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पाकिस्तान, पाताल में रहते हुए भी गिरने की जिद्द



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पाकिस्तान की जेल में जासूसी के आरोप में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को जेल में मिलने गईं उनकी माता व पत्नी के साथ वहां की सरकार ने जो व्यवहार किया उसे पाताल में रह रहे लोगों की और भी नीचे गिरने की जिद्द के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। भारत ने पाकिस्तान के इस व्यवहार पर कड़ा एतराज जताया है। जाधव की मां अवंतिका और पत्नी चेतना 25 दिसंबर शाम को इस्लामाबाद से मस्कट के रास्ते नई दिल्ली लौटीं। सुरक्षा के नाम पर उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं से छेड़छाड़ की गई। वहां मंगलसूत्र, कंगन और बिंदी जैसी चीजें भी उतरवा ली गईं। इनको मराठी की बजाय अंग्रेजी में बातचीत करने को कहा गया। बातचीत के दौरान दोनों पक्षों के बीच कांच की दीवार लगाई गई और इंटरकॉम पर बात करवाई गई और वह भी स्पीकर चालू करवा कर।

हास्यास्पद बात यह है कि पाकिस्तान ने इस बातचीत को राजनयन सहायता (कॉन्स्यूलर एक्सेस) बताया, जबकि इसका अर्थ है कि पाकिस्तान हमारे राजदूत को जाधव से बातचीत की अनुमति दे। इस दौरान कोई हस्तक्षेप न हो। मुलाकात की शर्तें पहले से तय हों और जाधव को भारतीय दूतावास से सीधी वैधानिक सहायता उपलब्ध कराए। इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान का दावा है कि जाधव भारतीय गुप्तचर संस्थान रॉ के लिए जासूसी कर रहे थे। उन्हें बलूचिस्तान प्रांत से पकड़ा गया। इसके बाद पाक सैनिक न्यायालय ने इस साल अप्रैल में फांसी की सजा सुनाई। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने 18 मई, 2017 को फांसी पर रोक लगा दी। दूसरी ओर पूरी सच्चाई यह है कि जाधव को ईरान से अगवा किया गया। भारतीय नौसेना से सेवानिवृति के बाद वे ईरान में व्यवसाय कर रहे थे और पाकिस्तान की सेना और गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने उनका अपहरण करवाया।

असल में पाकिस्तान कोई देश नहीं बल्कि एक विकृत विचारधारा व मानसिकता है जो विशुद्ध रूप से भारत विशेषकर अंध हिंदू विरोध पर टिकी है और इसके जनक हैं मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना। जिन्ना ने धर्म के आधार पर सर सैयद अहमद खां द्वारा प्रतिपादित धर्म के आधार पर दो राष्ट्र के सिद्धांत को भारत पर थोपा। इसे मनवाने के लिए प्रत्यक्ष कार्रवाई जैसी हिंसक गतिविधि का सहारा लिया जिसमें हजारों-लाखों की संख्या में निरीह हिंदू मारे गए। इस सिद्धांत की परिणति देश विभाजन के रूप में निकली। मुस्लिम लीग की प्रत्यक्ष कार्रवाई से घबरा कर तत्कालीन भारतीय नेतृत्व जो पंडित जवाहर लाल नेहरू के हाथों व महात्मा गांधी के प्रभाव में था, ने देश विभाजन यह सोचते हुए स्वीकार कर लिया कि शायद इससे कट्टरवाद का स्थाई समाधान निकल जाए। लेकिन अब लगता है कि कांग्रेस द्वारा निकाला गया उक्त समाधान ही समस्या बन गया। दूरदृष्टा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सर-संघचालक गुरुजी ने देश के नेतृत्व को चेताया था कि विभाजन मुस्लिम लीगी मतांधता का कोई समाधान नहीं है, रही बात इन दंगाईयों की तो इनसे समाज स्वत: निपट लेगा। अगर इन कट्टरपंथियों को अलग देश दे दिया गया तो वह भारत के लिए स्थाई सिरदर्द बनेगा, लेकिन इसे कांग्रेस का काल्पनिक भय कहें या गलत निर्णय या फिर देश की सत्ता संभालने की जल्दबाजी, देश विभाजन हो गया। जो गांधी जी कहते थे कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा उन्होंने इन हालातों के सामने हथियार डाल दिए। आज गुरुजी की चेतावनी पिछले 70 सालों से हर मोड़ पर अक्षरश: सत्य साबित होती आरही है। विभाजन के बाद पाकिस्तान के रूप में उसी भारत विशेषकर हिंदू विरोधी मानसिकता को शक्तिशाली देश के रूप में एक सांझा मंच मिल गया जिसके पास अपनी सरकार, सेना, पुलिस, न्यायपालिका, राजनयन जैसे शक्तिशाली संवैधानिक संगठन व संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता है। विभाजन से पहले जो विकृत मानसिकता देश में बिखरी पड़ी थी विभाजन के बाद एकजुट हो गई चांद-सितारे के हरे-सफेद रंग वाले झंडे तले एक इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान के रूप में। यही मानसिकता पड़ौस में रहते हुए हमें जख्म दर जख्म दे रही है और अपने यहां बचे हुए हिंदुओं-सिखों की नस्लकुशी में लगी है। पाकिस्तान की इन हरकतों से यह साबित हो गया है कि कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने विभाजन के रूप में मुस्लिम लीगी कट्टरवाद के समक्ष जो आत्मसमर्पण किया गया वह उचित नहीं था। यह ऐसा उपचार साबित हुआ जो रोग से अधिक असाध्य व कष्टदायक है। इस समस्या का समाधान करने में न जाने अब कितना समय और कितनी ऊर्जा लगने वाली है परंतु यह निश्चित है कि काम बिना पांवों के गौरीशंकर की चोटी पर चढऩे जैसा दुरुह अवश्य है।

 

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