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मायावती के लिए विशेष अहमियत नहीं रखते दलित

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(सियाराम पांडेय शांत )


बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के लिए दलित बहुत अहमियत नहीं रखते। चार चरणों में हुए टिकट वितरण से तो यही ध्वनित होता है। इसमें शक नहीं कि दलित -मुस्लिम कार्ड खेलकर मायावती ने भाजपा और सपा की परेशानी बढ़ा दी है। सपा जिस तरह अंतर्कलह के दौर से गुजर रही हैं, उसमें मायावती का 2 3 प्रतिशत मुस्लिम प्रत्याशी उतारना उनकी मंझी हुई सोशल इंजीनियरिंग का ही परिचायक है। वे किसी भी कीमत पर इस चुनाव को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती क्योंकि उन्हें पता है कि अभी है तो कभी नहीं। उनके लिए अब न चूक चौहान वाले हालात हैं। मायावती यह भी जानती हैं कि मुसलमानों का झुकाव उनसे कहीं अधिक मुलायम सिंह यादव की ओर है और इस अवसर पर मुलायम सिंह यादव अपने बेटे और भाई की महत्वाकांक्षाओं के दो पाटन के बीच पिस रहे हैं। मायावती अवसर का लाभ उठाने में सिद्धहस्त तो हैं ही, शायद यही वजह है कि उन्होंने प्रत्याशियों की सूची जारी करने के मामले में भी भाजपा, सपा, कांग्रेस जैसे प्रमुख राजनीतिक दलों को पीछे छोड़ दिया है। पहले मारे सो मीर वाली कहावत तो मशहूर है ही। बाप-बेटे की जंग के द्वंद्व में सपा के मुलायम और अखिलेश गुट के प्रत्याशी जूझ रहे हैं। वे यह तय नहीं कर पा रहे कि उनकी प्रत्याशिता का कोई भविष्य है भी या नहीं। और अगर है भी तो परिवार में सुलह के बाद सबको तो टिकट मिलना नहीं। कुछ के नाम पर पुनर्विचार भी होगा, ऐसे में इंतजार कर लेना ज्यादा मुनासिब है अपनी बेहुरमत कराने के। चुनाव लड़ें या न लड़ें लेकिन जगहंसाई तो नहीं होगी। सच पूछें तो सपा के सभी प्रत्याशी असमंजस में हैं, ऐसे में उनके क्षेत्र में जाने और प्रचार करने का अभी तो सवाल ही नहीं पैदा होता। यह अलग बात है कि मुसलमानों को टिकट देने के मामले में मुलायम और अखिलेश दोनों ही गुटों ने पूरी उदारता बरती है। जिस तरह मायावती दलित-मुस्लिम कार्ड खेल रही हैं, कुछ उसी तरह सपा भी यादव मुस्लिम कार्ड खेलती रही है। उसकी अपनी चुनावी स्ट्रेटजी है। उसकी अपनी सोशल इंजीनियरिंग है। सपा और बसपा दोनों ही की नजर मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में खींचने की है और इस दिशा में दोनों ही अपने स्तर पर कोई कोर-कसर उठा नहीं रखेंगे। हालिया चुनावी सर्वे में भाजपा की जीत के अनुमान से बाकी के दल पहले ही सहमे हुए हैं । मायावती ने इस बार के अपने हर टिकट वितरण में यह साबित करने की कोशिश की है कि उनके लिए दलितों से अधिक अहमियत मुसलमानों की है। वैसे भी मायावती के लिए दलित कभी अहमियत नहीं रखते। यह अलग बात है कि दलितों को सब्जबाग दिखाने में और खुद को दलितों की मसीहा कहलवाने का एक भी मौका वे चूकती नहीं हैं। वर्ष 2007 में जब उन्होंने सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का नारा दिया था। उस समय भी उन्होंने सवर्णों को गले लगा लिया था और एक हालात यह भी बने थे कि मायावती राज में दलित खुद को अछूत समझने लगे थे। जिस बसपा के उत्थान के लिए दलित परिवार हर माह मुट्ठी फंड निकालते हैं , मायावती की रैलियों में जाने और उन्हें जिताने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं , सत्ता के लिए मायावती ने उनकी अनदेखी भी कम नहीं की। जिस तरह पार्टी से सवर्ण और पिछड़े नेताओं का गत दिनों पलायन हुआ। उन्होंने मायावती पर दलित नहीं, दौलत की बेटी होने के आरोप लगाए, उससे तो यही लग रहा था कि मायावती अपनी पूर्व कृत गलतियों से सबक लेंगी और इस बार अपने परंपरागत दलित मतों को तरजीह देंगी। लेकिन जिस तरीके से उन्होंने टिकट वितरण के तराजू पर मुसलमानों का पलड़ा भारी रखा, उससे प्रदेश का दलित मतदाता एक बार फिर खुद को उपेक्षित और असहाय पा रहा है। अगड़े और पिछड़े के चक्कर में बसपा के दलित इस बार फिर गच्चा खा गए। उनसे ज्यादा सीटें तो अगड़े और पिछड़े पा गए। इसमें सन्देह नहीं कि जिस तरह बसपा और सपा का रुझान मुस्लिम मतदाताओं को अपने खेमे में लाने का है, कुछ उसी तरह का उद्योग कांग्रेस भी कर रही है। मुस्लिमों पर किए गए अपने पूर्व उपकारों का वास्ता देकर वह उन्हें कांग्रेस से जुड़ने की नसीहत दे रही है। शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में उतारने के पीछे कांग्रेस की मंशा साफ रही है। उनके परिवार का मुस्लिमों के प्रति लगाव भी कांग्रेस के लिए लाभ प्रद हो सकता था। शीला के ब्राह्मण होने का लाभ कांग्रेस उठाना चाहती है। भाजपा के ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई को हटाकर केशव मौर्य को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपे जाने को भी कांग्रेस ने कभी मुखर मुद्दा बनाया था। लेकिन भाजपा के सामने जब उसकी एक न चली तो कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर सपा से गठबंधन में पार्टी का भविष्य तलाशने लगे और संभव है कि अखिलेश-मुलायम गुट में सुलह के बाद उनकी योजना परवान चढ़ भी जाए। अगर ऐसा होता है तो मुस्लिम मतदाता एकबारगी इस गठबंधन की ओर रुख कर सकते हैं। और यह मायावती के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा। इससे मायावती के भय का आलम यह है कि वे इसमें भी भाजपा की साजिश तलाशने लगी हैं । उन्हें लगता है कि कांग्रेस और सपा का गठबंधन कराकर भाजपा राजनीतिक लाभ लेना चाहती है । वैसे इतना तो तय है ही कि मुस्लिम मतों का विभाजन इस बार सपा और बसपा दोनों के ही बीच होगा। और अगर ऐसा होता है तो इससे भाजपा फायदे में रहेगी। भाजपा के फायरब्रांड नेता सच्चिदानंद हरिसाक्षी महाराज ने आबादी विस्तार में मुस्लिमों की भूमिका को कटघरे में खड़ा कर एक तरह से धु्रवीकरण की राजनीति का बीजारोपण कर दिया है। विपक्ष भले ही भाजपा के फायरब्रांड नेताओं पर निशाना साधे लेकिन सच तो यही है कि जितना ही धु्रवीकरण होगा, भाजपा को उसका लाभ मिलेगा। मायावती ने अगर अखलाक कार्ड खेला है तो इसका मतलब यह हरगिज नहीं कि वह मुसलमानों के प्रति ज्यादा जवाबदेह हैं। सच तो यह है कि वे इस कार्ड के जरिए उन्हें यह संदेश देना चाहती हैं कि बसपा ही उनकी असल हमदर्द पार्टी है। सपा केवल धोखा दे रही है। कुछ इसी तरह का संदेश सपा नेता भी देते रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता से भी राजनीतिक दलों का सहमना स्वाभाविक है। सपा बसपा और कांग्रेस तीनों ही असदुद्दीन ओवैसी को मोदी और भाजपा का एजेंट करार देते रहे हैं। ओवैसी की सभाओं में भीड़ भी कम नहीं हो रही है। यह सच है कि भीड़ वोट का मानक नहीं होती लेकिन वोट इसी भीड़ से आता है, इस सच को भी नकारा नहीं जा सकता। मतलब इतना तो साफ है ही कि मुस्लिम मतदाता एक खेमें में नहीं जाएंगे। थोड़े-थोड़े भी मत बंटे तो इसका कही न कही भाजपा को फायदा जरूर होगा। रही बात दलितों की तो दलितों का रुझान बसपा और मायावती के प्रति हमेशा रहा है। इससे पहले दलित कांग्रेस की रीति-नीति का समर्थन करते थे। लेकिन हाल के दिनों में मायावती ने जिस तरह से दलितों को चुनावी हथियार बनाया है, उससे दलितों का भी उनसे मोहभंग हुआ है। सर्व समाज की नेता बनने के चक्कर में मायावती न दलितों की रहीं और न ही सवर्णों की। स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं के बसपा छोड़ने और भाजपा ज्वाइन करने के बाद मौर्य कोइरी जैसी पिछड़ी जातियों का बसपा से मोहभंग तय है। और भाजपा ने तो अपना प्रदेश अध्यक्ष ही पिछड़े वर्ग का चुन रखा है। ऐसे में पिछड़ों के समर्थन का लाभ उसे मिल सकता है। मायावती के साथ जाटवों का आकर्षण संभव है। लेकिन पासी और अन्य दलित जातियां उनका इस बार साथ देंगी भी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। सपा ने भी इस बार सर्वाधिक दलित प्रत्याशियों पर दांव लगाया है। भाजपा भी दलित प्रत्याशी उतारने के मामले में पीछे नहीं रहने वाली। डा. भीमराव अम्बेडकर की जयंती मनाकर, महू में निर्माण कार्य कराकर और भीम एप बनाकर नरेन्द्र मोदी पहले ही दलितों के बीच अपनी छाप छोड़ चुके हैं। काशी में रैदास मन्दिर में लंगर छक कर भी उन्होंने मायावती की पेशानियों पर बल ला दिए हैं। यही वजह है कि मायावती मोदी के हर कदम का पुरजोर विरोध करती हैं। उन्हें डर है कि कहीं मोदी उनके परंपरागत दलित वोट बैंक में सेंध न लगा दें। सभी दल दलितों पर डोरा डाल रहे हैं, ऐसे में दलितों पर एकतरफा विश्वास मायावती को सत्ता से दूर रख सकता था। इसीलिए उन्होंने मुसलमानों को टिकट वितरण में जरूरत से ज्यादा तरजीह दी। उन्होंने ब्राह्मणों और राजपूतों को भी निराश नहीं किया है लेकिन जिस तरह मुसलमानों को महत्व दिया गया है, उससे बड़ी जातियों का मायावती से बिचकना तय समझा जा रहा है। सत्ता के खेल में ध्रुवीकरण का सर्वप्रथम अध्याय लिखने का काम मायावती ने किया है। सपा की अंदरूनी कलह को भुनाने और सत्ता शीर्ष पर पहुंचने की उनकी बेताबी का आलम यह है कि ज्यादातर मुस्लिम और अगड़े पिछड़े उम्मीदवार उतारकर वे क्या बताना चाहती हैं। देखना यह होगा कि इस बार यादव-मुस्लिम समीकरण चलेगा या यादव-दलित समीकरण। मायावती ने तो इस बार यादवों पर भी कम यकीन नहीं किया है। ऊँट किस करवट बैठेगा, यह देखने वाली बात होगी ।


लेखक वरिष्ठ पत्रकार है 



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