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जानिए कैसे लेते हैं अपना बीमा क्लेम



जानिए कैसे लेते हैं अपना बीमा क्लेम

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डेस्क -इनश्योरेन्स लोग कराते हैं सुविधा के लिए और बदकिस्मती से अगर कोई हादसा हो जाए तो उसे कवर करने के लिए इनश्योरेन्स अपनाया जाता है लेकिन दिक्कतें तब और बढ़ जाती है जब कलम मिलने में मुश्किल होने लगती है क्योंकि अपनी दिक्कतों को कम करने के लिये पैसे देते हैं जो नहीं चाहते कि कभी भी आपके जीवन में हो। प्रीमियम इस आधार पर तय किया जाता है कि उस घटना के घटने की आशंका कितनी है। आशंका जितनी अधिक होगी, प्रीमियम भी उतना ही अधिक होगा। कार का इंश्योरेंस कार की कीमत के 3 फीसदी के करीब होता है जबकि घर का सिर्फ आधा फीसदी।



हम में से ज्यादातर के पास कोई ना कोई इंश्योरेंस पॉलिसी जरूर है लेकिन बहुत ही कम लोगों को यह जानकारी होती है कि क्लेम कैसे फाइल किया जाता है। यदि कोई घटना हो जाये तो मन तो बेचैन होता ही है, वित्तीय परेशानी भी आ जाती है। ऐसे में यदि हमें सही समय पर क्लेम नहीं मिले तो इंश्योरेंस कम्पनी को दोषी ठहराने लगते हैं-पैसे लेने के समय तो आ जाते हो और पैसे देने के समय रुलाते हो।



ध्यान रहे बीमा कम्पनियों का काम क्लेम मंजूर करना है और
आईआरडीए यानि बीमा नियामक ने क्लेम के निपटारे के लिये कड़े दिशा निर्देश तय कर रखे हैं। बहुत से ऐसे मामले जो निपटारे की प्रक्रिया में लम्बित हैं, उनमें बीमित या बीमित की जगह क्लेम दाखिल करने वाला व्यक्ति क्लेम सैटलमेंट की प्रक्रिया का पालन नहीं कर पाता। क्लेम लेने के लिये तयशुदा नियम और शर्तों का पालन करना बहुत जरूरी है। ये नियम इसलिये ऐसे बनाये गये हैं ताकि कोई इसका अनावश्यक फायदा नहीं उठा पाये और फर्जी क्लेम नहीं ले सके। यदि कम्पनियां फर्जी क्लेम पास करती रहीं तो बीमा की लागत बहुत बढ़ जायेगी और इतनी बढ़ेगी कि बीमा का जो पूरा कॉन्सेप्ट है, वो ही बेकार साबित हो जायेगा।



बेहतर है कि क्लेम लेने की नौबत आने से क्लेम सैटलमेंट
प्रक्रिया की पूरी जानकारी ले ली जाये। समय पर क्लेम सैटल
होना कम्पनी और पॉलिसी धारक दोनों के लिये बेहतर रहता है।
पर्सनल फायनेन्स गाइड में हम विभिन्न तरह की बीमा पॉलिसियों की क्लेम सैटल करने की प्रक्रिया को समझने की कोशिश करेंगे।



1. जीवन बीमा: कोई नजदीकी अचानक चला गया तो जीवन में
उथल-पुथल मच जाती है। मानवीय सम्बंधों को हुये नुकसान
की भरपाई नहीं की जा सकती बल्कि लेकिन जो जीवित हैं
उनकी वित्तीय चिंतायें जीवन बीमा से दूर हो सकती हैं। जीवन
बीमा कम्पनियों की क्लेम निपटाने की प्रक्रिया इस प्रकार है।



अ. सबसे पहले जीवन बीमा कम्पनी को सूचना देना बहुत जरूरी है।
इसके लिये कम्पनी को लिखित प्रार्थना पत्र देकर सूचित
किया जा सकता है। कम्पनियों के कॉल सेंटर पर मौखिक
सूचना भी दी जा सकती है। यदि आपका कोई इंश्योरेंस एजेंट है
तो उसे सूचित करना सबसे अच्छा रहेगा।



ब. डेथ सर्टिफिकेट यानि मृत्यु प्रमाण पत्र अनिवार्य है। यदि मौत
स्वास्थ्य के कारणों से हुई है तो हॉस्पिटल की डिस्चार्ज
समरी या फिर जिस डॉक्टर ने उपचार किया, उसका सर्टिफिकेट
होना जरूरी है। यदि मृत्यु हादसे में हुई है या बीमित ने
आत्महत्या की है तो एफआईआर की कॉपी, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट
आदि की जरूरत होगी।



स. इंश्योरेंस पॉलिसी की ऑरिजनल कॉपी पेश करनी होगी।
द. नोमिनी यानि नामित का सत्यापन कम्पनी करेगी और इसके लिये पहचान पत्र आदि के साथ ही उस बैंक खाते की जानकारी भी देनी होगी जिसमें क्लेम की राशि को जमा कराया जायेगा।



सामान्यत: इन औपचारिकताओं को पूरा करने के साथ
ही बीमा कम्पनी क्लेम का निपटारा कर देती है लेकिन यदि क्लेम पॉलिसी शुरू होने के कुछ समय बाद ही दायर कर दिया गया है या मामला संदिग्ध नजर आता है तो बीमा कम्पनी अन्य
जानकारियां भी मांग सकती है। यहां तक कि बीमा कम्पनी दावे
की सच्चाई का पता लगाने के लिये जांच टीम भी नियुक्त कर
सकती है। सभी औपचारिकतायें पूरी होने के 30 दिनों के भीतर दावे का निपटारा करने के लिये बीमा कम्पनी बाध्य होती है। कुछ मामले ऐसे भी होते हैं जिनमें औपचारिकतायें अलग होती हैं। जैसे कि बीमित की विदेश में मौत हो जाये या फिर बीमित लम्बे समय से लापता है। विदेश में मौत के मामले में मूल औपचारिकतायें तो पहले जैसी ही होती हैं लेकिन इनके अलावा भी कुछ दस्तावेजों की जरूरत होती है। बीमा कम्पनी भारतीय दूतावास द्वारा प्रमाणित मृत्यु प्रमाण पत्र के साथ ही अस्थियों को वापस लाने के लिये जारी किये जाने वाले प्रमाण पत्र की मांग करती हैं। ऐसे दावों के साथपासपोर्ट की कॉपी भी लगानी होती है।
Courtesy shabd

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