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मनमाने मुस्लिम तलाक कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

मनमाने मुस्लिम तलाक कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
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सुप्रीम कोर्ट ने यूनिफॉर्म सिविल कोड पर एकबार फिर बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने मनमाने ढंग से दिए जाने वाले तलाक और पहली शादी के दौरान ही की जाने वाली दूसरी शादी से मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर चिंता जताई है।

कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह ऐसे तरीकों का सुझाव दे, जिनसे देश में दूसरे धर्मों की महिलाओं जैसा बर्ताव ही मुस्लिम महिलाओं के साथ सुनिश्चित हो सके। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कानूनों की समीक्षा करने का फैसला किया है। जस्टिस अनिल आर दवे और जस्टिस एके गोयल की बेंच ने कहा कि मनमाने ढंग से दिए जाने वाले तलाक और दूसरी शादियों ने मुस्लिम महिलाओं की सुरक्षा छीन ली है। बेंच ने इस बात पर हैरत जताई कि संविधान में जब सबको बराबरी का अधिकार दिया गया है तो इन महिलाओं से भेदभाव क्यों हो रहा है।

'मनमाने तलाक और पहली शादी बने रहने के दौरान ही पति के दूसरा विवाह कर लेने के खिलाफ कोई सुरक्षा उपाय न होने से इन महिलाओं को सुरक्षा नहीं मिल पाती।' कोर्ट ने 1980 के दशक में शाहबानो वाले मामले में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को बराबरी की सुरक्षा देने की कोशिश की थी तो राजीव गांधी सरकार ने उस फैसले को उलटने के लिए कानून बना दिया था। कोर्ट की उस रूलिंग ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को तब तक अपने पति से गुजारा-भत्ता पाने का अधिकार सीआरपीसी के सेक्शन 125 के तहत दिया था, जब तक कि उन महिलाओं की दोबारा शादी नहीं हो जाती।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से उपाय सुझाने को कहा है ताकि मुस्लिम महिलाओं के साथ भी उसी तरह का व्यवहार हो जिस तरह से देश में अन्य धर्मों की महिलाओं के साथ होता है। वहीं कोर्ट के मुस्लिम कानून पर दिए गए निर्देश के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं की मिलीजुली प्रतिक्रिया आई है। सुप्रीम कोर्ट दरअसल सरकार को किसी खास कानून के बारे में सुझाव ही दे सकता है और कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है। बेंच ने सरकार से 30 अक्टूबर 2015 को इस पर जवाब देने को कहा है कि वह यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन करती है या नहीं।

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