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पहाड़ जैसा आरोप और नन्हा सा जवाब



 पहाड़ जैसा आरोप और नन्हा सा जवाब

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सियाराम पांडेय ‘शांत’

कविवर रहीम ने लिखा है कि ‘रहिमन अंसुआ नयन ढरि जिय दुख प्रकट करेई। जाहि निकारो गेह ते। कस न भेद कहि देई।’ जिस घर से निकाला जाएगा, उससे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह निकालने वाले के पक्ष में ही बोलेगा। दिल्ली के परिवहन मंत्री रहे कपिल मिश्रा ने अरविंद केजरीवाल पर भ्रष्टाचार का पहाड़ जैसा आरोप लगाया। अपने बचाव में केजरीवाल तो आगे आए नहीं लेकिन उनके प्रतिनिधि उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने इस पर महज 40 सेकेंड का नन्हा सा जवाब दिया। कोई संतुष्ट हो या न हो, इससे उन्हें क्या? अरविंद केजरीवाल का इस मुद्दे पर मौनव्रत विस्मयकारी ही है। सिसौदिया कह रहे हैं कि कपिल मिश्रा के आरोप निराधार हैं। उसे कोई मानेगा थोड़े ही। सवाल यह उठता है कि छोटे-छोटे मुद्दों पर बड़ी-बड़ी बात कहने वाले केजरीवाल ने अभी तक इस प्रकरण में अपना पक्ष क्यों नहीं रखा? ‘मौनं स्वीकार लक्षणं।’ जनता इस मौन को उनकी स्वीकारोक्ति न मान बैठे, इस बावत विचार तो होना ही चाहिए। रही बात कपिल मिश्रा की तो वे खुलेआम कह रहे हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है फिर उन्हें मंत्रिमंडल और पार्टी से निकालने की जरूरत क्यों कर पड़ी, केजरीवाल सरकार को यह तो सुसपष्ट करना ही चाहिए। क्या अमानतुल्लाह और कुमार विश्वास की जंग का खामियाजा कपिल मिश्रा को भुगतना पड़ रहा है। कपिल मिश्रा ने अमानतुल्लाह को देश का गद्दार कहा था और उन्हें आप से निकाले जाने की मांग की थी। अमानतुल्लाह को पार्टी से निकाले जाने की मांग करने वाले वे अकेले शख्स नहीं थे। 40 विधायकों ने पार्टी से इस तरह की मांग रखी थी फिर केवल कपिल मिश्रा पर ही कार्रवाई का क्या औचित्य है?

     इसमें शक नहीं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मुसीबतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जिस भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर दिल्ली की जनता ने उन्हें अपरिमित स्नेह दिया था और प्रचंड बहुमत से दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर आसीन किया था, जनता की उन अपेक्षाओं पर अरविंद केजरीवाल खरे नहीं उतरे। ढोल में पोल होती है लेकिन वह दिखती नहीं है। दिखती तब है जब उसका आवरण हट जाए। अरविंद केजरीवाल के व्यक्तित्व और कृतित्व का आवरण लगभग हट गया है। उनके कारनामों की पोल उनके अपने लोग ही खोल रहे हैं। उन्हीं के मंत्री कपिल मिश्रा ने उन पर सत्येंद्र जैन से 2 करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप लगाया है। कपिल मिश्रा का आरोप है कि दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने केजरीवाल के एक रिश्तेदार की 50 करोड़ रुपये के एक जमीन के सौदे में मदद की है। कपिल मिश्रा के इन आरोपों के साथ ही दिल्ली की राजनीति में गरमाहट आ गई है। उन्होंने तो इस मामले की जानकारी दिल्ली के उपराज्यपाल एलजी. अनिल बैजल को भी दे दी है। अरविंद केजरीवाल पर लगे इन आरोपों से उनके राजनीतिक गुरु रहे अन्ना हजारे भी मर्माहत हैं। उन्हें यकीन नहीं हो रहा कि केजरीवाल भ्रष्टाचार के मामले में इस हद तक गिर सकते हैं। उनका मानना है कि अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़कर ही दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं। हालांकि वे यह कहने में भी संकोच नहीं करते कि उनका भरोसा तो उसी दिन टूट गया था जब केजरीवाल के मंत्रियों पर संगीन आरोप लगे और उन्हें अपने पद से इस्तीफा तक देना पड़ा। 

  गौरतलब है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बदौलत ही केजरीवाल जनप्रिय नेता बनकर उभरे थे। जनता के बीच यह संदेश गया था कि अरविंद केजरीवाल कुछ कर सकते हैं।यह अलग बात है कि वे खुद भ्रष्टाचार के कीचड़ में धंसते चले गए। जाहिर तौर पर इसके पीछे लालच ही बहुत हद तक जिम्मेदार थी। जिस समय अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई और दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। अन्ना हजारे ने तो उसी क्षण उनके इस निर्णय का विरोध किया और खुद को केजरीवाल से अलग कर लिया लेकिन ज्यों-ज्यों केजरीवाल सरकार और उनकी पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते गए,अन्ना हजारे दुखी होते रहे। वे कई बार केजरीवाल को आत्ममंथन की सलाह दे चुके हैं लेकिन आत्ममंथन के लिए जिस दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत होती है, उसका केजरीवाल में रंचमात्र अंश भी नहीं देखा गया। जब कभी अरविंद केजरीवाल के विधायकों और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और यौनशोषण के आरोप लगे, अरविंद केजरीवाल ने अपने विधायकों और मंत्रियों का ही पक्ष लिया और केंद्र सरकार पर अपनी सरकार को अकारण परेशान करने का आरोप लगाया। जब उनके प्रमुख सचिव के कार्यालय पर छापे पड़े तब भी उन्होंने इस पूरे प्रकरण को खुद पर हमला माना। 

 कपिल मिश्रा के आरोपों में भी अगर वे भाजपा का षड़यंत्र तलाशें तो शायद यह सब उनके स्वभाव के ही अनुरूप होगा। उन्हें विचार करना होगा कि हाल के दिनों में उनके अपने उनसे फिरंट क्यों होते जा रहे हैं? योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास और अब कपिल मिश्रा। इसमें संदेह नहीं कि अरविंद केजरीवाल का क्रेज आम जनता के बीच घटा है। इसे वे भी बेहतर जानते हैं। गोवा विधानसभा, पंजाब विधानसभा चुनाव और दिल्ली नगर निगम के चुनाव में आम आदमी की करारी हार तो कमोवेश इसी ओर इशारा करती है। कपिल मिश्रा ने खुलकर इस बात को स्वीकार किया है कि उन्होंने सत्येंद्र जैन द्वारा अरविंद केजरीवाल को दो करोड़ रुपये देने की घटना को न केवल खुद देखा है बल्कि यह भी पूछा कि यह रुपये किस लिए हैं। इस घटना के बाद उनका केजरीवाल की ईमानदारी पर से विश्वास उठ गया है। भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष इसे आरोप नहीं, केजरीवाल के खिलाफ खुली गवाही मानते हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अरविंद केजरीवाल से नैतिक आधार पर इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन की बेनामी संपत्ति की जांच की भी मांग की जा रही है। गौरतलब है कि कपिल मिश्रा ही वह शख्स हैं जिसने आप में रहते हुए टैंकर घोटाले का खुलासा किया था। इस बावत  एंटी करप्शन ब्रांच के प्रमुख एमके मीणा से मिलने का समय मांगा था और शीला दीक्षित के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का आग्रह किया था। इस चिट्ठी को लिखने के बाद ही कपिल मिश्रा को केजरीवाल सरकार की कैबिनेट से बाहर कर दिया गया। 

कपिल  मिश्रा की मां अन्नपूर्णा मिश्रा ने कहा कि उनका बेटा लंबे वक्त से संघर्ष के रास्ते पर चल रहा है। कल पता चला कि केजरीवाल ने उसे मंत्री पद से हटा दिया। लेकिन अब मैं चाहती हूं कि वह भाजपा में शामिल हो जाए और जनता की सेवा करे। वे 2012 में भाजपा की ओर से ईस्ट एमसीडी की मेयर रह चुकी हैं। पिछले महीने एमसीडी चुनाव से पहले तक वह भाजपा की पार्षद भी थीं। कहीं इसका यह मतलब तो नहीं कि कपिल मिश्रा की यह सारी कवायद भाजपा में शामिल होने को लेकर है क्योंकि वे भी इस बात को बेहतर जानते हैं कि अरविंद केजरीवाल का चेहरा आम जनता देख चुकी है। उनकी कथनी और करनी का फर्क आम आदमी के समक्ष आ चुका है। काठ की हाड़ी दोबारा आंच बर्दाश्त नहीं करती। इसलिए आप को छोड़ने में ही कल्याण है। हाल ही में अमानतुल्लाह ने आप नेता कुमार विश्वास पर संघ और भाजपा के लिए काम करने का आरोप लगाया था। भले ही इसके लिए उन्होंने माफी मांग ली हो लेकिन इस पूरे प्रकरण को इस पूरे घटनाक्रम से भी जोड़कर देखा जा सकता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो केजरीवाल के बुरे दिन आ चुके हैं। उनके समझदार साथी एक-एककर उनका साथ छोड़ रहे हैं। शाजिया इल्मी पहले ही झाड़ू दोड़ कमल थाम चुकी हैं। केजरीवाल एंड कंपनी को  भली भांति ज्ञात है कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है। उसे पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता। दिल्ली में कई देशों के दूतावास हैं। निर्धारित ढर्रे पर चलने और दिल्ली का विकास करने की बजाय वे मनमानी पर उतर आए हैं और यही परेशानी का सबब भी है। आप में जिस तरह बगावत का माहौल चल रहा है। अगर उसे जल्द थामा न गया तो आप के बिखते देर नहीं लगेगी और यह स्थिति केजरीवाल के लिए बहुत उचित नहीं होगी।  उन्होंने जिस तरह विरोध के कई मोर्चे खोल रखे हैं, उसमें उनका नुकासन ही होना है। फायदा तो होगा नहीं। 

 








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