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जन्म कुण्डली मंगल और शनि की की युति के क्या होते हैं परिणाम



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डेस्क -किसी भी जन्म कुंडली में शनि मंगल की युति व्यवसाय(करियर/रोजगार) के लिए संघर्ष देने वाला होता है। करियर की स्थिरता में बहुत समय लगता है और व्यक्ति को बहुत अधिक पुरुषार्थ करने पर ही करियर में सफलता मिलती है। 

 

शनि मंगल का योग व्यक्ति को तकनीकी कार्यों जैसे इंजीनियरिंग आदि में आगे ले जाता है और यह योग कुंडली के शुभ भावों में होने पर व्यक्ति पुरुषार्थ से अपनी तकनीकी प्रतिभाओं के द्वारा सफलता पाता है। 

 

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि शनि मंगल का यह योग(युति) यदि कुंडली के छटे या आठवे भाव में हो तो स्वास्थ में कष्ट उत्पन्न करता है शनि मंगल का योग विशेष रूप से पाचनतंत्र की समस्या, जॉइंट्स पेन और एक्सीडेंट जैसी समस्याएं देता है।

 

मंगल ग्रह युवा, चुस्त, बलिष्ठ, छोटे कद वाला, रक्त-गौर वर्ण, पित्त प्रकृति, शूरवीर, उग्र, रक्त नेत्र वाला, और गौरवशाली ग्रह है। इसके विपरीत शनि दुर्बल, लंबा शरीर, रूखे बाल, मोटे दांत और नाखून वाला, दुष्ट, क्रोधी, आलसी और वायु प्रकृति वाला ग्रह है। कुंडली में बलवान शनि सुखकारी तथा निर्बल या पीड़ित शनि कष्टकारक और दुखदायी होता है। 

 

इन विपरीत स्वभाव वाले ग्रहों का योग स्वभावतः भाव स्थिति संबंधी उथल-पुथल पैदा करता है। सभी ज्योतिष ग्रंथों ने इस योग का फल बुरा ही बताया है। कुछ आचार्यों ने इसे ‘द्वंद्व योग’ की संज्ञा दी है। ‘द्वंद्व’ का अर्थ है लड़ाई। 

 

यह योग लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर मंगल दोष को अधिक अमंगलकारी बनाता है जिसके फलस्वरूप जातक के जीवन में विवाह संबंधी कठिनाइयां आती हैं।

 

 विवाह के रिश्ते टूटते हैं, विवाह देर से होता है, विवाहोत्तर जीवन अशांत रहता है, तथा विवाह विच्छेद तक की स्थिति पैदा हो जाती है।

 

‘फलदीपिका’ ग्रंथ (अ. 18.3) के अनुसार: दुःखार्तोऽसत्य संधः ससवितृ तनये भूिमजे निन्दिश्च। अर्थात् ‘‘मंगल-शनि साथ हों तो व्यक्ति दुःखी, झूठ बोलने वाला, अपने वचन से फिर जाने वाला और निंदित होता है।’’

 

 ‘सारावली’ ग्रंथ (अ. 15.6) के अनुसार: 

धात्विन्द्रजाल कुशल प्रवन्चक स्तेय कर्म कुशलश्च। 

कुजसौरयोर्विधर्मः शस्त्रविषघ्नः कलिरूचिः स्यात्।। 

 

अर्थात, ‘‘ कुंडली में मंगल और शनि एक साथ होने पर जातक धातुविशेषज्ञ, धोखेबाज, लड़ाकू, चोर, शस्त्राघाती तथा विष संबंधी ज्ञान रखता है। 

 

‘जातक भरणम्’ (द्विग्रह योगाध्याय, श्लोक-15) के अनुसार: शस्त्रास्त्र वित्संगर कर्मकर्ता स्तेयानृतप्रीतिकरः प्रकामम्। सौरव्येन हीनो नितरां नरः स्याद्ध रासुते मन्दयुतेऽतिनिन्द्यः।। 

 

अर्थात्, ‘‘जिसके जन्म समय मंगल और शनि का योग हो, वह अस्त्र-शस्त्र चलाने वाला, चोरी में तत्पर, मिथ्या बोलने वाला और सुख हीन होता है।*

‘मानसागरी’ ग्रंथ (द्विग्रहयोग शनि-मंगल द्वंद्व योग फल) अनुसार: वाग्मीन्द्रजालदक्षश्च विधर्मी कलहप्रियः। विषमद्य प्रपंचाढ्यो मंदमंगल संगमे।। 

 

अर्थात्, ‘‘मंगल-शनि के योग से व्यक्ति वक्ता तथा इंद्रजाल विद्या में निपुण, धर्महीन, झगड़ालू, विष तथा मदिरा के प्रपंच से युक्त होता है।*

 

‘होरासार’ ग्रंथ (अ. 23.19) के अनुसार: कुजमन्दयास्तु योगे नित्यार्तो वातपित्त रोगाभ्याम्। उपचय भवने नैव नृपतुल्यो लोक संपतः स्यात्ः।। 

 

अर्थात्, ‘‘मंगल और शनि की एक भाव में युति वात (गठिया) और पित्त रोग देती है। परंतु उपचय (3, 6, 10,11) भाव में यह युति जातक को सर्वमान्य बनाती है और राज सम्मान देती है। ज्ञातव्य है कि पापी ग्रह उपचय भाव में शुभ फल देते हैं।*

 

‘संकेतनिधि’ ग्रंथ (संकेत IV.66) के अनुसार। द्यूने यमेऽसृजि तदीक्षणतश्च वातार्ता। चंचला सरूधिरा कटि चिन्ह युक्ता।। 

 

अर्थात् ‘‘यदि शनि-मंगल सातवें भाव में हों या वहां दृष्टिपात करें तब पत्नी अस्थिर बुद्धि और वात रोग से ग्रस्त होती है। उसको रूधिर की अधिकता होती है और उसके कटि प्रदेश में चिह्न होता है।

 

ज्योतिष का हर जानकार शनि ग्रह को धरती पर होने वाली सभी बुरी घटनाओ का प्रतीक व कारक मानता हैं संसार मे होने वाले कष्ट , दुख , संताप , मृत्यु , अपंगता, विकलता , दुष्टता ,पतन , युद्ध , क्रूरता भरे कार्य , अव्यवस्था, विद्रोह इत्यादि का कारक ग्रह यह शनि ही माना जाता हैं किसी की भी कुंडली मे इसकी स्थिति बहुत महत्व रखती हैं। 

 

 यह कहा जा सकता हैं की दूसरे भाव मे शनि वैवाहिक जीवन व धन हेतु अशुभ होता हैं जबकि चतुर्थ भाव मे यह कष्टपूर्ण बचपन का प्रतीक बनता हैं इसी प्रकार दशम भाव का शनि पाप प्रभाव मे होने से अपनी दशा मे जातक को ऊंचाई से गिराता हैं अथवा ऊंचे पद से धरातल मे ले आता हैं | इस शनि का सूर्य चन्द्र से सप्तम मे होना हमेशा बुरे परिणाम देता हैं वही गुरु के साथ होने पर यह शनि गुरु दशा मे परेशानी अवश्य प्रदान करता हैं।*

 

इसी प्रकार मंगल ग्रह को धरती पर होने वाले विस्फोटो , हमलो , अग्निकांडों , युद्धो , भूकंपो इत्यादि का कारक माना जाता हैं जातक विशेष की पत्रिका मे यह मंगल दोष के अतिरिक्त कुछ अन्य भावो मे भी हानी ही करता हैं जैसे तृतीय भाव मे यह भात्र सुख मे कमी प्रदान कर अत्यधिक साहसी प्रवृति देता हैं तथा पंचम भाव मे यह तुरंत निर्णय लेने की घातक सोच प्रदान करता हैं।

 

हमारे ज्योतिष शास्त्रो मे शनि मंगल के संबंध वाले जातक के विषय निम्न बातें कही गयी हैं “ऐसा जातक वक्ता , जादू जानने वाला, धैर्यहीन, झगड़ालू , विष व मदिरा बनाने वाला, अन्याय से द्रव प्राप्ति करने वाला, कलहप्रिय , सुख रहित , दुखी निंदित ,झूठी प्रतिज्ञा करने वाला अर्थात झूठा होता हैं | हमने अपने अध्ययन मे काफी हद तक यह बातें सही पायी हैं इसके अतिरिक्त भी कुछ अन्य बातें हमें अपने इस अध्ययन के दौरान प्राप्त हुयी।

आगे देखिए .....

 

 

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