचाना, नवजात शिशुआेंं और अन्य बच्चों को रहने और पोषण की समुचित व्यवस्था करना आदि दुष्कर होता है।

वास्तव में जब हम पूरी भयावहता पर समग्रता में विचार करते हैं तो पहला निष्कर्ष यही आता है कि मनुष्य चाहे जितनी प्रगति का दावा करे, प्रकृति को जीतने का दम भरे, प्रकृति की विभीषिका के सामने उसके सारे दावे, सारे विकसित ढांचे बेकार साबित होते हैं। केंद्रीय नागर विमानन मंत्री गजपति राजू से जब विमानों की उड़ान और वहां फंसे यात्रियों के बारे में पूछा गया तो उनका उत्तर था हम अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हम असहाय हैं। यह केवल भारत की स्थिति नहीं है। ज्यादा पीछे न लौटिए और हाल में हुए दुनिया भर के प्राकृतिक प्रकोपों पर ही नजर दौड़ा लीजिए, आपको यकीन हो जाएगा कि प्रकृति की विकरालता के सामने हम कितने विवश हैं। ऐसा लगता है हमारे वश में कुछ है तो उसकी विकरालता से हुई परिणतियों को झेलना, उस दौरान और परवर्ती राहत, बचाव तथा पुनर्निर्माण का प्रबंधन आदि। चाहे भूकम्प हो, अतिवृष्टि हो, बड़े तूफान या समुद्री ज्वार हो, बाढ़, ज्वालामुखी, सुनामी हो…मनुष्य की सारी व्यवस्था मानो क्षण भर में विफल हो जाती है। हम अंतत: प्रकृति के सामने बेबस, लाचार होकर उससे कृपा करने की उम्मीद करने लगते हैं। बड़े से बड़े नास्तिक को भी ऐसी विकट स्थितियों में ईश्वर का नाम लेते देखा जा सकता है। इसके आधार पर कह सकते हैं कि प्रकृति के ऐसे कहर से निपटना आसान नहीं।

इसे आगे बढ़ाएं तो तमिलनाडु और चेन्नई के संदर्भ में कहा जा सकता है कि अगर बारिश का सौ वर्षों का रिकॉर्ड टूटेगा तो फिर कोई क्या कर सकता है। मौसम विभाग के अनुसार 1 दिसंबर की मध्यरात्रि तक चेन्नई में 119.73 सेंटीमीटर बारिश हो चुकी थी। पिछला रिकॉर्ड 1918 में 108.8 सेंटीमीटर बारिश का था। इससे पहले एक सदी में चेन्नई में इतनी बारिश नहीं हुई थी। हालांकि वर्ष 1943 से 1951 के बीच का रिकॉर्ड मौजूद नहीं है क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध की वजह से नुंगबक्कम निगरानी केंद्र बंद कर दिया गया था। लेकिन आम सूचना यही है। पहले नौ नवंबर से तेरह नवंबर तक हुई बारिश की वजह से ही चेन्नई में बाढ़ की स्थिति पैदा हुई। दूसरे चक्र में सत्रह नवंबर तक वहां बाढ़ ने विकराल रूप धारण करना आरंभ कर दिया। उसमें थोड़ी कमी आई नहीं कि तीसरे चक्र में उनतीस नवंबर को बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के कारण जो लगातार बारिश शुरू हुई उससे शहर ही जलमग्न हो गया। चेन्नई और मदुरै को जोड़ने वाली ग्रांड सदर्न ट्रंक रोड, ओल्ड महाबलीपुरम रोड और ईस्ट कोस्टल रोड का बड़ा हिस्सा बारिश में बह गया है। कुल मिला कर कहने का तात्पर्य यह कि सड़क मार्ग, रेल मार्ग और नागरिक वायु मार्ग से रसद सहित आवश्यक वस्तुओं आदि का वहां पहुंचना असंभव है।

हालांकि संकट तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। लगभग उसकी तरह ही केंद्रशासित प्रदेश पुदुच्चेरी और पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में भी भारी बारिश हो रही है। पुदुच्चेरी में भी दो लोगों के मरने की सूचना है तथा राहत-शिविर लगाए गए हैं। आंध्र प्रदेश में भी चौवन लोग मारे गए हैं और चित्तूर, नेल्लूर तथा अन्य जिलों में भारी वर्षा के कारण सामान्य जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। उनके लिए भी राहत और बचाव की व्यवस्थाएं की जा रही हैं। लेकिन चेन्नई की भयावहता सबसे अलग है। अभी तो राहत और बचाव में समस्या है। जब बाढ़ खत्म होगी तो पुनर्निर्माण की समस्या खड़ी होगी। हजारों की संख्या में घर, दुकानें सब नष्ट हो चुके होंगे, सड़कें टूटी हुई मिलेंगी। गांवों तक इसका प्रकोप दिख रहा है और कहा जा रहा है कि किसानों की खड़ी फसलें भी बरबाद हो गई हैं। उनको मदद देकर फिर से खेती करने के लिए तैयार करना होगा। सबसे बढ़ कर जो लोग मारे गए वे अगर परिवार की आय के स्रोत हों या भविष्य में स्रोत होने वाले रहे हों, तो उनका क्या होगा जो उन पर आश्रित थे या भविष्य में आश्रित होते। जो घायल हुए वे अगर विकलांग हो जाते हैं तो उनकी जिंदगी कैसे चलेगी।

इन सबको एक साथ मिला कर देखें तो पता चलेगा कि यह कितनी बड़ी विपत्ति है। हां, जिस ढंग से आम लोगों ने इस विपत्ति में जज्बा दिखाया है उससे लगता है कि सरकार का हाथ उनके सिर पर हो तो वे इससे निपट लेंगे। इस दौरान लोगों ने सोशल मीडिया पर अपने पते देकर बताया कि हमारा घर, कार्यालय, सुरक्षित है, आप हमारे यहां आ सकते हैं, इतने लोगों को रखने और खाने-पीने की व्यवस्था हमसे हो सकती है। लोग पते और फोन नंबर डालते रहे। लोगों को बचाने में भी समाज की सामूहिक भूमिका प्रेरक रही है। यह ऐसी ताकत है जिसका सरकारें उपयोग करें तो काफी कुछ हो सकता है।

लेकिन सवाल है कि क्या हम पूरी तरह इसे प्रकृति का प्रकोप कह कर अपने दोषों से पल्ला झाड़ सकते हैं? इसका उत्तर है, नहीं। आखिर समुद्र के पास बसने वाले शहर में बारिश का पानी इस तरह रुका क्यों है? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर तलाशेंगे तो हम स्वयं अपने खलनायक नजर आएंगे। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु के अधिकारियों का एक बयान आया है कि कांचीपुरम का पानी नदी और नहरों के जरिए शहर में घुस रहा है। इसकी वजह से हालात और बिगड़ रहे हैं। क्यों घुस रहा है? आपने उसे रोकने के लिए कौन-से इंतजाम किए हैं? शहर की जल निकासी व्यवस्था कहां है? चेन्नई की झीलों की यह दुर्दशा क्यों है? झील के चारों ओर अवैध मकान कैसे बन गए? दलदली जगहों को बिल्डरों ने कैसे महानगरपालिका की अनुमति से विशालकाय भवन खड़ा कर रिहायशी और बाजारी इलाकों में बदल दिया?

वास्तव में चेन्नई को बेईमान नेताओं, अधिकारियों, बिल्डरों की मिलीभगत ने बरबाद कर दिया है। जल निकासी तंत्र ध्वस्त है, शहर के अंदर के तालाब, झील और नहर, जो पानी जमा करने की क्षमता रखते थे, नाममात्र के रह गए हैं। अगर ऐसा न होता तो भारी बारिश से क्षति तो होती लेकिन ऐसी जलप्लावन की भयावह स्थिति कतई पैदा नहीं हो सकती थी। जाहिर है, चेन्नई का जल प्लावन हमारे लिए सबक बनना चाहिए ताकि हम अंधाधुंध, अनियोजित शहरीकरण की प्रवृत्ति को नियंत्रित कर भावी विनाशलीला से स्वयं को बचा सकें।
(अवधेश कुमार)


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