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फलाना ढिमका की कलम से - तरबूज़



फलाना ढिमका की कलम से - तरबूज़

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दौड़ो मत बेटा ..गिर जाओगे , वो भागता जा रहा था पतली सी पगडण्डी पर.. पीछे से मौसी  चिल्ला रही थी ...


ये था गोलू एक मस्त-मौला , शैतान ,शरारती बच्चा जो गर्मियों की छुट्टियों में अपने शहर के आउटर में रहने वाली मौसीके वहाँ जाया करता था। उस समय तो शहर का आउटर मतलब बहुत दूर होता था,,,


उम्र होगी ग्यारह साल पर लम्बाई में ज़्यादा दिखता था ..


मौसी के मकान मुकदमपुर के एक गावं के बाहरी क्षेत्र में था। … उनके मकान का दरवाज़ा  जिस तरफ खुलता था उसतरफ दूर कहीं जंगल शुरू होता दिखता था और जंगल से पहले तरबूज़ की खेती दिखती थी , ऐसा प्रतीत होता था जैसेबहुत सारे सैनिक खेतों में लेट कर अभ्यास कर रहे हो , गोलू अक्सर तरबूज़ खाने के लिए उस तरफ भागता था औरमौसी पीछे पीछे , । वहां लाइट बहुत कम आती थी पर फिर भी गोलू को गर्मी नहीं लगती थी वो जा कर आस पास केपेड़ों के नीचे बैठ जाता था जो मौसी के घर के बगल में थे , कभी कभी तो मौसी दिन में लाइट न आने पर थोड़ी दूरी परजो बहुत हल्बी सा बरगद का पेड़ था वहां बैठ जाती थी  और गोलू भी भाग कर वहीँ आ जाता था , पूरी गर्मी की छुट्टी वोमौसी के साथ लगा रहता था , मौसी गाँव की वैद की तरह थी  किसी की भी गाँव में नाभ उखड़ती थी या बीमार होता था तो उनको ही बुलाया जाता था और गोलू साहब तो मौसी के वैसे ही पिछलग्गू थे लगे रहते थे हर समय साथ में ,, वो जो बहुत हल्बी सा एक बरगद का पेड़ था,सारे गाँववाले उसकी पूजा भी किया करते थे ,,,,, बहुत पुराना और बहुत जड़ीला पेड़ था, जब सूरज उस पेड़ के ऊपर होता था तो मजाल थी सूरज की रोशनी की जो धरती पर पड़ जाए इतना घंना पेड़ था वो , 
वहां पर रात को सब लोग जल्दी 7  बजे ही सोने लगते थे ये देख कर गोलू यही सोचता था की वो कहीं बहुत दूर आता है मौसी के वहां जहाँ लाइट भी बहुत कम आती है और सब लोग जल्दी सो जाते है। रात में जब गोलू सब के साथ छत पर सोता तो सितारों को देख देख उलूल-जलूल सवाल करता था मौसी से ,,,,
रात के बीच में डर कर उठ जाता था जब जब सियार चिल्लाते थे, डर का ये आलम था की आवाज़ से ही उसकी चिरीफटी की जय हो जाती थी हालांकि उसने कभी सियार देखा नहीं था पर मौसी ने उसको डरा रखा था तरह तरह के किस्से सुना कर, क्योंकि गोलू शैतान था और इसी से डरता था ,,पर मौसी फिर भी उसको समझाती थी और कहती थी सो जा वो इधर नहीं आते, कल सुबह तरबूज़ तोड़ने चलेंगे, और वो तरबूज़ के बारे में सोचते सोचते सो जाता था ,
हर सुबह की तरह छत पर ही हल्का उजाले होते ही गाँव के मुर्गे की बांग सबको जगा देती थी ,
फिर गोलू का एक काम होता था हैंडपंप में मग्गे से पानी डाल कर पानी ऊपर खींचना क्योंकि पानी नीचे चला जाता था , गोलू ये काम बड़े मन से करता था पहले हैंडपंप के बाम्बे पर हाथ लगा कर मग्गे से पानी भरता था जब तक पानी मुहाने तक ना भर जाये फिर मुहाना बंद करके हैंडपंप को चलाता था,थोड़ी देर चलाने के बाद पानी ऊपर आने की आवाज़ आने लगती थी और पानी आ जाता था, जैसे ही पानी आता था वो तुरंत टट्टी करने वाले दो लोटे ले कर भर लेता था और मौसी मौसी चिल्लाने लगता था,,, बेचारी मौसी भागते हुए आती,घर में लगे नीम के पेड़ से एक डंठल तोड़ती, उसके दो टुकड़े करती फिर कोमल वाला हिस्से का दातुन उसको देती थी और दूसरा अपने मूहँ में रख लेती थी ,वो एक लोटा मौसी की तरफ बढ़ा देता फिर सामने जंगल की तरफ चल देते दोनों लोग,
दरअसल सियार का डर उसको जंगल की तरफ जाने नहीं देता था अकेले।
जंगल जाते समय पूरे रास्ते मौसी को बोलता की शौचालय बनवा लीजिये वरना में नहीं आऊंगा , लगभग दो-ढाई साल से वो हमेशा यही बोलता था की नहीं आऊंगा पर तरबूज का लालच हर साल उससे ले ही आता था, तरबूज के खेत के बीच से जाती हुई पगडण्डी पर कभी नहीं चलता था हमेशा तरबूज को देखते हुए उनके अगल-बगल से भागता हुआ जंगल जाता था , और लौटते समय मौसी को दिए हुए लोटे के पानी से अपने हाथ में मिट्टी लेकर उससे साफ़ से हाथ धोता और धुलते ही  तरबूज के खेत की तरफ सरपट दौड़ लगा देता था.
पीछे मौसी आगे वो, खेत से कुछ तरबूज़ तोड़ता और फिर वही बरगद के पेड़ के चबूतरे पर बैठ कर अकेले वो सब खाता था.। 
अब सिर्फ वो बरगद का पेड़ ही बचा है जिसने "मेरा" अबतक साथ दिया ,अब उसके आस पास बड़ी बड़ी बिल्डिंगे बन गयी है और अब वो इतना घना भी नहीं रहा,,,,,
इस प्रगति ने सब कुछ छीन लिया वो मिट्टी की खुशबू ,वो सियार ,जंगल, दातून,वो तरबूज के खेत,, अब तो गोलू भी नहीं आता,,,, 

और ये बताते बताते उन बुजुर्ग आँखों से आंसू बह पड़े, "मौसी रो" पड़ी और बोली , 
"कहने को वक़्त ने जख्म भर दिया,
दरअसल परिवर्तन के बुलडोज़र ने सब कुछ दफ़न कर दिया ।"                        


लेखक : फलाना ढिमका 



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