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विकास के भीम ऐप पर भारी नफरत की भीम सेना



 विकास के भीम ऐप पर भारी नफरत की भीम सेना

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सियाराम पांडेय ‘शांत’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां दलितों को भाजपा से जोड़ने का एक भी मौका नहीं छोड़ रहे। वे अंबेडकर जयंती मनाते हैं। भीम एप बनाते हैं। इसे आम आदमी के विकास और लाभ से जोड़ते हैं, वहीं जातीय आधार पर बनी नफरत की भीम सेना उनके विकास के मंसूबों पर पानी फेर रही है। संत रविदास के मंदिर में जाकर दलितों के साथ पंक्ति भोज में शामिल होते हैं, वहीं उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मेरठ में इस बात के लिए विरोध होता है कि उन्होंने भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण नहीं किया। योगी आदित्यनाथ समाज के सभी वर्ग को सम्मान देते हैं और इस बात की मुनादी कर चुके हैं कि उनकी सरकार जाति-धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करेगी। डाॅ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा भारत के लगभग सभी गांवों में लगी है। जरूरी तो नहीं कि सभी राजनीतिक दलों के नेता वहां अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते ही हों। दलितों की मसीहा कहने वाली मायावती खुद कितनी दलित बस्तियों में गई हैं और वहां लगी अंबेडकर प्रतिमा को माल्यार्पण किया है। यह किसी से छिपा नहीं है। दलितों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। अंबेडकर उनके आर्ष पुरुष हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करना चाहिए था। न माल्यार्पण करते तो वहां जाकर प्रणाम ही कर लेते लेकिन कोई जरूरी तो नहीं कि उन्हें वहां अबंडकर प्रतिमा के बारे में जानकारी रही ही हो। अगर वहां पूर्व के मुख्यमंत्रियों ने माल्यार्पण किया था तो यह बात प्रशासन स्तर पर उन्हें बताई जानी चाहिए थी लेकिन मेरठ में दलितों ने जिस तरह हंगामा किया। योगी आदित्यनाथ के पोस्टर फाड़े। उसे बहुत उचित तो नहीं ठहराया जा सकता। अंबेडकर जयंती के दिन योगी आदित्यनाथ ने अपने दिन की शुरुआत ही अंबेडकर प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद ही की थी। भीम सेना के लोगों को इस बावत भी विचार करना चाहिए था। वे जान-बूझकर अंबेडकर का निरादर क्यों करेंगे। यह तो दलितों को बहकाने वालों के दिमाग की बलिहारी है कि उन्होंने बेवजह छोटी सी बात को बतंगड़ बना दिया। वैसे भी माल्यार्पण का कोई तो मौका होना चाहिए। क्या मेरठ के पीवीएस मॉल के निकट मुख्य मार्ग से सटे पार्क में लगी अंबेडकर की प्रतिमा पर दलित समाज रोज माल्यार्पण करता है। यदि नहीं तो योगी से ही इस तरह की अपेक्षा क्यों? योगी द्वारा माल्यार्पण न करने से क्षुब्ध दलित समाज अपनी आपत्ति शालीनता पूर्वक अपने प्रतिनिधियों के जरिए भी तो मुख्यमंत्री तक पहुंचा सकता था। उनसे माफी मांगने की जरूरत ही नहीं पड़ती, वे स्वतः माफी मांग लेते लेकिन इस मुद्दे को लेकर दलितों ने जिस तरह हंगामा काटा है। योगी-मोदी मुर्दाबाद के नारे लगाए हैं। अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण योगी ने नहीं किया तो मोदी मुर्दाबाद के नारे क्यों लगाए गए, ये कुछ ऐसा सवाल है जो राजनीतिक षड़यंत्र की ओर इशारा करता है। क्षुब्ध दलितों ने जिस तरह योगी आदित्यनाथ के पोस्टर फाडे़ हैं। ठेका बंद कराने की मांग को लेकर उसमें तोडफोड़ की है। भैंसाली ग्राउंड में सभा के दौरान कई बार मुख्यमंत्री का सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की है। योगी के भाषण के दौरान दर्शक दीर्घा से जिस तरह दर्जनों बोतलें मंच की ओर उछाली गईं। उसे दलितों का आक्रोश नहीं, राजनीतिक साजिश के रूप में देखना ज्यादा मुनासिब होगा। और यह सब जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की आंखों के सामने हुआ। अगर यह कहा जाए कि उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को अराजक तत्वों की नजर लग गई है तो कदाचित गलत नहीं होगा। सहारनपुर में चल रहे जातीय संघर्ष की आग जिस तरह रह-रहकर भड़क रही है, उसे राजनीतिक साजिश ही कहा जा सकता है। दलितों ने तो बाकायदा भीम सेना तक बना ली है। गौरतलब है कि सहारनपुर उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा को जोड़ता है। ऐसे महत्वपूर्ण जिले में बार- बार दलित आक्रोश का भड़कना पुलिस प्रशासन की कमजोरी और लापरवाही की ओर ही इशारा करता है। सहारनपुर के शब्बीरपुर में हिंसा को लेकर धरना दे रहे भीम सेना के कार्यकर्ताओं को उठाने के विरोध में शहर में बवाल हो गया। इस बवाल के बाद कार्यकर्ताओं ने पुलिस के साथ गाली-गलौच ही नहीं की। पथराव, फायरिंग और आगजनी भी की। रामपुर मनिहारान के सीओ की जीप तोड़ दी गई। रामनगर पुलिस चैकी में आग लगा दी गई। एक-एक बस व कार समेत डेढ़ दर्जन दोपहिया वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। एडीएम, एसडीएम, नगर मजिस्ट्रेट व पुलिस अधिकारियों को कालोनी में घुसकर जान बचानी पड़ी। इस घटना में एक सिपाही समेत एक दर्जन लोग घायल हुए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सहारनपुर और मेरठ की घटना पर न केवल नाराजगी जाहिर की है बल्कि यूपी कैबिनेट की बैठक में पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को तलब किया। उन्होंने यह जानना चाहा है कि जिलों में अधिकारियों के दौरे के बाद भी हालात सुधर क्यों नहीं रहे हैं? योगी आदित्यनाथ की इस राय में दम है कि उत्तर प्रदेश में राजनीतिक परिवर्तन तो हो चुका, लेकिन व्यवस्था का संपूर्ण परिवर्तन करना अभी बाकी है। जाति, पंथ, मजहब के आधार पर कोई भेदभाव का शिकार नहीं होगा लेकिन समाज में विभाजन के कारण बने तुष्टीकरण को भी नहीं पनपने देंगे। योगी आदित्यनाथ को विचार करना होगा जब चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बात कही थी कि उत्तर प्रदेश के सभी थाने समाजवादी पार्टी के कार्यालय बन गए हैं। सवाल यह उठता है कि प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद थानाध्यक्ष और पुलिसकर्मी बदले क्यों नहीं गए। सपा राज्य में हर थाने में यादव दरोगा और ज्यादातर सिपाही यादव तैनात किए जाते हैं। मायावती राज में हर थाने पर दलित अधिकारियों का वर्चस्व हो जाता है। योगी आदित्यनाथ जातीय आधार पर बदलाव न करते क्योंकि ऐसा करना भाजपा और खासकर उनकी संस्कृति नहीं रही है लेकिन बदलाव तो करना ही चाहिए था। चाणक्य ने कहा था कि जो विश्वसनीय नहीं हैं, उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। जो विश्वसनीय हैं, उन पर भी बहुत विश्वास नहीं करना चाहिए लेकिन योगी आदित्यनाथ लीक से हटकर काम किया, जो अधिकारी जहां पर पहले से तैनात हैं, उन्हीं से बेहतर काम लेने की रणनीति अपनाई लेकिन अब तो भाजपा से जुड़े लोग भी इसे सरकार की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। प्रदेश में जिस तरह लूटपाट, हत्या और प्रदर्शन के मामले हो रहे हैं, उससे मुख्यमंत्री भी बेहद नाराज हैं और इसकी गाज कुछ आईपीएस अधिकारियों पर गिर सकती है लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। मुख्यमंत्री को पुलिस महकमे में ऊपर से लेकर नीचे तक बदलाव करना होगा। ईमानदार और जीवट के धनी अधिकारियों को प्रमुख पदों पर बैठाने होंगे तभी व्यवस्था में बदलाव और उत्तम प्रदेश बनाने का उनका सपना पूरा हो सकेगा। अराजक तत्वों को मुंहतोड़ जवाब देना ही होगा। जिन लोगों ने मेरठ और सहारनपुर में हालात बिगाड़ने की कोशिश की है, उन्हें दंडित न किया गया तो इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोक पाना सरकार के लिए बहुत मुश्किल होगा। फोड़े को पकने से पहले फोड़ देना चतुराई है और अराजक तत्वों को क्षमा कर देना बुराई है। यह सच है कि योगी सरकार अच्छा काम कर रही है लेकिन कानून व्यवस्था की चुनौती से भी उसे निपटना ही होगा अन्यथा प्रदेश में विकास का सकारात्मक माहौल नहीं बन पाएगा।


 


 


 



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