एक गाँव ऐसा जहाँ चुनाव में नहीं रंगी जाती हैं दीवारें

नई दिल्ली -राजनीती से प्रेरित समाज में आजकल जब ज्यादातर चीजें और लोगों को धर्म, नस्ल, जाति आदि के आधार पर बांटने की कोशिशें चालू हों, ऐसे हालात में तमिलनाडु के एक गांव ने एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। इस गांव ने पिछले 4 दशकों से राजनैतिक रूप से तटस्थ और निष्पक्ष रवैया अपनाते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाई है। ये एक ऐसा छोटा सा गांव है जहां किसी भी राजनैतिक पार्टी के झंडे, बैनर्स और पहचान के दूसरे चिह्न दिखाई नहीं देते। रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु के वैल्लूर-आई नाम के इस गांव में कोई भी राजनैतिक चिह्म, पोस्टर या बैनर नहीं हैं। गौरतलब है, भारतीय चुनाव आयोग विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के लिए आचार संहिता और संबंधित नियम बनाता है। यही आचार संहिता रिहायशी इलाकों में बहुतायत में राजनैतिक झंडों, बैनर्स के प्रयोग पर रोक लगाती है। लेकिन आचार संहिता के तहत इस नियम के बनाए जाने से काफी पहले ही इस गांव के वरिष्ठों ने एक कदम उठाया था। 3,000 की जनसंख्या वाले गांव ने गांव के वरिष्ठों के इस अलिखित नियम में भागीदारी ली। राजनैतिक प्रतीकों की कमी से गांववालों में एकता का भाव रहता है। इसके अलावा बच्चे भी छोटी उम्र में ही राजनैतिक विचारों के प्रभाव में नहीं आते। पिछले साल, गांव के एक सदस्य पर जुर्माना लगाया गया, जब पार्टी के कार्यकर्ताओं ने दीवार पर एक प्रतीक बनाया। एक इंटरव्यू में 20 वर्षीय बालाजी ने बताया, "हम अपने वरिष्ठों और पूर्वजों का सम्मान करते हैं। यहां, दीवारों को रंगने पर कोई ध्यान नहीं देता। मैंने कभी भी किसी भी राजनैतिक पार्टी के सदस्यों को अपना झंडा फहराते नहीं देखा। यहां के लोग अन्नाद्रमुक, द्रमुक और वीसीके से जुड़े हैं, लेकिन वे गांव के अनुशासन का पालन करते हैं।" हालांकि, राजनैतिक प्रतीकों की कमी के बाद भी ऐसा नहीं है कि यहां राजनैतिक गतिविधि नहीं होती। कई राजनैतिक पार्टियों को गांव में रैली करने के लिए अनुमति लेनी होती है। वेल्लूर-आई ने पिछले चुनावों में 90 फीसदी मतदान किया। सौजन्य से टाइम्स ग्रुप

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