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अटकाव भटकाव की मुद्रा में कांग्रेस ,तीन तलाक बिल का मामला



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तीन तलाक के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी अटकाओ, भटकाओ और लटकाओ के त्रिसूत्रीय दर्शनशास्त्र का पालन करती दिखाई दे रही है। देश के संसदीय इतिहास में शायद पहली बार देखने को मिल रहा है कि किसी दल ने एक विधेयक पारित करवाने के लिए लोकसभा में न केवल समर्थन दिया बल्कि सार्वजनिक चर्चा में सरकार के साथ उस विधेयक का श्रेय भी सांझा करने का प्रयास किया हो परंतु राज्यसभा में उसके नेता चमगादड़ की मुद्रा में आगए हों। कांग्रेस का यह व्यवहार नेतृत्व कुशलता पर तो प्रश्नचिन्ह लगाता ही है साथ में इस बात को भी दर्शाता है कि देश पर 6 दशक से भी अधिक शासन करने वाली पार्टी वैचारिक धरातल पर कितने दुविधाग्रस्त दौर से गुजर रही है। इसके नेता अचकन पर जनेऊ धारण कर छवि बदलने और अल्पसंख्यक तृष्टिकरण रूपी पुराना दाद खुजाने का आनंद लेने के दो विरोधाभासी काम एकसाथ करते दिख रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक अवैध घोषित किए जाने के बाद सरकार ने लोकसभा में इसके खिलाफ विधेयक को स्वीकृति दिलवाई और थोड़ी बहुत मीनमेख के बाद कांग्रेस सरकार के साथ आम सहमति दिखी, लेकिन अब राज्यसभा में यह लटकता दिख रहा है। लोकसभा में दिखी सहमति से लगता था कि राज्यसभा में यह आसानी से पास हो जाएगा परंतु यहां कांग्रेस पार्टी व उसके जैसे अन्य दल राज्यसभा में भाजपा के अल्पमत में होने की कीमत वसूल रहे हैं। कांग्रेस इस विधेयक को संसद की प्रवर समिति को सौंपने की मांग कर रही है। पार्टी ने यह मांग लोकसभा में भी उठाई थी परंतु सरकार ने यह कहते हुए इसे निरस्त कर दिया कि तीन पृष्ठों वाले इस विधेयक के लिए अतिरिक्त समय देना इसे लटकाने जैसा होगा। विपक्ष इस पर चर्चा या जिज्ञासा का समाधान चाहता है तो वह संसद में बहस के दौरान अपने अधिकार का प्रयोग कर सकता है। विधेयक को लोकसभा में समर्थन देने के बाद कांग्रेस का राज्यसभा में मै ना मानूं  का रवैया समझ से परे है। अगर प्रवर समिति इतनी आवश्यक थी तो कांग्रेस ने लोकसभा में विधेयक को समर्थन क्यों दिया?

 

 

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