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अब मोदी विरोध की तराजू पर सेना

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सियाराम पांडेय ‘शांत’सेना सुरक्षा के लिए होती है, राजनीति के लिए नहीं लेकिन इन दिनों जिस तरह सेना को बात-बेबात  राजनीति का विषय बनाया जा रहा है, उसे किसी भी लिहाज से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह सच है कि केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच सांप-सीढ़ी का खेल चल रहा है। विपक्ष केंद्र सरकार को घेरने के लिए रोज ही व्यूह रचना कर रहा है लेकिन इन सबके बीच सेना को ‘अभिमन्यु’ बनाना और उसे आरोपों-प्रत्यारोपों की बलिवेदी पर चढ़ाना, मोदी विरोध की तराजू पर सेना को तौलना कितना उचित है। विपक्ष कई बार नवमुद्रित दो हजार और पांच सौ की  नोट में चिप होने के भी शोशे उछालता रहा है। अफवाहों की तलवारें भांजकर देश की जनता के आक्रोश का पारा चढ़ाने और केंद्र सरकार की शहादत सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती रही है। विपक्ष को इतना तो पता है कि झूठ बिना पांव के भी तेजी से दौड़ता है और जब तक उसकी पोल खुलती है तब तक वह अपने लक्ष्य प्राप्ति में बहुत हद तक सफल भी हो जाता है। झूठ कभी सच तो नहीं हो सकता लेकिन एक ही झूठ जब कई बार अलग-अलग लोग बोलें  तो उसके सच होने का भान तो होता ही है। ऐसे में कई बार लक्षित व्यक्ति अपनी सफाई तक नहीं दे पाता।  नोटबंदी के मुद्दे पर मुंह की खा चुका विपक्ष अब तरह-तरह के प्रयोग कर रहा है। सरकार को नीचा दिखाने के लिए वह अफवाहों की तलवार पर विरोध की धार चढ़ा रहा है। पश्चिम बंगाल में सेना की मौजूदगी के मामले में विपक्ष ने जिस तरह केन्द्र सरकार पर जोरदार हमला बोला, उससे उसकी एकजुटता और तैयारी का पता चलता है। कभी संसद सार्थक विरोध का मंच हुआ करती थी लेकिन अब विरोध केवल विरोध के लिए हो रहा है। तृणमूल कांग्रेस, बसपा और कांग्रेस ने लोकसभा और राज्यसभा में पश्चिम बंगाल में सेना की कथित तैनाती के मुद्दे को उठाया। पश्चिम बंगाल के कुछ टोल प्लाजा पर सेना का अभ्यास ममता बनर्जी को काफी नागवार गुजरा हैै। उन्होंने इसकी तुलना आपातकाल और सैन्य तख्ता पलट से की है। नोटबंदी के खिलाफ वे नरेंद्र मोदी के खिलाफ देश भर में मुहिम चला रही है। दो दिन पहले ही उन्होंने मोदी को देश की राजनीति से बाहर करने का संकल्प व्यक्त किया है तो क्या यह समझा जाना चाहिए कि पश्चिम बंगाल में सेना की तैनाती का जिन्न उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा के इसी बोतल से निकाला है। टीएमसी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल सचिवालय से इजाजत लिए बिना ही  विद्यासागर टोल नाकों समेत राज्यभर के 90 जगहों पर सेना की तैनाती कर दी गई। यह अलग बात है कि सरकार ने इसे रूटीन अभ्यास करार दिया है लेकिन  विपक्ष का आरोप है कि टोल कलेक्शन के लिए सेना का इस्तेमाल क्यों किया गया? सेना पर अवैध वसूली का आरोप लगाना उसे लुटेरा साबित करना है और निश्चित तौर पर इससे सेना का मनोबल गिरता है। आरोप लगाना आसान है लेकिन उसे प्रमाणित करना बेहद कठिन। तृणमूल कांग्रेस इस दावे में दम है कि इस अभ्यास के बारे में रक्षा मंत्रालय राज्य सरकार को बता सकती थी। सेना भी कह रही है कि यह रूटीन अभ्यास है। इइसकी जानकारी वह राज्य सरकार को दे चुकी है। अगर ऐसा है तो क्या ममता बनर्जी के लिए अलग नियम बनना चाहिए। सेना अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय समेत सभी उत्तर पूर्वी राज्यों में इस तरह का अभ्यास कर रही है। सेना की मानें तो बात यही खत्म हो जाती लेकिन विपक्ष सेना को भी अपनी राजनीति का मोहरा बना रहा है। एक ओर तो वह सेना के सम्मान का दावा कर रहा है, वहीं उस पर टोल नाकों पर वसूली करने के भी आरोप लगा रहा है। सम्मान और आरोप की दो तलवारें एक म्यान में तो नहीं रखी जा सकतीं। विपक्ष की इस राय में दम है कि पश्चिम बंगाल उत्तर पूर्व राज्य का हिस्सा नहीं है। फिर वहां सैन्याभ्यास क्यों। पश्चिम बंगाल के लोगों ने आजादी की जंग लड़ी। अब उसी बंगाल की जनता मोदी के खिलाफ सड़क पर उतरेगी। इन नेताओं को यह कौन समझाए कि अंग्रेजों का भारत में प्रवेश बंगाल से ही हुआ था। गुलामी के प्रथम दस्तावेज इसी भूमि पर लिखे गए थे। हाल के वर्षों में हुई मुर्शिदाबाद की आतंकी घटना ममता बनर्जी के ही कार्यकाल में हुई थी। पश्चिम बंगाल जिस तरह से आतंकवादी गतिविधियों का केंद्र बन रहा है, उसे देखते हुए अगर सेना ने वहां पुलिस के साथ अभ्यास का निर्णय लिया है तो इसमें बुराई क्या है। राज्यसभा में टीएमसी सांसद सुखेन्दु रॉय ने सेना के अभ्यास के मुद्दे को उठाते हुए कहा कि सरकार विपक्ष की आवाज दबाना चाहती है। बंगाल की जनता अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी है और वह मोदी के खिलाफ भी लडे़गी। पहले किसी राज्य में ऐसा नहीं हुआ है। पहले राज्य निरापद थे। आतंकी घटनाएं कम होती थीं। अब क्यों होती हैं तो क्या सेना और सुरक्षा बल को राज्यों की सुरक्षा की चिंता करना बंद कर देना चाहिए।  मोदी के विरोध की इच्छा पाले विपक्ष को यह भी सोचना होगा कि वह सेना का विरोध क्यों कर रही है। यह भी सच है कि पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में टोल प्लाजों पर सैनिकों की मौजूदगी को लेकर तृणमूल कांग्रेस की गंभीर आपत्ति और दावे की पोल खुल गई है। सेना ने सरकार को चिट्ठी लिखकर पहले ही जानकारी दे दी थी। इस संबंध में सेना की ओर से बंगाल सरकार को दिए गए दस्तावेज भी अब सामने आए हैं। इसमें साफ है कि राज्य सरकार और हावड़ा प्रशासन को जानकारी दी गई थी कि सेना की एक्सरसाइज 72 घंटे तक चलेगी।  सेना ने हावड़ा के पुलिस कमिश्नर और परिवहन विभाग के प्रधान सचिव को चिट्ठी भेजकर यह जानकारी पहले ही दे दी थी तो क्या यह समझा जाना चाहिए कि प्रशासन और सेना के बीच तालमेल का अभाव है और यदि ऐसा कुछ है तो इन सबके लिए जिम्मेदार कौन है। सेना भी पश्चिम बंगाल में टोल प्लाजों पर पैसा वसूली के आरोपों को आधारहीन बता रही है। मेजर जनरल सुनील यादव ने तो यहां तक कह दिया है कि  ऐसे अभ्यास हमारे परिचालन उद्देश्यों के लिए किए जाते हैं। आर्मी स्थानीय स्तर पर सालाना डाटा कलेक्शन के लिए ऐसे अभ्यास करती है। इसके तहत सभी उत्तर पूर्वी राज्यों असम, अरुणाचल, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, सिक्किम में डाटा एकत्र किए जाते हैं। केवल भारी वाहनों का डाटा एकत्र किया जाता है। ये हर साल की जाने वाली रुटीन एक्सरसाइज है। मेजर जनरल सुनील यादव ने कहा  है कि यह स्थानीय पुलिस अधिकारियों के साथ समन्वय से अभ्यास किए जा रहे हैं। पहले 27 और 28 नवंबर को अभ्यास की योजना थी। 28 नवंबर को भारत बंद के आह्वान पर कोलकाता पुलिस के विशेष आग्रह पर तारीखें 30 नवंबर से दो दिसंबर बदली गईं थीं। 27 नवंबर को कोलकाता पुलिस के दो निरीक्षकों के साथ टोल प्लाजा पर एक टोही अभियान संचालित किया गया था। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा है कि ममता बनर्जी के आरोपों से उन्हें धक्का लगा है। उन्होंने सेना के इस नियमित अभ्यास पर विवाद खड़ा करना सर्वथा गलत  और राजनीतिक हताशा का परिचायक है तथा इस संबंध में स्थानीय प्रशासन को पूरी जानकारी थी। ममता बनर्जी के मुताबिक मुर्शिदाबाद, जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग, उत्तर 24 परगना, बर्धमान, हावड़ा और हुगली आदि जिलों में सेना के जवानों को तैनात किया गया है। देश में जिस तरह आतंकी हमले हो रहे हैं, उसे देखते हुए क्या इन जिलों में सतर्कता नहीं बरती जानी चाहिए। क्या इन जिलों में अलकायदा और इस्लामिक एस्टेट की गतिविधियां बढ़ी नहीं हैं। सेना अगर सुरक्षा कारणों से कुछ डाटा एकत्र कर रही है तो क्या विपक्ष का धर्म नहीं बनता कि वह सेना का सहयोग करे। बसपा प्रमुख मायावती ने तो यहां तक कह दिया है कि मोदी सरकार ममता बनर्जी का दमन कर रही है। नोटबंदी पूरे देश में हुई है, बौखलाहट ममता बनर्जी, राहुल गांधी और मायावती को ही क्यों। इस बात का जवाब भी तो मिलना चाहिए। सेना देश की है, उस पर सवाल उठाना देश पर सवाल उठाना है। क्या विपक्ष इस सामान्य सी बात को समझना पसंद करेगा।

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