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जिस बारादरी में आती थी केवड़े की खुशबू क्या हो गया उसका हाल

aapkikhabar डेस्क - स्वर्ग की अनभूति कराने वाले ऐतिहासिक बारादरी पर मंडरा रहा है वीरानगी का सायासींढ़ियों से जुड़े कोंडर झील पर अब नही है प्रवासी पंक्षियों की किलकारियाँनवाब आसफुद्दौला ने 1775 ई0 में कराया था निर्माणगोण्डा स्वर्ग की अनुभूति कराने वाला ऐतिहासिक बारादरी व उसके सीडिंयों को छू कर कलकल बहती कोंडर झील जहां हजारों पंक्षी प्रवास करते थे। आज यहाँ वीरानगी का साया दस्तक दे रहा है। आसमा के दामन को छूने वाला बारादरी जहां नवाबी हैसियत पर दाग लगा रहा है वहीं कोंडर झील के निर्मल जल पर जल कुम्भियों का राज है। यहां देख कर ऐसा लगता है कि वक्त के गर्त में उपेक्षा का दंश झेलते हुए ये दोनों एक दूसरे को देख कर यही कह रहे हैं, वकत ने किया क्या हंसी सितम, तुम रहे न तुम हम रहे न हम।ऐतहासिक बारादरी  मुख्यालय गोण्डा से 26 कि.मी. की दूरी पर स्थित कस्बा वजीरगंज से 1 कि.मी. दूर पश्चिम की ओर कोणार्क मुनि के तपोभूमि कोंडर झील के तट पर स्थित है। जिसका निर्माण नवाब आसफुद्दौला ने 1775 ई0 से 1785 ई0 के मध्य जमशेद बाग के रूप में करवाया था। बताते चलें कि उन दिनों यहां मस्जिद, न्यायालय,व अन्य भवन भी निर्मित हुए थे। बावजूद इसके यहां नवाब ने अपने बेगम की याद में एक मकबरा भी बनवाया था, कहा जाता है कि कालान्तर के 1837-1842 के मध्य नवाब अमजद अली शाह ने इन धरोहरों को अपने मंत्री अमीन उद् दौला व मुंशी बकर अली को सौंप दिया। जो वकत के थपेड़ों को सहकर जमींदोज हो गया। अब यहां शेष इमारतें तो नहीं बची मगर नवाबी हैसियत खोकर भी नवाब का ऐतिहासिक बारादरी अतीत की यादों को अपने आगोश में सिमेटे आज भी अपने बदहाली की दास्तां सुना रहा है। और तो और बारादरी के सींढ़ियों को छूकर कलकल बहती कोंडर झील जहां नवाब अपने बेगम के साथ सैर किया करते थे वो गंदगी के अम्बार तले दब कर सिसकियां भर रहा। अवगत हो कि कुछ दिनों पहले सरकार व पुरातत्व विभाग द्वारा इसकी मुरम्मत कर रंग रोगन करवाया गया था बावजूद इसके इस पर बद रंगी का रंग आज भी बरकरार है। इतना ही नहीं अंग्रेजों के युद्ध से निपटने के लिए बारादरी के पूर्व में निर्मित जो बाउंड्री की दीवारे तोप के गोलों को भी सहने की क्षमता रखती थीं,वो आज रख रखाव के आभाव में किसी आइने के भांति टूट कर बिखर रही हैं। जलकुंभियो के आगोश में सिमटता जा रहा है कोंडर झीलमौसम का रंग बदलते ही जहां वजीरगंज के ही आरंगा पर्वती झील पर प्रवासी पंक्षियों ने डेरा डालकर झील का रौनक बढ़ाया है, वहीं स्वर्ग के मंजर को अनुभूति कराने वाले बारादरी के कोंडर झील पर पर जलकुम्भियों का राज है जो चांद पर धब्बा जैसा मालूम होता है। केवड़े के स्थान पर आ रही है शराब की दुर्गन्धबीते दिनों झील के तट पर हमेशा केवड़ों की खुश्बू  आती थी, जो किसी इतर से कम न था, मगर वक्त के साथ साथ महक बदल गयी। उक्त स्थान को आज शराबियों व जुआरियों ने अपना अड्डा बना लिया जहां केवड़े की खुश्बू के स्थान पर शराब की दुर्गन्ध ने अपना स्थान ले लिया है।जो बात इस जगह, वो कहीं पर नहीअवगत हो जब कुछ दिन पहले तत्कालीन डी. एम. ए.के.उपाध्याय सी. डी. ओ.  के साथ यहाँ पहुंचे तो उन्होंने भी दिल को छू लेने वाले इस स्थान का तारीफ किया। पुरातत्व व पर्यटक विभाग की बेरुखी के बावजूद यह ममोहक स्थान हर दिल अजीज है, जहाँ पहुँच कर इंसान स्वर्ग जैसे दृश्यों का अनभूति करता है,और उसे ये मशहूर पंक्तिया याद आ जाती है, दिल कहे रुक जा रे रुक जा, तू यहीं पर कहीं- जो बात इस जगह वो कहीं पर नहीं।

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