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जब जनता ही इन्हें हटा रही थी तो मंत्रियों को हटाने से क्या फायदा-लक्षमीकान्त

जब जनता ही इन्हें हटा रही थी तो मंत्रियों को हटाने से क्या फायदा-लक्षमीकान्त
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लखनऊ -अब तो जनता ही इनकों हटाने जा रही थी तब मंत्रियों को हटाकर इनकों कोई राजनैतिक लाभ मिलने वाला नहीं। श्री गायत्री प्रजापति को क्यों नहीं हटाया गया। क्या भ्रष्टाचार पर मा0 मुख्यमंत्री सहमत है और पिछले कुछ माह से आजम खां जी द्वारा दिये गये बयान में मा0 मुख्यमंत्री सहमत है। अनिल यादव प्रकरण मा0 उच्च न्यायालय ने श्री अनिल यादव की नियुक्ति अवैध घोषित कर दी तब श्री अनिल यादव के गलत निर्णयों का विरोध करने वाले नौजवानों पर संघर्ष/आन्दोलनों के दौरान पुलिस द्वारा कायम किये गये मुकदमों को वापिस लिये जाने की मांग करता हूँ। आरोपित नौजवानों का भविष्य अन्धकारमय होने से रोका जाना चाहिए। बदायूॅ प्रकरण पाक्सों कोर्ट द्वारा सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को रद्द करना बताता है कि प्रदेश सरकार द्वारा सीबीआई को केस न केवल विलम्ब से सौंपा गया, बल्कि स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए लगातार सीबीआई से असहयोग किया गया, उन्हें समय पर कागजात नहीं उपलब्ध कराये गये, मृतक किशोरियों के शव को जमीन से पुनः निकाल कर दोबारा पोस्टमार्टम कराने की अनुमति देने में इतना विलम्ब किया गया कि बाढ़ के कारण जमीन में शव अपने स्थान से हट गये और मिल नहीं सके। इस कारण उनका विधिवत दोबारा पोस्टमार्टम व उसका वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं हो सका। इससे पूर्ण रूप से पुख्ता साबूत एकत्र करने में सीबीआई को मदद् नहीं मिली। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डा0 लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने उ0प्र0 में अवैध खनन को लेकर मुख्यमंत्री को विस्तृत पत्र लिखकर खनन में लिप्त अधिकारियों की जांच और खनन मंत्री गायत्री प्रजापति की मांग की। मा0 मुख्यमंत्री को पत्र माननीय मुख्यमंत्री जी, उत्तर प्रदेश। विषय: उत्तर प्रदेष में खनन उद्योग के नाम पर संचालित हो रही अवैध गतिविधियों का कच्चा चिट्ठा। उत्तर प्रदेश में खनन के नाम से चल रही अवैध गतिविधियों से आप परिचित हैं। लेकिन आपके और मा0 मुलायम सिंह यादव के बार-बार कहने के बावजूद ऐसा आभास हो रहा है कि खनन के क्षेत्र में एक कहावत चरितार्थ हो रही है ’’ज्यों-ज्यों दवा की, त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया’’। अवैध खनन उद्योग के कारण उत्तर प्रदेष में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972, वन संरक्षण अधिनियम 1980, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, राष्ट्रीय वन नीति 1988 तथा श्रम कानूनों, स्वास्थ्य संबंधी कानूनों, परिवहन संबंधी कानूनों का खुल्लमखुल्ला उल्लंधन हो रहा है। खेद तो यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार के निम्नांकित विभाग इसमें लिप्त हैं जिसमें इन विभागों द्वारा न तो सरकारी नियमों कायदों की चिन्ता की जा रही है और न ही इन उद्योग से लगे मजदूरों के जीवन की, कार्य करने की परिस्थिति की और उनके रहने वाले परिवारों के लिए आवश्यक व्यवस्थायें जैसे-बच्चों के लिए स्कूल, इलाज आदि का प्रबन्ध नहीं किया जा रहा है। विभागों के नाम: ऽ खनन विभाग। ऽ वन विभाग एवं पर्यावरण विभाग। ऽ परिवहन विभाग। ऽ श्रम विभाग। ऽ ई0एस0आई0 विभाग। ऽ पुलिस व प्रशासन विभाग। खनन विभाग: ऽ बिल्ली मारकुंडी के खनन क्षेत्र में दिनांक 27.02.2012 को खदान धंसने से 12 लोगों की मौत। ऽ दिनांक 27.08.2015 को सोनभद्र के डाला खनन क्षेत्र में सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण युवक विनोद की मृत्यु और एक घायल। ऽ दिनांक 15.10.2015 को थाना-ओबरा क्षेत्र के बिल्ली मारकुंडी की रास पहाड़ी पर विस्फोट से 8 मजदूरों की मौत। ऽ प्रतीक के रूप में उपरोक्त घटनायें निम्नांकित प्रष्नों को अपने पीछे छोड़ गई हैं और महत्वपूर्ण विषय भी छोड़ गई हैं कि सरकार के विभागों ने भी इन घटनाओं को गंभीरता से न लेकर और भविष्य में ऐसी घटनायें न हों, इसकी कोई व्यवस्था नहीं की है। ऽ दिनांक 15.10.2015 को आशीष इंटरप्राइजेज के विस्फोटक से भरे गोदाम, उसी कमरे में डीजल से भरा ड्रम और पास में रखे जनरेटर जो काके सिंह के खदान के पास था, में विस्फोट के कारण यह हादसा हुआ। ऽ स्पष्ट है कि मानकों की अनदेखी हुई। प्रतिबंधित क्षेत्र में बिना डड.11 के यह विस्फोटक कैसे आया। ऽ खदान क्षेत्र में विस्फोट के लिए प्रषिक्षित विषेष प्रबंधक की नियुक्ति नहीं करके अप्रषिक्षित मजदूरों से यह कार्य कराया जा रहा था। क्या यह नियमानुसार था? ऽ रास पहरी की आराजी संख्या-5593-क की 12 खदानों का न तो परमिट जारी किया गया और न ही इन पट्टाधारकों को नियमानुसार पत्थरों का परिवहन कराना था। अवैधानिक गतिविधि ऽ रात में खनन प्रतिबन्धित है जबकि धड़ल्ले से दिन रात खनन होता रहता है। ऽ पुल के नीचे खनन वर्जित है एवम् जल धारा से 3(तीन) मीटर दूर खनन वर्जित है, परन्तु इसका सरेआम उल्लंधन हो रहा है। ऽ नदी की जल धारा मोड़ना वर्जित है जबकि अधिकाशतः जल धारा रोक कर खनन हो रहा है। ऽ तीन मीटर से अधिक गहरा खनन नहीं होना चाहिये जबकि बड़ी मशीनों से 15 मीटर गहरा तक खनन हो रहा है। ऽ खनन कार्य गाॅव के मजदूरों द्वारा कराये जाने का प्राविधान है, जिससे रोजगार का सृजन हो सके। परन्तु अत्याधुनिक मशीनों पोर्कलेन एवं लिफ्टर से खनन कराया जा रहा है। अर्थात् बेरोजगारी का निदान नहीं। मा0 मुख्यमंत्री जी की घोषणा का पालन भी नहीं। ऽ खनन रायल्टी का 50 प्रतिषत खनन क्षेत्र के विकास पर व्ययः- मुख्य मंत्री/श्री अखिलेश यादव ने खनिज नीति में संशोधन करते हुये खनिज नियमावली-2014 में यह व्यवस्था की कि अब रायल्टी का 50 प्रतिशत खनन क्षेत्र के विकास पर व्यय होगा। पट्टाधारक का चयन टंेडर से होगा। इसमें रायल्टी एवम् डेड रेट के अलावा अधिकतम् बोली लगाने वाला आवेदक चयनित किया जाना है। परन्तु इन मानकों का पालन नहीं हो रहा है। खनन परिवहन के नाम पर टप्च् वसूली: 1. स्टोन-खनन परिवहन के लिए डड.11 फार्म जारी किया जाता है। इसमें 20 घन मीटर डोलो माइट स्टोन अनुमन्य होती है। सरकारी खर्च रू0 2700 (रू0- 2100 रायल्टी, रू0 370 ट्रेड टैक्स, रू0 150 विकास प्राधिकरण टैक्स, रू0 100 इनकम टैक्स) होता है। लेकिन यहाँ पर टप्च् टैक्स रू0 3500 अतिरिक्त वसूला जाता है तथा सरकार को रू0 2700, नेता और अधिकारियों की रू0 3500 की व्यवस्था है। 2. बालू-सरकारी खर्च रू0 1900 (रू0- 1500 रायल्टी, रू0 250 ट्रेड टैक्स, रू0 100 विकास प्राधिकरण टैक्स, रू0 50 इनकम टैक्स) होता है। टप्च् टैक्स रू0 9000 अतिरिक्त वसूला जाता है तथा सरकार को रू0 1900, नेता और अधिकारियों की रू0 9000 की व्यवस्था है। यहाँ पर अवैध खनन को बन्द कराना तथा वनवासी/ आदिवासियों को उनकी पुस्तैनी जोत कोड की जमीन का मालिकाना हक दिलाना महत्वपूर्ण समस्या भी है और आवष्यकता भी है। इसकी ब्ण्ठण्प्ण् जाँच के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। सोनभद्र क्षेत्र में डोलोमाइट स्टोन की 101 खदानें, सैंड स्टोन की 86 खदानें, बालू-मोरंग की 13 खदानें। कुल 200 खदानों के पट्टे स्वीकृत हैं और वास्तविक खदाने 1000 कार्य कर रही है। अर्थात् 800 खदानें अवैध हैं। आप कल्पना करें कि सोनभद्र से प्रति वर्ष 27198 करोड़ का राजस्व मिलता है तब यदि 1000 खदानें नियमित होती तो रू0 1,35,990 करोड़ सरकार को मिलता। यह अवैध धन उगाही अवैध खनन के संरक्षण दाताओं में बंटता है। वाह रे जनपद के खनन अधिकारी श्री रामेष्वर यादव जो लम्बे समय से इसी जनपद में डटे हैं और बार-बार इसी जनपद में लौट कर आ जाते हैं। जिलाधिकारी, सोनभद्र के द्वारा श्री रामेष्वर यादव के स्थानान्तरण हेतु लिखने के बावजूद रामेष्वर यादव का स्थानान्तरण तो हुआ नहीं, जिलाधिकारी का ही स्थानान्तरण हो गया। यदि बुन्देलखंड की तरफ हम ध्यान दें तो महोबा, हमीरपुर, ललितपुर में वन एवं परिवहन विभाग से राजस्व नहीं दिये जाने के कारण लगभग 300 करोड़ राजस्व की क्षति हुई है। वन एवं पर्यावरण विभाग: ऽ जनपद-सोनभद्र में सोन नदी के किनारे कैमूर वन्य जीव विहार का निर्माण हुआ है जिसमें काले हिरण, कछुआ, मगरमच्छ और घडि़याल की प्रजातियों को संरक्षण देने का कार्य किया गया था। ऽ ट्रकों के आवागन और डायनामाइट विस्फोट के कारण हिरणों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। ऽ कछुआ, मगरमच्छ, घडि़याल की प्रजातियों को खतरा है-ग्राम-कोटा से होकर कनहर नदी प्रवाहित होती है इसका अधिकांश भाग वन क्षेत्र में है, यह सेंचुरी क्षेत्र का भाग है तथा नदी में रहने वाले कछुए, मगरमच्छ, घडि़याल अपने अंडे रेत में देते हैं, खनन से उनके अंडे नष्ट हो जाते हैं, जिससे उनके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। ऽ जनपद-सोनभद्र का सिंगरौली जोन विष्व में 9वाँ प्रदूषित स्थान है तथा नेषनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने नये क्रेषर प्लांट लगाने पर पूर्ण प्रतिबन्द लगा रखा है, इसके बावजूद जनपद में लगभग 400 क्रेषर प्लांट हैं जिसके शोर और उड़ने वाली धूल से इस क्षेत्र में रहने वाले परिवार और बच्चे टी0बी0, श्वांस की बीमारी और डिप्थीरिया रोग से ग्रसित हो रहे हैं। लेकिन वाह रे पर्यावरण विभाग, जनपद का प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी श्री कालिका सिंह 7 वर्षों से वहीं जमा बैठा है, मौज ले रहा है और दायित्व व कानूनों का पालन नहीं कर रहा है। ऽ डायनामाइट लगाने से पूरा पहाड़ दरक कर हिल जाता है। पहाड़ों की मिट्टी नरम व भुरभुरी हो जाती और और अगली वर्षा में बड़े पैमाने पर भूक्षरण के कारण पेड़ गिर जाते हैं। ऽ मशीनों से खुदाई की अनुमति न होने के बावजूद नदियों में पोर्कलेन मशीन से खुदाई होती है। बाद में नदियों में नहाने वाले बच्चे और लोग उसके गड्ढों में फंस जाते हैं और यह उनकी मौत का कारण बन जाता है। खनन उद्योग में परिवहन विभाग की अवैध वसूली का विवरण: सोनभद्र ओवर लोडेड ट्रकों की मण्डी एवं परिवहन विभाग की अवैध कमाई ऽ ट्रको की जनपदों में प्रवेश की अवैध दरे ं(प्रतिमाह प्रति ट्रक)ः- सोनभद्र रू0 2200 वाराणसी रू0 3000 मिर्जापुर रू0 2800 चन्दौली रू0 1800 भदोही रू0 1800 देवरिया रू0 2000 जौनपुर रू0 1600 गोरखपुर रू0 3500 आजमगढ रू01800 कुशीनगर रू0 2200 ऽ अवैध प्रवेश फीस सोनभद्र में ही जमा करके सभी जिलों में ट्रको को प्रवेश कराया जा सकता है। ऽ अकेले सोनभद्र से 5000 ट्रकें विभिन्न जनपदों को जाती है ऽ यह अवैध प्रवेश फीस वाराणसी-शक्तिनगर सड़क के किनारे सुकृत, हिन्दुआरी, उमरौरा में होटल ढ़ावा, मारकुंडी कस्वे में चाय पान, स्पेयर पाटर््स, टायर की दुकान, चोपन पुल के पास पेट्रोल पम्प, तथा कस्वे के एक ट्रांसपोर्टर के यहाॅ जमा करके दलालों से कोड प्राप्त किया जाताहै। उसी कोड के सहारे ट्रक विभिन्न जिलों को पार करते है। हर माह की 10 तारीख तक ये दलाल/एजेंट पूरा डाटा ट्रक नम्बर, कोड सहित समस्त जनपदों के परिवहन अधिकारियों को सौपते है, फिर वे (एआरटीओ) चेकिंग में निकलते है। तथा जो ट्रक ड्राइवर मानक के अनुरूप भी होते हैं तथा अवैध प्रवेश फीस नहीं दिये होते हैं उनकी प्रताड़ना शुरू होती है। परिवहन सिपाही 10-10 वर्षों से अधिक समय से इन जिलों में तैनात हैं, वे दलालों एवं परिवहन अधिकारियों के बीच विचैलियों का काम करते है। बुन्देलखंड में खनन के बाद परिवहन की स्थितिः बाॅदा से बालू/मोरंग की प्रवेष फीस निम्नलिखित हैः- ऽ झाॅसी आरटीओ नगर रू0 4800 झांसी आरटीओ देहात रू0 3100 जालौन, उरई रू0 4800 हमीरपुर रू0 2900 रमाबाई, कानपुर नगर रू0 3100 ऽ जिला परिषद की रसीद प्रति चक्कर रू0 60/- के स्थान पर रू0 150/- ऽ तीन बैरियर रू0 280/-प्रति चक्कर ऽ ट्रैफिक पुलिस इंट्री रू0 2000/- प्रति चक्कर मोरंग ढुलाई में अकेले बाॅदा में लगभग 3000 ट्रकें लगी है। प्रति ट्रक रू0 13800/- प्रतिमाह परिवहन पर अवैध वसूली होती है। इस प्रकार बांदा जनपद से रू04.14 करोड़ प्रति माह की काली कमाई परिवहन से होती है। विधिक/कानूनी स्थिति एवं नियम ऽ मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दे रखा है कि वन्य जीव विहार से 10 कि0मी0 परिधि में कोई खनन न किया जाय। बिल्ली मारकुंडी वन्य जीव विहार से 2.1 कि0मी0 पर है। ऽ 27-2-12 को मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने सभी खनिज सम्पदा के खनन पूर्व भारत सरकार के वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेना अनिवार्य कर दिया है। परन्तु सोनभद्र की 90 प्रतिशत खदानों में बिना अनापत्ति प्रमाण-पत्र के खनन हो रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिनांक 1-10-2012 को अपने फैसले में ऐसी सभी खनन गतिविधयों पर रोक लगा दी थी जिनके पास पर्यावरण विभाग के सहमति प्रमाण-पत्र नहीं है। पहले यह रोक 5 हेक्टेयर से नीचे की बालू/मोरंग की खदानों के लिये थी, लेकिन बाद में स्थिति व गम्भीरता को देखते हुये सभी खदानों के लिये आवश्यक कर दिया गया। ऽ सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना किसी भी बन भूमि को किसी प्रोजेक्ट व व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। संविधान के अनुसार किसी भी वन भूमि के संबंध में कोई भी राज्य कोई कानून केन्द्र सरकार की सहमति के बिना नहीं बना सकती। 1987 में प्रदेश सरकार ने केन्द्र की सहमति के बिना उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन अधिनियम 1950 में संशोधन करके धारा 131-ए जोड़ दिया। इस परिवर्तन से उन लोगों को भूमि का असंकम्रणीय अधिकार दे दिया गया जो 30 जून, 1978 या उससे पहले धारा-4 की उस भूमि पर काबिज थे। इस कारण तमाम लोगों ने राजस्व तथा बन कर्मियों की सांठ-गांठ से अपने को 30 जून 1978 से पहले का कब्जेदार दिखा कर हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि हड़प ली। धारा-4 एवं धारा-20 कृषि भूमि को बन भूमि में परिवर्तित करने की प्रकिया है जिसके लिये बन्दोबस्त अधिकारी (एसडीएम) सक्षम अधिकारी है। अवैध खनन में सहयोग करने हेतु सरकार ने विगत 28 वर्ष में एक लाख हेक्टेयर भूमि परिवर्तित की है। ऽ उ0प्र0 सरकार ने बिल्ली मारकुंडी ग्राम की 107.34 हेक्टेयर वन भूमि के प्रत्यावर्तन का प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा था, परन्तु उसे निरस्त कर दिया गया था। इस निरस्त प्रस्ताव में आराजी सं0-55.93 भी थी जहाॅ पर विस्फोट की घटना घटी। ऽ बिल्ली मारकुंडी की सम्पूर्ण खदानें वन विभाग के अन्तर्गत आती हैं। प्रभागीय वन अधिकारी द्वारा अनधिकृत अनापत्ति प्रमाण-पत्र निर्गत किये गये थे। एस0पी0 चैरसिया (बन रेंजर) प्रभारी डीएफओ ने अनापत्ति जारी किये। उसी आधार पर खनन पट्टे जारी हुये। इसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी खनन अधिकारी, सर्वेक्षक, प्रभागीय वन अधिकारी की है। श्रम/म्ण्ैण्प्ण् विभाग: श्रम विभाग ने अपने विभागीय कानूनों के अन्तर्गत श्रमिकों का संरक्षण करने के लिए जितने भी प्राविधान हैं उनका कोई भी पालन नहीं किया है और न ही कराया है। खदानों में कार्य कर रहे हजारों श्रमिकों का न तो श्रम विभाग पंजीयन करता है एवं न ही खदान मालिकों को उनका वैध अभिलेख रखने के लिए वाध्य करता है और न रखने पर उनको दंडित भी नहीं करता है। ऽ बाल श्रमिकों की संख्या भी इन खदानों में अत्यधिक है। ऽ स्टोन क्रेषरों पर कार्यरत् श्रमिकों से संबंधित कानूनों का भी पालन नहीं कराते हैं और खनन माफियाओं के चंगुल में उनके हितों को भी फंसा रखा हैं। खदान और स्टोन क्रेषरों पर कार्यरत् श्रमिकों एवं उनके परिवारों के स्वास्थ्य संबंधी आवष्यकताओं की कोई व्यवस्था नहीं है, नियमों की पूर्णतः अनदेखी है और खनन माफियाओं के समक्ष यह विभाग भी नतमस्तक है। कानून व्यवस्था: इस क्षेत्र में होने वाली सभी अवैधानिक गतिविधियों को संरक्षण जिले की पुलिस एवं प्रशासन का भी है और इस क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों को रोकने और कानून का पालन कराने, मजदूरों को संरक्षण देने का जो उसका कार्य है, वह न करके खनन माफियाओं को संरक्षण देना, अवैध परिवहन की वसूली करने में संलिप्त है। मा0 मुख्यमंत्री जी, मेरा आपसे अनुरोध है कि कृपया उपरोक्त तथ्यों का संज्ञान लें और उसका सत्यापन करा लें और सत्यापित तथ्यों के आधार पर भविष्य के लिए नजीर बने, और आपकी घोषणाओं पर और मा0 मुलायम सिंह यादव जी की नसीहतों पर अमल होता दिखे, ऐसी कार्यवाही करने का आप कष्ट करेंगे तो मैं भी आभारी होऊँगा और सरकार को अधिक राजस्व की प्राप्ति होगी, प्राप्त अधिक राजस्व विकास में लग सकेगा और अवैध धन के आधार पर कानून व्यवस्थाओं की समस्या होना बन्द हो जायेंगी, प्रदेष का पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। इस क्षेत्र में अवैध गतिविधियों के कारण मृत मजदूरों को आर्थिक सहायता भी न्यूनतम् रू0 10 लाख से कम नहीं होनी चाहिए और उसकी वसूली इस क्षेत्र में अवैध गतिविधि करने वाले लोगों से होनी चाहिए। साथ ही अवैध खनन करने वालों के खिलाफ जिनकी खान पर मजदूरों की मृत्यु होती है उनपर आई0पी0सी0 की धारा-304 के अन्तर्गत अभियोग पंजीकृत करके कार्यवाही भी होनी चाहिए। इस पूरे प्रकरण की गंभीरता व संवेदनशीलता को देखते हुए मैं दृढ़ता से मांग करता हूँ कि उपरोक्त खनन गतिविधियों को पूर्ण संरक्षण देने वाले भ्रष्टाचार में लिप्त अपने खनन मंत्री श्री गायत्री प्रजापित को तत्काल बर्खास्त किया जाये। साथ ही उपरोक्त भ्रष्टाचार में लिप्त विभिन्न विभागों के समस्त अधिकारियों के विरूद्ध जांच करके दंडित किया जाये।
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