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मंत्रिमंडल से खिसकती योगी कमान



मंत्रिमंडल से खिसकती योगी कमान

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लखनऊ (विजय शंकर पंकज)- उत्तर प्रदेश की कमान संभालते ही युवा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तर्ज पर मंत्रिमंडल एवं राज्य प्रशासन पर एकाधिकार करने की कोशिश की। सरकार के तीन माह बीतने पर मुख्यमंत्री ने जो उपलब्धिया गिनायी, वह तो जनता पर असरदार नही साबित हुई परन्तु इस बीच मंत्रिमंडल सहयोगियों से उनकी कमान धीरे-धीरे कमजोर होने लगी है तो प्रशासनिक मशीनरी पर योगी हनक निष्प्रभावी हुई है। राजनीतिक हलकों में इसकी समीक्षा योगी की कमजोर राजनीति और प्रशासनिक अनुभवहीनता बतायी जा रही है। जुलाई माह में बजट पारित होने के बाद योगी आदित्यनाथ की मुख्यमंत्री के रूप में इन दोनों ही मोर्चो पर कसौटी शुरू होगी।
भारी बहुमत और नरेन्द्र मोदी तथा अमित शाह जैसे नेताओं के आर्शिवाद से मुख्यमंत्री बनने के बाद भी योगी आदित्यनाथ इतने कम समय में राजनीतिक तथा प्रशासनिक मोर्चे पर कमजोर साबित होगे, इसका शायद किसी को एहसास नही था। वैसे तो सरकार बनने और विभाग बंटवारे के बाद ही विधायकों एवं मंत्रियों की नाराजगी की बाते उभरने लगी थी परन्तु उस समय कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नही था। प्रदेश में मंत्रियों के विभागों का बंटवारा इस प्रकार है कि कैबिनेट और राज्यमंत्री तक नही समझ पा रहे है कि उन्हें क्या और किस प्रकार का काम करना है। इस मुद्दे को लेकर योगी सरकार के डेढï दर्जन मंत्री असंतोष के स्वर उभारने लगे है। सबसे बडïा मुद्दा तो उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या का है जो योगी से पहले ही मुख्यमंत्री की रेस में थे। सरकार बनने के बाद मौर्या की दो-तीन घटनाओं ने योगी तथा मौर्या के बीच की खाई को बढाया है। इसमें एनेक्सी सचिवालय में केशव मौर्या का मुख्यमंत्री कार्यालय पर जबरन कब्जा करना, दिल्ली के यूपी सदन में मुख्यमंत्री के सूट को रात में दबाव में खुलवाने की कोशिश से लेकर मुख्यमंत्री की तर्ज पर कई मंत्रियों के विभागों में हस्तक्षेप की घटनाओं ने सरकार की भद्द करायी। इसी प्रकार वरिष्ठ मंत्री सुरेश खन्ना को भी उपमुख्यमंत्री न होने का गम साल रहा है जबकि वह भी मुख्यमंत्री के समक्ष मानकर चल रहे है। ईमानदार और सादगी के प्रतीक सुरेश खन्ना की अब कार्यकर्ताओं से मुलाकात नही होती। योगी सरकार का सबसे पहला भ्रष्टाचार का मामला गोमती रिवर फ्रंट की जांच को आगे बढïाने का दायित्व सुरेश खन्ना पर ही था परन्तु अज्ञात प्रभाव में आकर वह पूरी इसके आरोपियों को बचाने में ही जुट गये। इस मुद्दे को लेकर नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना एवं सिंचाई मंत्री धर्मपाल के बीच तकरार होने पर अन्त में मुख्यमंत्री योगी को दखल देने पडïा और भारी दबाव के बीच खन्ना ने बेमन से रिवर फ्रंट की जांच का मसला सौंपा।
योगी मंत्रिमंडल के ज्यादातर सहयोगी दल के मंत्री अपने विभागों को लेकर नाराज है। सहयोगी दलों के वरिष्ठ मंत्रियों को भी ऐसे विभाग दिये गये है जैसे वे अब भी भाजपा से बाहरी तत्व दिखायी दे रहे है। स्वामी प्रसाद मौर्या, एस.पी.सिंह बघेल, ओम प्रकाश राजभर, बृजेश पाठक, चौधरी लक्ष्मी नारायण अपने विभागों को लेकर खुश नही है। ओम प्रकाश राजभर ने एक लेखपाल के खेत की पैमाइश न करने की बात को लेकर गाजीपुर से लेकर लखनऊ तक ऐसा बावेला खडïा किया कि मुख्यमंत्री को गाजीपुर के जिलाधिकारी से यह कहना पडïा कि जरा मंत्री जी की बातों का ख्याल रखे। ओम प्रकाश राजभर का दर्द है कि वह भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष है और उन्ही की बगल की सीट से जीते दारा सिंह चौहान को बन जैसा बडïा विभाग मिला जबकि उन्हें कैबिनेट मंत्री होते हुए भी पिछडïा वर्ग कल्याण मिला। यही नही ओम प्रकाश ने योगी की सहानुभूति लेने के लिए गाजीपुर के मसले में केन्द्रीय संचार मंत्री मनोज सिन्हा को भी घसीटने की कोशिश की। इसी प्रकार अन्य सहयोगी दलों के मंत्री भी विभागों को लेकर सरकार के साथ असहयोग अभियान चला रहे है। इन सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं तथा भाजपा कार्यकर्ताओं में क्षेत्रों में टकराव की स्थिति बनी हुई है।
योगी सरकार के भाजपा के भी कई मंत्री अपने विभागों को लेकर नाराज चल रहे है। इनमें से कुछ को यह आश्वासन मिला है कि अगले विस्तार के बाद उनके विभागों में फेरबदल किया जाएगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ मोती सिंह को कैबिनेट के रूप में ग्रामीण अभियन्त्रण सेवा (आर.इ.एस.)की जिम्मेदारी दी गयी है जबकि यह कोई विभाग नही बल्कि एक कार्यदायी संस्था है। मंत्रिमंडल की नाराजगी तथा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मामला मोती सिंह ने पिछले दिनों प्रतापगढï जिले की एक जनसभा में उठाया। मोती सिंह ने कहा कि कार्यकर्ताओं का काम न हो तो भाजपा एवं सहयोगी दलों के विधायकों एवं सांसद के मुंह पर कालिख दे। भाजपा नेताओं में सबसे ज्यादा नाराजगी नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं में दिल्ली उत्पादित श्रीकांत शर्मा एवं सिद्धार्थ नाथ सिंह को लेकर है। आरोप है कि ये दोनों मंत्री भाजपा के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को पहचानते ही नही है और नही उनकी सुनवाई होती है। यह दोनों ही पहली बार विधायक बने है और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी है। भाजपा मंत्रियों में सतीश महाना, सत्यदेव पचौरी, रमापति शास्त्री इस बात को लेकर असंतुष्ट है कि पार्टी में उनके कद को देखते हुए समुचित विभाग नही दिये गये जबकि उनसे जुनियर को ज्यादा महत्व दिया गया। इनके अलावा कई राज्यमंत्री भी अपने विभागों को लेकर संतुष्ट नही है। तेज तर्रार युवा नेता महेन्द्र सिंह अपने समर्थकों के बीच इस बीच को नाराज है कि उनके पास ग्राम विकास जैसा विभाग है जिसके पास गांवों के विकास काम करने की कोई धनराशि नही है। ग्राम विकास की धनराशि पंचायती राज के पास है जो भूपेन्द्र सिंह चौधरी के पास है। महेन्द्र सिंह के पास राज्यमंत्री के रूप में स्वास्थ्य विभाग भी है परन्तु कैबिनेट सिद्धार्थ नाथ सिंह के समक्ष उनकी नही चलती है। इसी प्रकार युवा तुर्क स्वतंत्रदेव सिंह परिवहन विभाग की कार्यशैली से खुश नही है और राज्यमंत्री के रुप में ऊर्जा विभाग में श्रीकांत शर्मा के समक्ष उनकी चलती नही है। इसी प्रकार धर्म सिंह सैनी, उपेन्द्र तिवारी तथा अनिल राजभर भी विभागीय बंटवारे तथा कार्य प्रभार को लेकर असंतुष्ट चल रहे है। मंत्रिमंडल के विभागीय बंटवारे में सबसे ज्यादा विवादास्पद विभाग दो महिलाओं अनुपमा जायसवाल तथा अर्चना पाण्डेय को दिया गया है। इन विभागों की कार्यशैली को भी लेकर योगी सरकार पर सवाल उठने लगे है।
प्रशासनिक मशीनरी पर कमान्ड को लेकर भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली पर पार्टी में ही सवाल उठने लगे है। मुख्यमंत्री को अपने स्टाफ की नियुक्ति करने में ही लगभग दो माह का समय लग गया तो नये मुख्यसचिव की नियुक्ति तीन माह बाद हो सकी। सरकार बनने के बाद योगी ने चीनी मिल बिक्री घोटाले को बडïा मुद बनाया, उसका विभागीय प्रमुख सचिव रहते राहुल भटनागर की भूमिका संदिज्ध थी जो तीन माह तक योगी के मुख्यसचिव रहे। यही कारण है कि चीनी मिलों की बिक्री घोटाले का मामला अब ठंढïे बस्ते में चला गया है। तबादले के बाद भी राहुल भटनागर को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी है। हालात यह है कि अधिकारियों के तबादले में योगी मंत्रियों की दखलन्दाजी से ज्यादा भाजपा संगठन के एक पदाधिकारी की भूमिका ज्यादा बढïती जा रही है। कई कैबिनेट मंत्री अपनी पसन्द के अधिकारी को प्रमुख सचिव बनाने को लेकर योगी पर दबाव बना रहे है। मंत्रियों से ज्यादा लंबी सूची अधिकारियों के तबादले की भाजपा प्रदेश कार्यालय से पहुंच रहा है। यह मामला सरकार और संगठन में तकरार का मुद्दा बन गया है। भाजपा के इस प्रभावी पदाधिकारी से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाराजगी भी जता चुके है। यह मसला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा अमित शाह के दरबार तक पहुंच चुका है परन्तु अभी तक सरकार पर संगठन का दबाव बना हुआ है। संगठन के दबाव के चलते है जिला न्यायालयों में हजारों सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति का मामला अधर में लटका हुआ है। कई मंत्री भी भाजपा पदाधिकारियों तथा कार्यकर्ताओं का काम टरकाने के लिए संगठन से पत्र लिखवाकर लाने की बात कह रहे है। सरकार की इस कार्यशैली को लेकर योगी के घटते राजनैतिक प्रभाव के रूप में देखा जाना लगा है। भाजपा कार्यकर्ता भी तीन माह में ही अपनी सरकार से खुलकर नाराजगी जाहिर करने लगा है। इसका प्रभाव भाजपा के सांगठनिक क्रिया कलापों पर भी परिलक्षित होने लगा है। भाजपा के सांगठनिक कार्यक्रमों से कार्यकर्ता उदासीन होने लगा है।



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