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मायावती का दलित-मुस्लिम गठजोड़ और मोदी विरोध



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(सियाराम पांडेय ‘शांत’) राजनीतिक सफलता का आधार है पालेबंदी। किसी का समर्थन किसी का विरोध। बिना इसके राजनीति सधती नहीं। आज का दौर मोदी का है। विरोध का केंद्र हैं नरेंद्र मोदी। उनके विरोध के बिना विपक्ष के रथ का चलना संभव नहीं है। बसपा प्रमुख मायावती भाजपा और खासकर नरेंद्र मोदी के विरोध का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देती। उन्हें प्रदेश में होने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रैलियां विफल ही नजर आती हैंै। अमित शाह के बयान पर एकबारगी वे टिप्पणी न भी करें लेकिन नरेंद्र मोदी के हर कहे का जवाब देने की वे भरपूर कोशिश करती हैं। यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी की वाक्पटुता हर बार उन पर भारी पड़ जाती है। यह सब जानते हुए भी वे अगर मोदी विरोध का परचम लहराए हुए हैं तो इसकी अपनी वजह है। उन्हें पता है कि नरेंद्र मोदी का विरोध ही उन्हें उत्तर प्रदेश में सत्ता दिला सकता है। ब्राह्मण-दलित गठजोड़ के फार्मूले की हांडी एक बार चढ़ चुकी है और काठ की हांडी एक बार ही आग का ताप झेल ले, वही बहुत है। इस हिकमत से मायावती एक बार सत्ता पा चुकी हैं लेकिन इससे उनके परंपरागत दलित वोट बैंक में जो नाराजगी का भाव दिखा, उससे मायावती अंदर तक हिल गई थीं। सर्वसमाज को पार्टी से जोड़ने के चक्कर में वे खुद ही दलितों का विश्वास खोने लगी थीं। दलितों को लग रहा था कि वे ब्राह्मणों पर ज्यादा मेहरबान है जबकि ब्राह्मणों को लगने लगा था कि वे बेकार ही पिसान पोत कर भंडारी बन गए। मतलब वे न तो दलितों को खुश कर पाईं और न ही ब्राह्मणों को। यह अलग बात है कि वे अभी भी सतीश मिश्र के जरिए ब्राहृमणों को लुभाने में जुटी हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह कई ब्राह्मण नेताओं को इअसी साल पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया है, वह भी किसी से छिपा नहीं है। दूध का जली बिल्ली छांछ भी फंूककर पिया करती है। मायावती ब्राह्मणों को ननाराज भी नहीं रहना चाहती लेकिन वह उन पर आंख मूंदकर यकीन भी नहीं कर सकती। उनकी पार्टी का परंपरागत समर्थक दलित है और उसकी खुशी का रास्ता ब्राह्मण विरोध से ही होकर जाता है। राजनीति से जुड़े किसी भी दल के लिए यह मुमकिन तो नहीं कि वह ब्राह्मणों का खुलकर विरोध करे लेकिन मध्य का रास्ता तो निकाला ही जा सकता है।

रही बात मायावती की तो वे इस बार सत्ता प्राप्ति के नई रणनीति पर काम कर रही हैं। किसी अन्य गठजोड़ की बजाय वे मुस्लिम और दलित गठजोड़ को तरजीह दे रही हैं। उन्हें लगता है कि अगर प्रदेश के मुस्लिम उनके साथ आ गए तो 21 प्रतिशत दलित उसमें योग कर उनकी मुरादों को पंख लगा देंगे। कुछ अन्य जातियों के वोट भी उन्हें मिल जाएंगे। इसीलिए वे मुस्लिम समाज को इस बात का विश्वास दिलाने में जुटी हैं कि भाजपा की असल विरोधी बसपा ही है। उसके विजय रथ को रोक पाने में वही सक्षम है। मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी तो भाजपा से मिली हुई है। ऐसे में मुसलमानों का सपा के साथ जाना अपना वोट जाया करने जैसा है। इस तरह के बयान वे अक्सर देती भी रही हैं। भाजपा के तीन तलाक वाले स्टैंड, सर्वोच्च न्यायालय और यूपी हाईकोर्ट के नजरिए पर भी मायावती ने सायास चुप्पी साध रखी है क्योंकि यह बेहद संवेदनशील मामला है और इस पर बोलना बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा है। मुस्लिम आधी आबादी का हमदर्द होने का खिताब भाजपा पहले ही अपने नाम कर चुकी है। यह अलग बात है कि चुनाव में उसे इसका कितना लाभ मिलेगा लेकिन मुस्लिम महिलाओं का भाजपा के प्रति आकर्षण तो बढ़ा ही है। इस बात को मुस्लिम समाज भी समझता है। अगर मुस्लिम महिलाओं ने भाजपा में रुचि दिखाई तो यूपी ही नहीं, कई राज्यों में विपक्ष की नैया डगमगा सकती है।

मायावती इस बात को बेहतर जानती हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले 25 सालों में दो ही पार्टियां सत्ता पर काबिज रही हैं। कभी बहुजन समाज पार्टी तो कभी समाजवादी पार्टी। भाजपा और कांग्रेस प्रदेश यहां सत्तासीन होने की हर चुनाव में जद्दोजहद करती रही हैं, लेकिन उन्हें हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी है लेकिन इस बार गणित बदला हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और हजार की पुरानी नोटों का चलन रोककर बसपा और सपा दोनों ही दलों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है।

ऐसे में बसपा प्रमुख मायावती के लिए मिशन 2017 के मद्देनजर सोशल इंजीनियरिंग का नया फार्मूला तैयार करने के सिवा कोई चारा भी नहीं है।. मायावती इस बार दलितों और मुस्लिमों को एकजुट कर सत्ता में काबिज होने की कोशिश में हैं। मायावती को लगता है कि अगर 21 प्रतिशत दलित और 19 प्रतिशत मुस्लिम एक साथ आ गए तो 40 प्रतिशत वोट के साथ उन्हें एक बार फिर सत्ता में काबिज होने से कोई नहीं रोक सकता। यही वजह है कि वे लगातार प्रधानमंत्री मोदी पर हमलावर हो रही हैं। उन्हें यकीन है कि पीएम मोदी पर हमला कर वे मुस्लिमों को अपने पाले में कर सकती हैं। वे सपा के यादव-मुस्लिम समीकरण में सेंध लगाने की पक्षधर हैं। शायद इसीलिए बार-बार मुलायम कुनबे में मची रार का हवाला देकर मुसलमानों को आगाह कर रही हैं। उनके लिए चिंता का सबब यह भी है कि सपा ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की इच्छा के विपरीत जिस तरह से बाहुबली मुस्लिमों अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी के भाई को अपना प्रत्याशी बनाया है। इसका असर मुस्लिम मतों के विभाजन के रूप में सामने आ सकता है। नसीमुद्दीन अंसारी के भाई को टिकट देकर सपा ने एक तरह से मुसलमानों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि बसपा के मुस्लिम नेताओं की अपने परिवार में ही नहीं चलती, वे मुसलमानों का भला क्या करेंगे। 12 दिसंबर को ही सपा ने जो सात प्रत्याशी बदले हैं, उनकी जगह दो मुस्लिमों, दो दलितों और एक पासी उम्मीदवार को शामिल कर बसपा के मुस्लिम दलित गठजोड़ को कमजोर करने का भरसक प्रयास किया है। ऐसे में मुस्लिमों का एकतरफा विश्वास हासिल करना मायावती के लिए मुश्किल तो है ही।

सात पन्नों की फैसला आप पर नामक किताब मुस्लिम बस्तियों में बांटकर मायावती यह पूछ रही हैं कि ‘मुस्लिमों का सच्चा हितैषी कौन? इस पुस्तक में दरअसल मायावती ने तीन अहम संदेश दिए हैं। किताब के पहले ही पन्ने पर मायावती ने कहा है कि समय-समय पर भाजपा सरकार उन्हीं के दल ने गिराई है। उनका इशारा 1999 में एक वोट से अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को गिराने की ओर है। इस किताब में यह साबित करने की पुरजोर कोशिश है कि बसपा ही भाजपा की जानी दुश्मन है। मुलायम सिंह यादव तो भाजपा से मिले हुए हैं। मुलायम के लिए मुसलमान केवल उनके राजनीतिक मोहरे हैं। अखिलेश राज में 400 से ज्यादा दंगों का आरोप लगाकर उन्होंने मुसलमानों का मानस बदलने की चाल चली है। मुजफ्फरनगर दंगों के कुछ ही दिनों बाद राहत शिविरों पर बुल्डोजर चलवाने का हवाला देकर उन्होंने यह खुलासा भी किया है कि सपा को मुस्लिमों से कोई प्रेम नहीं है। अंत में मायावती ने कहा है कि बसपा ने हमेशा भाजपा के लिए कब्र खोदी है। उसके साथ मिलकर उन्होंने सरकार जरूर बनाई लेकिन कभी भी भाजपा या संघ के एजेंडे को लागू नहीं होने दिया। मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए मायावती जहां ज्यादा से ज्यादा टिकट मुस्लिमों को दे रही हैं, वहीं पार्टी के मुस्लिम नेताओं नसीमुद्दीन सिद्दीकी, नौशाद अली, मोहम्मद अतहर खान, शमसुद्दीन और मुमताज बीवी को मुस्लिमों तक पार्टी की रीति-नीति बताने के काम पर लगा दिया है।

अब मुसलमानों को ही तय करना है कि उनका असल रहनुमा कौन है। क्या भाजपा का खौफ दिखाकर कुछ राजनीतिक दल उसका वोट पाना चाहते हैं या वे वाकई उनके बारे में सोचते भी हैं। दलितों के साथ भी कमोवेश यही बात है। सभी राजनीतिक दल दलितों के हित की बात करते हैं। कुछ के नेता उनके घर जाकर उनके साथ भोजन भी कर आते हैं लेकिन दलितों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। इधर सभी राजनीतिक दल अंबेडकर प्रेमी हो गए हैं। जब मोदी ने उनकी जन्मस्थली में कार्यक्रम में भाग लिया, बनारस में रैदास मंदिर जाकर लंगर छका तब भी मायावती भड़की थी और जब अखिलेश यादव ने हाल ही में अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया तब भी वे उन पर भड़कीं। लगता है कि दलितों और अंबेडकर पर उनका और उनके दल का ही काॅपीराइट है लेकिन इसके बाद भी दलितों का अगर विकास नहीं हो रहा है तो फिर इसके लिए कौन जिम्मेदार है। किसी से भी वोट लेना आसान है लेकिन उनके हितों की कसौटी पर कौन उतरेगा, मौजूदा समय इस सवाल का जवाब तो चाहता ही है।

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