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25 नवंबर को है गुरु नानक देव का प्रकाश पर्व

25 नवंबर को है गुरु नानक देव का प्रकाश पर्व
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जयपुर-- कार्तिक मास की पूर्णिमा को गुरु नानक देवजी का प्रकाश पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह (25 नवम्बर- बुधवार) को है। इस दिन गुरुद्वारों में विशेष पूजा की जाती है और गुरुवाणी का पाठ कर लंगर लगाया जाता है। गुरु नानक देव सिखों के प्रथम गुरु थे। उनका प्राकट्य तलवंडी (वर्तमान पाकिस्तान) में 1469 में हुआ था।उन्होंने अनेक स्थानों की यात्रा की और लोगों को दिव्य ज्ञान दिया। 22 सितंबर 1539 को उन्होंने मानव देह का त्याग किया था। नानक देवजी के उपदेशों का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके पास परमात्मा की दिव्य शक्तियां थीं।उनके उपदेश जितने सरल और सीधे हैं, उनका असर उतना ही व्यापक है। नानक देव जितने उच्च कोटि के संत थे, मानव मन के भी उतने ही बड़े जानकार थे। जो काम बड़े से बड़ा विद्वान और राजा उस समय नहीं कर सका, वह उन्होंने अपने प्रवचनों से कर दिखाया। ऐसी ही एक सत्य कथा है, जब नानक देव ने डाकुओं की जिंदगी बदल दी थी।एक बार गुरु नानक देव जगन्नाथ पुरी जा रहे थे। उस जमाने में न तो कोई रेल थी और न ही यात्रा के आज जैसे साधन। पैदल या घोड़ों पर ही यात्रा की जाती थी। नानक देव को पैदल भ्रमण करना पसंद था, क्योंकि इसके जरिए वे सामान्य लोगों की जिंदगी से रूबरू होते थे।वे अपने रास्ते जा रहे थे। तभी उनका सामना डाकुओं से हो गया। डाकुओं के सरदार ने देखा, इस व्यक्ति के चेहरे पर जैसी आभा है, वह आज तक किसी और चेहरे पर दिखाई नहीं दी। संभवतः यह बहुत धनवान व्यक्ति है जिसे लूटकर हम पूरी जिंदगी के अभाव दूर कर लेंगे।वह अपने पूरे गिरोह के साथ आया और गुरु नानक देव से बोला, जो कुछ माल तुम्हारे पास है, सब हमें दे दो। अन्यथा अभी तुम्हारी हत्या कर देंगे।डाकू पूरी तैयारी के साथ आए थे लेकिन नानक पर उनका कोई खौफ नहीं था। वे बोले, ठीक है, जो कुछ लेना चाहते हो, ले सकते हो, लेकिन मेरी एक अंतिम इच्छा भी है।सरदार बोला, आज तक हमसे किसी ने अंतिम इच्छा का जिक्र नहीं किया। फिर भी हम तुम्हारी इच्छा पूरी करेंगे। जल्दी बताओ, क्या है तुम्हारी अंतिम इच्छा?नानक देव ने फरमाया, मेरी अंतिम इच्छा ये है कि जब तुम हमें मार दो तो शव का अंतिम संस्कार जरूर कर देना, ताकि इस मानव देह का अपमान न हो। इसलिए पहले आग जलाने का प्रबंध कर लो।इस अनोखी मांग को सुनकर पहले तो डाकू चकित हुए, लेकिन उन्होंने सोचा, यह कोई ऐसी मांग नहीं जो कि हम पूरी न कर सकें। इसलिए सरदार अपने दो डाकुओं के साथ आग लाने के लिए रवाना हुआ।चलते-चलते उन्हें कहीं दूर धुआं दिखाई दे रहा था। वे उसी दिशा में चल दिए। वहां पहुंचकर देखा कि गांव के लोग एक शव की अंत्येष्टि कर रहे थे। डाकू उन लोगों के पास गए और उनकी बातें सुनने लगे।लोग उस मृतक की निंदा कर रहे थे। एक व्यक्ति कह रहा था, अच्छा हुआ जो यह दुष्ट मर गया। जीवित रहता तो न जाने कितने लोगों को संकट में डालता।दूसरा कह रहा था, भगवान ऐसा पुत्र दे इससे अच्छा तो यही है कि व्यक्ति निसंतान रह जाए। भला वह जीना भी क्या जीना जिसमें इंसान कोई नेक काम न करे। ऐसे लोगों के जीवन पर तो धिक्कार है।डाकुओं ने यह बात सुनी तो वापस आ गए। आज उन्हें यह महसूस हो रहा था कि अब तक बुरे काम कर वे अपने लिए न जाने कितनी गहरी नर्क की खाई खोद चुके हैं। क्या इसका कोई प्रायश्चित भी है?उन्होंने नानक देव के चरण पकड़ लिए और बोले, महाराज, आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। आज तक हमने न जाने कितने लोगों का जीवन उजाड़ा, लेकिन हमें ऐसा उपदेश किसी ने नहीं दिया। अब आप ही बताइए हम क्या करें?नानक बोले, सबसे पहले यह काम छोड़ दो और प्रतिज्ञा करो कि जीवन में कभी किसी का हक नहीं मारोगे, कभी चोरी नहीं करोगे, कभी किसी की हत्या नहीं करोगे। भूलवश तुमने अब तक की जिंदगी पाप के मार्ग पर बिता दी।अब संभल जाओ और परोपकार में लग जाओ। मत भूलो, ये जिंदगी हमेशा नहीं रहेगी और एक दिन तुम्हें हर एक आंसू का हिसाब देना होगा, जो तुम्हारी वजह से किसी दुखी इंसान की आंसू से निकला था। नानक देव के मुख से यह उपदेश सुनकर डाकुओं ने यह घृणित कार्य छोड़ दिया और उनकी जिंदगी बदल गई।
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