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जानिए वैवाहिक जीवन में तनाव के कारण ज्योतिष एवं वास्तु दोष का आपके वैवाहिक जीवन पर प्रभाव



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डेस्क -विवाह हमारे पारम्परिक सोलह संस्कारों में से एक है, जीवन के एक पड़ाव को पार करके किशोरावस्था से युवास्था में प्रवेश करने के बाद व्यक्ति को जीवन यापन और सामाजिक ढांचे में ढलने के लिए एक अच्छे जीवन साथी की आवश्यकता होती है और जीवन की पूर्णता के लिए यह आवश्यक भी है परन्तु हमारे जीवन में सभी चीजें सही स्थिति और सही समय पर हमें प्राप्त हो ऐसा आवश्यक नहीं है इसमें आपके भाग्य की पूरी भूमिका होती है और जन्मकुंडली इसी भाग्य का प्रतिरूप होती है जहाँ बहुत से लोगो का वैवाहिक जीवन शांति और सुखमय व्यतीत होता है वहीं बहुत बार देखने को मिलता है के व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में हमेशा तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है आपस में वाद विवाद या किसी ना किसी बात को लेकर वैवाहिक जीवन में उतार चढ़ाव की स्थिती बनी ही रहती है ऐसा वास्तव में व्यक्ति की जन्मकुंडली में बने कुछ विशेष ग्रह योगों के कारण ही होता है आईये इसे ज्योतिषीय दृष्टिकोण से जानते हैं।

 

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की विवाह संस्कार भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह मनुष्य को परमात्मा का एक वरदान है। कहते हैं, जोड़ियां परमात्मा द्वारा पहले से ही तय होती हैं। पूर्व जन्म में किए गए पाप एवं पुण्य कर्मों के अनुसार ही जीवन साथी मिलता है और उन्हीं के अनुरूप वैवाहिक जीवन दुखमय या सुखमय होता है। कुंडली में विवाह का विचार मुखयतः सप्तम भाव से ही किया जाता है। इस भाव से विवाह के अलावा वैवाहिक या दाम्पत्य जीवन के सुख-दुख, जीवन साथी अर्थात पति एवं पत्नी, काम (भोग विलास), विवाह से पूर्व एवं पश्चात यौन संबंध, साझेदारी आदि का विचार किया जाता है। 

 

यदि कोई भाव, उसका स्वामी तथा उसका कारक पाप ग्रहों के मध्य में स्थित हों, प्रबल पापी ग्रहों से युक्त हों, निर्बल हों, शुभग्रह न उनसे युत हों न उन्हें देखते हों, इन तीनों से नवम, चतुर्थ, अष्टम, पंचम तथा द्वादश स्थानों में पाप ग्रह हों, भाव नवांश, भावेश नवांश तथा भाव कारक नवांश के स्वामी भी शत्रु राशि में, नीच राशि में अस्त अथवा युद्ध में पराजित हों तो उस भाव से संबंधित वस्तुओं की हानि होती है। (उत्तर कालामृत) वैवाहिक जीवन के अशुभ योग यदि सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ, अष्टम या द्वादश भावस्थ हो और नीच या अस्त हो, तो जातक या जातका के विवाह में बाधा आती है। यदि षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश सप्तम भाव में विराजमान हो, उस पर किसी ग्रह की शुभ दृष्टि न हो या किसी ग्रह से उसका शुभ योग न हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा आती है। 

 

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि सप्तम भाव में क्रूर ग्रह हो, सप्तमेश पर क्रूर ग्रह की दृष्टि हो तथा द्वादश भाव में भी क्रूर ग्रह हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा आती है। सप्तमेश व कारक शुक्र बलवान हो, तो जातक को वियोग दुख भोगना पड़ता है। यदि शुक्र सप्तमेश हो (मेष या वृश्चिक लग्न) और पाप ग्रहों के साथ अथवा उनसे दृष्ट हो, या शुक्र नीच व शत्रु नवांश का या षष्ठांश में हो, तो जातक स्त्री कठोर चित्त वाली, कुमार्गगामिनी और कुलटा होती है। फलतः उसका वैवाहिक जीवन नारकीय हो जाता है। यदि शनि सप्तमेश हो, पाप ग्रहों क साथ व नीच नवांश में हो अथवा नीच राशिस्थ हो और पाप ग्रहों से दृष्ट हो, तो जीवन साथी के दुष्ट स्वभाव के कारण वैवाहिक जीवन क्लेशमय होता है।

 

ज्योतिषीय दृष्टिकोण में हमारी कुंडली का “सप्तम भाव” विवाह का भाव होता है अतः हमारे जीवन में विवाह, वैवाहिक जीवन, पति, पत्नी आदि का सुख सप्तम भाव और सप्तमेश (सातवें भाव का स्वामी) की स्थिति पर निर्भर करता है। इसके आलावा पुरुषों की कुंडली में “शुक्र” विवाह, वैवाहिक जीवन और पत्नी का नैसर्गिक कारक होता है तथा स्त्री की कुंडली में विवाह, वैवाहिक जीवन और पति सुख को “मंगल” और “बृहस्पति” नियंत्रित करते हैं अतः जब किसी व्यक्ति की कुंडली में वैवाहिक जीवन को नियंत्रित करने वाले ये घटक कमजोर या पीड़ित स्थिति में हो तो वैवाहिक जीवन में बार बार तनाव, वाद–विवाद या उतार चढ़ाव की स्थिति बनती है।

 

हर घर की यही कहानी है कि पहले जो दो लोग आपस में एक दूसरे से इतना प्रेम करते थे वही आज छोटी-छोटी बात पर आपस में झगड़ते हैं. कभी-कभी तो झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि कई दिन तक एक दूसरे कि शक्ल तक नहीं देखते. शादी में बेवफाई का क्या कारण है। हाल ही में एक रिसर्च के अनुसार 10 प्रतिशत तलाक पार्टनर की बेवफाई के कारण होते हैं। पति-पत्नी इस कारण से अपने रास्ते अलग-अलग कर लेते हैं यह स्वाभाविक है लेकिन बहुत से लोगों का रिश्ता इसलिए खराब हो जाता है क्यों कि वे एक दूसरे को धोखा देते हैं। यह काफी चौकाने वाला लगे लेकिन ये सच है बहुत से असंतुष्ट पार्टनर अपने साथी से अलग होने से पहले उसको धोखा देते हैं। पुरुषों का धोखा देना और महिलाओं का धोखा देना अलग-अलग तरह का होता है। कुछ पुरुष तो इस रिश्ते के अलावा बाहर मजे लेने के लिए ही अपनी पत्नी को धोखा देते हैं।

 

कुछ पुरुष जब तक परेशानी में नहीं पड़ते तब तक शर्म महसूस नहीं करते हैं। जहां तक महिलाओं का सवाल है वे अपने साथी को खास तौर पर धोखा तब देती हैं जब वे अपने आपको रिश्ते में भावनात्मक रूप से अकेला पाती हैं। स्त्री-पुरुषों में धोखा देने का तरीका और आदत अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन धोखा देने के पीछे उद्देश्य लगभग एक जैसा ही होता है। 

 

 

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