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रेल हादसों पर कोहराम आखिर कब तक

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(सियाराम पांडेय ‘शांत’) -पुख्ता सुरक्षा इंतजामात के तमाम दावे के बीच रेल हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। अक्सर कहीं न कहीं रेल हादसे हो रहे हैं। एक्सप्रेस ट्रेनें बेपटरी हो रही हैं। हादसे के समय और स्थान को अपवाद मानें तो घटना की वजह एक जैसी ही होती है। हर रेल दुर्घटना की जांच होती है लेकिन कार्रवाई किस पर होती है, यह देखने-समझने वाली बात है। हादसे यूं ही नहीं हो जाते, उनके अपने कारण होते हैं। कारण छोटे हों या बड़े, जहां कहीं नजर आएं, मौके पर ही उनका निवारण किया जाना चाहिए। फोड़े को नासूर बनने से पहले फोड़ देना चतुराई है। समस्या को जड़ से न मिटा पाना बुराई है। रेल प्रशासन इस तरह की चतुराई आखिर कब दिखाएगा। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी जैसे सूत्र वाक्य जगह-जगह लिख देने भर से समस्या का समाधान नहीं होने वाला। बड़े रेल अधिकारियों पर तो कार्रवाई होती ही नहीं और जिन छोटे कर्मचारियों पर गाज गिरती भी है, उन्हें भी बचाने के मुकम्मल प्रयास किए जाते हैं। शायद यही वजह है कि रेल तंत्र पिछली गलतियों से सबक नहीं लेता। कार्रवाई का भय न हो तो कोई भी अपनी जिम्मेदारी सलीके से नहीं निभाता। गुरुवार को कानपुर के पास रूरा में अजमेर-सियालदाह एक्सप्रेस पटरी से उतर गई। इस हादसे में दो लोगों की मौत हो गई जबकि 80 से अधिक लोग घायल हो गए। इससे पहले 20 नवंबर 2016 को कानपुर के पास पुखरायां में राजेंद्र नगर पटना- इंदौर एक्सप्रेस के कई डिब्बे पटरी से उतर गए थे। इस हादसे में 150 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी जबकि सैकड़ों घायल हो गए थे। एक माह बीतते-बीतते फिर उसी तरह का रेल हादसा समझ से परे है। बार-बार एक ही प्रकृति के हादसों का होना रेल प्रशासन की लापरवाही को ही इंगित करता है। 4 फरवरी 2009 को रेल बजट के दिन हावड़ा से चेन्नई जा रही कोरोमंडल एक्सप्रेस के 14 डिब्बे ओडिशा में जाजपुर रेलवे स्टेशन के पास पटरी से उतर गए थे। इससे हादसे में 16 लोगों की मौत हो गई और 50 घायल हुए थे।. 21 अक्तूबर 2009 को मथुरा के पास गोवा एक्सप्रेस का इंजन मेवाड़ एक्सप्रेस की आखिरी बोगी से टकरा गया था, जिससे इस घटना में 22 लोग मारे गए और 33 यात्री घायल हुए थे। 28 मई 2010 को पश्चिम बंगाल में नक्सली हमले की आशंका जताई गई थी। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतरी। इस हादसे में 170 लोगों की मौत हो गई थी। 9 जुलाई 2010 को पश्चिम बंगाल में उत्तर बंग एक्सप्रेस और वनांचल एक्सप्रेस की टक्कर में 62 लोग मर गए थे। हादसे में 150 से अधिक लोग घायल हुए थे। 20 सितंबर 2010 को शिवपुरी (एमपी) में ग्वालियर इंटरसिटी एक्सप्रेस से मालगाड़ी की टक्कर में 33 लोगों की जान चली गई और 160 से ज्यादा घायल हुए थे। 7 जुलाई 2011 को पटियाली स्टेशन के पास मथुरा-छपरा एक्सप्रेस की बस की टक्कर हुई थी। हादसे में 38 लोगों की मौत हो गई थी। 30 जुलाई 2012 को दिल्ली से चेन्नई जाने वाली तमिलनाडु एक्सप्रेस के एक कोच में नेल्लोर के पास आग लग जाने से 30 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। 19 अगस्त 2013 को राज्यरानी एक्सप्रेस की चपेट में आने से बिहार के खगड़िया जिले में 28 लोगों की मौत हुई थी। 28 दिसंबर 2013 को बेंगलूरु-नांदेड़ एक्सप्रेस ट्रेन के में एयर कंडिशन कोच में आग लगने के कारण 26 लोग की मौत हुई थी। 4 मई 2014 को दिवा सावंतवादी पैसेंजर ट्रेन नागोठाने और रोहा स्टेशन के बीच पटरी से उतरी थी। 20 लोगों की मौत और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गये थे। 20 मार्च, 2015 को देहरादून से वाराणसी जा रही जनता एक्सप्रेस के पटरी से उतरने जाने से 34 लोगों की जान गई थी। सवाल उठता है कि बार-बार ट्रेनें बेपटरी क्यों हो रही हैं। कहीं पटरी टूटी मिलती है तो कहीं कपलिंक खुली मिलती है। नक्सल बहुल क्षेत्रों तो नक्सलवादी अक्सर पटरियों के साथ छेड़छाड़ करते रहते हैं। वे पटरियों और पुलों को उड़ा देते हैं, ऐसी अतिवादी ताकतों को जन-धन के नुकसान की कोई चिंता नहीं होती। लेकिन पुखरायां और रूरा के पास हुए रेल हादसों में पटरियों से छेड़छाड़ के कोई संकेत नहीं मिले हैं। मतलब यह पटरियों की देखरेख में कोताही का मामला है। पिछली बार जब पुखरायां में रेल हादसा हुआ था तो अंगुली पीडब्ल्यूआई की कार्यशैली पर उठी थी और इस विभाग के अधिकारी-कर्मचारी लड़ने पर आमादा हो गए थे। आरोपों-प्रत्यारोपों की बौछार करने और एक दूसरे को दोषी ठहराने से काम नहीं चलेगा। बेहतर तो यह होता कि रेल प्रशासन गलतियों की तह में जाता। एक जैसी गलतियां बार-बार न हो, इसका विचार करता। हादसे होते ही इसलिए हैं कि उनके कारणों के निवारण को नजरंदाज कर दिया जाता है। अगर रेल ट्रैक की नियमित मरम्मत की जाए, उसका निरीक्षण किया जाए ,जैसा कि दावा किया जाता है तो कोई कारण नहीं कि एक भी रेल हादसा हो जाए। रेल प्रशासन यू ंतो अहर्निशं सेवामहे का संकल्प व्यक्त करता है लेकिन जब बात दायित्वों के निर्वहन की आती है तो वह कन्नी काट लेता है। हर रेल हादसे के बाद हताहतों को भारी मुआवजा दिया जाता है। क्या यात्रियों की मौत को मुआवजे की तराजू पर तौला जाना मुफीद है।कब तक रेल प्रशासन मुआवजे की बिना पर यात्रियों के जान-माल से खेलता रहेगा। यह सच है कि हादसों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता लेकिन थोड़ी सावधानी बरत कर हादसों की संख्या, त्वरा और उससे होने वाले नुकसान को तो कम किया ही जा सकता है। हादसे हमें संभलने का मौका देते हैं लेकिन अगर हम संभलना ही न चाहें तो इसमें हादसों का क्या दोष। रेल प्रशासन को सोचना होगा कि रेल हादसे हों ही नहीं। व्यवस्था की हर कड़ी को मजबूत करना होगा। बगैर इस पर ध्यान दिए हादसों की मार से बच पाना मुमकिन नहीं होगा। रेल प्रशासन के पास सबसे अधिक मानव बल है, उसका उसे किस तरह उपयोग करना है। उसका सही उपयोग हो भी रहा है या नहीं, यह तो देखना ही होगा। वैसे रेलवे के बड़े अधिकारी भी इस बात को मानते हैं कि एक तिहाई कर्मचारी अपने काम को जिम्मेदारी से नहीं निभाते। इस प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। हादसे जिस किसी की भी वजह से हों लेकिन जब तक शीर्ष पर बैठे अधिकारियों पर शिकंजा नहीं कसेगा, तब तक नागरिक सुरक्षा और सुविधा में विस्तार की कल्पना भी बेमानी है। अब भी समय है कि तकनीकी और मानवीय कमियों को दूर किया जाए। ऐसा नहीं होगा कि भारतीय रेल निर्दोष नागरिकों की लाशों का दुर्वह बोझ ढोने के लिए अभिशप्त होती रहेगी।

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