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भारत का विकास चीन को नहीं आ रहा रास



भारत का विकास चीन को नहीं आ रहा रास

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 सियाराम पांडेय "शांत "

चीन भारत से घबराया हुआ है। उसे भारत का विकास रास नहीं आ रहा है। जब भी भारत विकास की ओर अपने कदम बढ़ाता है, चीन की चिंता का ग्राफ बढ़ जाता है। घबराता तो वह है जिसकी नीयत में खोट होता है। चीन को अब समझ में आ गया है कि भारत में अब मजबूत सरकार है। जिस समय चीनी राष्ट्रपति जिन शिनपिंग भारत आए थे, उस समय भी चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसपैठ की कोशिश की थी। यह अलग बात है कि भारत सरकार के सख्त रुख की वजह से उसे मुंह की खानी पड़ी थी। बैरंग लौटना पड़ा। 

  भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका, फा्रंस ,जापान और बियतनाम की यात्रा भी चीन को पसंद नहीं आई थी। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और नरेंद्र मोदी की दोस्ती का चीन भले ही विरोध न कर पाया हो लेकिन भारत को पृथक-पृथक मुद्दों पर धमकाने का प्रयोग उसने खूब किया। उसने अमेरिका और भारत की दोस्ती को तोड़ने के हर संभव प्रयास किए। चीन के कुछेक अखबारों ने तो असंतोष की लगभग बुझी पड़ी चिनगारी को भी हवा देने की कोशिश की। यह अलग बात है कि चीन अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। हाल ही में चीन के निजी रणनीतिक थिंक टैंक ‘एनबाउंड’ ने कहा है कि चीन को भारत से प्रतिस्पर्धा को गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था में विस्फोटक वृद्धि हो सकती है। भारत अर्थव्यवस्था के मामले में दूसरा चीन बन सकता है। चीन इस समय दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है और अपनी स्थिति को बनाए रखने के लिए उसे प्रभावी रणनीति बनानी होगी। अन्यथा उसकी स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के तमाशबीन की सी हो जाएगी। चीनी थिंक टे।क की यह राय भारत में नोटबंदी और उसके नकारात्मक प्रभावो का आकलन करमें में जुटे प्रतिपक्ष के लिए किसी झटके से कम नहीं है। इसका मतलब साफ है कि मोदी जी के नतृत्व में यह देश तेजी से आगे बढ़ रहा है। विदेशी ताकतें भी इस सत्य को स्वीकार कर रही हैं।  

चीन के निजी रणनीतिक थिंक टैंक ‘एनबाउंड’ ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अध्ययन किया है और पाया है कि चीन का जनसांख्यिकीय लाभ निरंतर घट रहा है और इसके लिए उसकी परिवार नियोजन की नीति ही बहुत हद तक जिम्मेदार रही है। यह अलग बात है कि हाल के दिनों में उसने अपनी परिवार नियोजन नीति में कुछ तब्दीली भी की है। चीन को इस बावत भी सोचना होगा कि भारत की पचास फीसदी से अधिक आबादी 25 साल से कम आयु की है। इसका लाभ निश्चित तौर पर उसे मिलेगा क्योंकि जहां युवा होता है। वहां उमंग और उत्साह होता है। भारत में न सिर्फ कामगारों की बड़ी फौज है, बल्कि संभावित उपभोक्ताओं का बड़ा समूह भी है। रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि चीन ने भारत पर पर्याप्त अध्ययन नहीं किया है। चीन को अपने इस पड़ोसी के विकास पर करीब से नजर रखनी चाहिए।

चीन के सरकारी समाचार पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी चीन की  अर्थव्यवस्था में आ रही सुस्ती पर चिंता जाहिर की है। चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछले साल 6.7 फीसद रही जबकि 2016-17 भारतीय जीडीपी 7.1 फीसद रहने का अनुमान है। भारत में जिस तरह के परिवर्तन हो रहे हैं वे विकास की बड़ी संभावना की ओर इशारा करते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह फैसला वैश्विक निवेशकों को ही करने दिया जाए कि वे चीन में निवेश करना चाहते हैं या भारत में। हालांकि, भारतीय जीडीपी काफी पीछे रहेगी, लेकिन फिर भी इसमें उभरते हुए बाजार की संभावना बनी रहेगी। इसके अलावा यह वैश्विक पूंजी के लिए भी आकर्षक बना रहेगा।

‘अर्नस्ट और यंग ’ने अपने एक सर्वेक्षण में भारत को निवेश के लिए दुनिया का सबसे आकर्षक स्थल बताया था। सर्वेक्षण में शामिल रहे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के 500 एक्जीक्यूटिव्स में से 60 प्रतिशत ने 2015 में भारत को निवेश के लिए दुनिया के तीन शीर्ष सबसे आकर्षक स्थलों में शुमार किया था। रिपोर्ट के मुताबिक, विशाल घरेलू बाजार, निम्न श्रम लागत और कुशल कामगारों का बाजार भारत की सबसे आकर्षक विशेषताएं हैं। भारत में निवेश कर रहीं चीन की हुवाई, जियोमी और ओप्पो जैसी विभिन्न कंपनियों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि हमारे विचार से अगर भारत जान बूझकर वैश्विक निवेशकों के समक्ष प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा करता है तो यह चीन के समक्ष एक चुनौती होगी। लेकिन, ‘अर्नस्ट और यंग’ की रिपोर्ट की मानें तो वैश्विक निवेशक अभी अनिर्णय की स्थिति में हैं।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि भारत सरकार निवेश को लेकर काफी आश्वस्त है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सौर ऊर्जा को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने अगले पांच साल में सौर ऊर्जा में 100 बिलियन डॉलर का लक्ष्य रखा है। रिपोर्ट में चीन को चेताते हुए लिखा है कि  सौर ऊर्जा आधारित अर्थव्यवस्था में निवेशकों को मदद करने में कोई भी देश भारत से मुकाबला नहीं कर सकता। भारत के प्रतिस्पर्धी बन जाने का चीन इंतजार नहीं कर सकता। चीन ने हथियार निर्माण को लेकर भी भारत पर तंज कसा है। चीन ने कहा कि भारत युद्धपोत बनाने से पहले अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के बारे में सोचे। चीन ने भारत को सलाह दी थी कि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी से निपटने के लिए विमानवाहक पोत का निर्माण करने की बजाय भारत को पहले अपनी अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए और अब वही चीन  भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित है।

एक चीनी अखबार ने दावा किया था कि भारत चीन के सैन्य विकास को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर रहा है. अखबार ने लिखा गया था कि भारत को चीन और पाकिस्तान के आर्थिक मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाना चाहिए तो क्या भारत को आंख मूंदकर पाकिस्तान और चीन की भारत विरोधी नीतियों को देखते रहना चाहिए।  

भारत बीजिंग और इस्लामाबाद को संभावित खतरे के रूप में देख रहा है और चीन की वन बेल्ट एंड वन रोड पहल और चीन-पाकिस्तान के आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को लेकर संदेह कर रहा है तो इसमें गलत क्या है। उसकी जगह कोई भी देश होता तो यही सोचता। चीन इस बावत अकारण परेशान क्यों है

इसमें शक नहीं कि चीन भारत के लिए शुरू से ही खतरे का सबब बना हुआ है। नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका को भारत के खिलाफ भड़काने और इस निमित्त उन्हें सुविधाओं का लालीपॉप दिखाने में उसका कोई सानी नहीं है। वह इन देशों को शस्त्रास्त्रों के क्षेत्र में तकनीकी मदद भी कर रहा है। सच तो यह तो वह भारत के खिलाफ चैतरफा चक्रव्यूह रच रहा है लेकिन इसके बाद भी भारतीय हुक्मरां उसके चरित्र को समझने की जहमत तक नहीं उठा पा रहे हैं। यह अलग बात है कि मोदी सरकार में वह पाकिस्तान को छोड़कर किसी भी देश को भारत के खिलापफ भड़का नहीं पा रहा है। उसकी चिंता का एक बड़ा कारण यह भी है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व थल सेनाध्यक्ष तक देश को आश्वस्त कर चुके हैं कि चीन से देश को कोई खतरा नहीं है। लद्दाख क्षेत्र में चीन की घुसपैठ को भी उन्होंने करीने से नकार दिया था और इसे मीडिया के दिमाग की उपज कह दिया था। इसे देश की सुरक्षा के प्रति गाफिल होना नहीं तो और क्या कहा जाएगा। चीन तो  जवाहर लाल नेहरू और रवीन्द्र नाथ टैगोर को आधुनिक चीन का निर्माता तक कह चुका है तो कांग्रेस को देश के बड़े नुकसान को नजरअंदाज क्यों नहीं करती। चीन से दोस्ती बढ़ाने के फेर में नेहरूजी भी चीन द्वारा कब्जाई गई  भूमि को एक तरह से भूल ही गए थे। आक्साईचिन का 36 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में है। केंद्र की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने अगर इस बावत गंभीरता से काम किया होता तो आज चीन भारत के हर मामले में टांग अड़ाने की स्थिति में नहीं होता। पाकिस्तान में परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कदीर खान का अपनी पत्नी हेनी को भेजा गया गोपनीय पत्र चीन के भारत विरोधी आचरण की पोल खोलने के लिए काफी है। लंदन के संडे टाइम्स में छप चुके इस पत्र में कहा गया था कि चीन ने ही पाकिस्तान को परमाणु कार्यक्रम बनाने के फार्मूले दिए। दो परमाणु बम बनाने भर यूरेनियम दिया और परमाणु बम बनाने में प्रयुक्त होने वाली विशेष गैस भी उपलब्ध करवाई। अगर परमाणु वैज्ञानिक कदीर की बातों में रंच मात्र भी सच्चाई है तो चीन का भारत विरोधी चेहरा सहज ही सामने आ जाता है। भारत ने जब पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किए थे तो पाकिस्तान ने छह। यह सब सुलभ हुआ था चीन के सहयोग से। सउदी अरब के विमान में चीनी हथियारों का कोलकाता में पकड़ा जाना और फिर चीन का आंखें तरेरा जाना इस बात का प्रमाण तो है ही कि उसे विमान सेवा के अंतर्राष्ट्रीय कायदे-कानून की रंच मात्र भी परवाह नहीं है।

तत्कालीन मनमोहन सरकार में देश की सीमा में डेढ़ किलोमीटर तक घुसकर चीन ने अपने नाम की मुहर लगा दी थी। अपने सैनिकों को भेजकर पहाड़ों को लाल करा दिया, लेकिन तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने इसे बेहद सामान्य घटना करार दिया था। नेपाल की सीमा से लगते श्रावस्ती जिले के पेड़ों पर नेपाली ध्वज फहराए जाने की भी तत्कालीन मनमोहन सरकार ने पुरजोर निंदा की थी, लेकिन चीन के मामले में वैसा कुछ नहीं हुआ। चीन की आलोचना के मामले में भी यूपीए सरकार फूंक-फूंक कर कदम उठाती रही।  चीन कभी भारत का सगा नहीं बन पाया। जब कभी भारत ने उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया, किसी विषैले सांप की तरह उसने उसे काटा ही। भारतीय पूरी दुनिया में चीन से बंधुत्व का राग अलापते रहे और इस सदाशयता का लाभ चीन ने भारत की पीठ पर छुरा भोंकने में किया।

भारत और चीन युद्ध में भारत को एक तरह से अपनी राजपूताना रेजीमेंट से हाथ धोना पड़ा था। चीन को उसकी मांद तक खदेड़ने में भारतीय सैनिक बहुद हद तक कामयाब भी हो जाते और उसे इस काबिल न छोड़ते कि वह भारत के खिलाफ सोचने की जुर्रत करता, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने समझौते की राग छेड़ दी। इस अनुबंध के तहत चीन की सेना अरुणाचल प्रदेश से तो लौट गई, लेकिन उत्तर पश्चिम में आक्साईचिन के 36 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र पर वह 1962 से लेकर आज तक काबिज है। अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्गकिलोमीटर भू-भाग पर भी उसकी नापाक नजर है। 

पड़ोसी देशों में उसकी अनधिकृत घुसपैठ को कमोवेश इसी रूप में देखा जा सकता है। वह जिस तरह नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान की भारत विरोधी सोच को हवा दे रहा है, यह इस बात का द्योतक है कि उसे फाह्यान और ह्वेनसांग के सपनों का गौरवशाली भारत पसंद नहीं है। पड़ोसी देशों की सामरिक महत्व की जमीनों को हथियाने की उसकी कोशिशें परवान चढ़ रही है। पाकिस्तान की इच्छा से ही सही, पश्चिमी क्षेत्र में हथियाई गई 1300 वर्ग किलोमीटर भारतीय भूमि को पाकिस्तान से पाकर वह फूला नहीं समा रहा है। वहां उसने कराकोरम मार्ग विकसित कर लिया है। यह स्थिति भारत के लिए बहुत मुफीद नहीं है। चीन के सैनिकों ने न केवल लद्दाख में अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन किया है बल्कि वहां पत्थरों और चट्टानों पर अपनी भाषा में चीन भी लिख दिया है। यह सब वह अपना पक्ष मजबूत करने के लिहाज से कर रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक काॅरिडोर की रचना भी भारत को घेरने के लिए है। अच्छा होता कि चीन भारत को घेरने की बजाय अपने भविष्य पर ध्यान दे पाता। 


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