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संवैधानिक संकट के बाद "अरुणाचल प्रदेश" में लगा "राष्ट्रपति शासन"

संवैधानिक संकट के बाद अरुणाचल प्रदेश में लगा राष्ट्रपति शासन
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नई दिल्ली -राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पिछले दो दिनों में गहन विचार विमर्श के बाद आज केंद्रीय कैबिनेट की सिफारिश को मंजूरी प्रदान कर दी और इस आधार को स्वीकार कर लिया कि राज्य में ''संवैधानिक संकट'' है. गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि अरूणाचल प्रदेश के राज्यपाल की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में पैदा हुए संवैधानिक संकट पर संज्ञान लेते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने 24 जनवरी 2016 को अपनी बैठक में राष्ट्रपति से ऐसी उद्घोषणा जारी करने का अनुरोध किया था. इसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 356 :1: के तहत अरूणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने संबंधी उद्घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. यह उद्घोषणा आज से प्रभावी होगी और प्रदेश की विधानसभा निलंबित रहेगी. राष्ट्रपति ने कैबिनेट की सिफारिश के दो दिनों बाद इस उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए. कैबिनेट ने रविवार को हुयी विशेष बैठक में राज्य में केंद्रीय शासन लागू किए जाने की सिफारिश की थी. केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा था कि कैबिनेट यह फैसला लेने को बाध्य थी क्योंकि वहां संवैधानिक संकट पैदा हो गया था और राज्य विधानसभा के दो सत्रों के बीच छह महीने की अवधि पूरी हो गयी थी. प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की तीखी आलोचना करते हुए कांग्रेस, जदयू, भाकपा और आप ने इसे संघवाद और लोकतंत्र की ''हत्या'' करार दिया और भाजपा नीत केंद्र सरकार पर देश की सर्वोच्च अदालत को ''अपमानित'' करने का आरोप लगाया जो अभी मामले की सुनवाई कर रही है. भाजपा ने हालांकि इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि इसे कई नजरिए से देखने की जरूरत है और यह संवैधानिक दायित्वों के अनुरूप है. इसके साथ ही पार्टी ने कांग्रेस पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया. कांग्रेस प्रवक्ता टॉम वडक्कन ने कहा, ''यह लोकतंत्र की हत्या है... मामला अदालत में है और सरकार ने जल्दबाजी में कार्रवाई की है. यह साफ तौर पर देश के उच्चतम न्यायालय का अपमान है. लोकतंत्र की हत्या की गयी है.'' दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की तुलना आपातकाल जैसी स्थिति से की. उन्होंने ट्वीट किया, ''अरूणाचल में राष्ट्रपति शासन, आडवाणीजी सही कह रहे थे कि देश में आपातकाल जैसी स्थितियां हैं.'' मुखर्जी ने कल गृह मंत्री राजनाथ सिंह को बुलाया था और राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की आवश्यकता के बारे में उनसे कुछ सवाल किए थे. वहीं राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने भी उनसे मुलाकात की थी और कैबिनेट के फैसले का विरोध किया था. कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रपति से कैबिनेट के फैसले को मंजूरी नहीं देने का अनुरोध किया था. पार्टी ने कहा था कि यह मामला उच्चतम न्यायालय में है और न्यायालय ने कांग्रेस की याचिका पर कल सुनवाई करने का फैसला किया है. अरूणाचल प्रदेश में पिछले साल 16 दिसंबर से राजनीतिक संकट है जब कांग्रेस के 21 विद्रोही विधायकों ने एक अस्थायी स्थल पर विधानसभा की बैठक में भाजपा के 11 और दो निर्दलीय विधायकों के साथ मिल कर विधानसभाध्यक्ष नबाम रेबिया के खिलाफ ''महाभियोग' प्रस्ताव पारित कर दिया था. विधानसभाध्यक्ष ने इस कदम को ''अवैध और असंवैधानिक'' करार दिया था. इसे राज्य की उच्च अदालत ने भी बैठक को अमान्य करार दे दिया था. इस बीच उच्चतम न्यायालय ने कैबिनेट के फैसले को चुनौती देने वाली कांग्रेस की याचिका पर 27 जनवरी को सुनवाई करने का फैसला किया है. प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर के समक्ष, उनके निवास पर जाकर याचिका पेश की गयी थी जिसमें तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया गया है. न्यायमूर्ति ठाकुर ने इस मामले को बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया. केंद्रीय कैबिनेट का फैसला राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा की रिपोर्ट पर आधारित था. मुख्यमंत्री तुकी का विरोध करते हुए पार्टी के विद्रोही 21 विधायक, भाजपा और निर्दलीय विधायकों के साथ एक सामुदायिक हाल में एकत्र हुए तथा उपाध्यक्ष टी नोरबू थोंगडोक की अध्यक्षता में हुए तात्कालिक सत्र में रेबिया पर ''महाभियोग'' चलाया. इसके पहले राज्य विधानसभा परिसर को स्थानीय प्रशासन ने सील कर दिया था. बैठक में वे 14 विधायक भी शामिल हुए जिन्हें एक दिन पहले ही अयोग्य घोषित किया गया था. साठ सदस्यीय विधानसभा के 27 विधायकों ने कार्यवाही का बहिष्कार किया. इनमें मुख्यमंत्री और उनके मंत्री भी शामिल थे. उसके एक दिन बाद एक अनोखे घटनाक्रम में, विपक्षी भाजपा और कांग्रेस के विद्रोही विधायक मुख्यमंत्री नबाम तुकी को ''सत्ता से हटाने'' और उनके स्थान पर एक विद्रोही कांग्रेस विधायक का ''चुनाव'' करने के लिए एक होटल में एकत्र हुए. भाजपा और निर्दलीय विधायकों द्वारा पेश ''अविास'' प्रस्ताव को ''स्वीकार'' कर लिया गया था बाद में 33 विधायकों ने असंतुष्ट कांग्रेस विधायक कालिखो पुल को नया ''मुख्यमंत्री चुन लिया था.'' लेकिन गौहाटी उच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुए विद्रोही ''सत्र'' में लिए गए फैसले को ''स्थगित'' कर दिया था. Source sahara
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