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बसपा में फीकी पड़ती जा रही "ब्राह्मण" चेहरे की चमक



बसपा में फीकी पड़ती जा रही

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लखनऊ- बसपा में सोशल इंजीनियरिंग के जनक व ब्राह्मण चेहरे की चमक अब धीरे धीरे फीकी पड़ती जा रही है|यह वही चेहरा है जिनकी अगुवाई में 2007 में सूबे का  ब्राह्मण समाज एकतरफा बसपा की ओर मुड़कर पार्टी को अप्रत्याशित बहुमत दिलाया था |उस चुनाव में बसपा ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे जिसमे 46 विधायक बन गए थे |पेशे से अधिवक्ता व पार्टी के सोशल इंजीनियर एससी मिश्र के राजनीतिक कैरियर का यह स्वर्णिम काल था |जिस करीबी व परिजन को  चाहा मंत्री बनाकर लाल बत्ती दिला दिया|जिसे चाहा उसे एमएलसी व राज्यसभा में पहुंचा दिया | लेकिन यह स्वर्णिम काल ज्यादा दिनों तक नहीं रहा|वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को आशातीत सफलता न दिला पाने से उनका प्रभाव कम होने लगा |

गणेश परिक्रमा व चरण बन्दना करने वाले करीबियों को मिली तरजीह 

वजह साफ़ थी कि पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की  जगह ब्राह्मण चेहरे की परिक्रमा व चरण वंदना करने वालों ने ले ली और एससी मिश्र का आशीर्वाद लेकर  मलाईदार पदों पर आसीन  हो गए|इसका सीधा असर वर्ष 2012 के चुनाव में दिखा|पार्टी ने 86 की जगह 70 सीटों पर ब्राह्मण प्रत्याशी उतारे लेकिन विधायक सिर्फ आठ ही बन पाए |वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में ब्राह्मणों का बसपा से ऐसा मोहभंग हुआ कि पार्टी का देश की सबसे बड़ी पंचायत यानि कि लोकसभा में एक भी प्रतिनिधि नहीं पहुच सका |सूत्रों का कहना है कि पार्टी का ब्राह्मण चेहरा एससी मिश्र का असर दिनों दिन कम होता जा रहा  है |

 विधानसभा चुनाव में तीन दर्जन ब्राह्मणों को भी नहीं मिलेगा टिकट 
इसी का नतीजा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण प्रत्याशियों कि संख्या तीन दर्जन से भी कम होने आशंका है |पार्टी के सोशल इंजिनीयर व अधिवक्ता एससी मिश्र ने जिन चहेतों को पार्टी का निष्ठावान बताकर प्रतिष्ठापूर्ण पदों पर बैठाया था |धीरे धीरे उनकी सच्चाई सामने आ गई और वो पार्टी से बाहर होते गए |अब तक  जो एससी मिश्र के करीबी पार्टी से बाहर हुए हैं उनमे प्रतापगढ़ के शिव प्रकाश मिश्र सेनानी व उनकी पत्नी सिंधुजा मिश्र सेनानी ,पूर्व एमएलसी गुड्डू त्रिपाठी ,पूर्व विधायक अमरेश शुक्ला आदि प्रमुख हैं |नवीन चन्द्र द्विवेदी को पहले पार्टी ने प्रत्याशी बनाया फिर उनकी जगह किसी अन्य को टिकट दे दिया गया |अरुण द्विवेदी को अभी तक प्रत्याशी नहीं बनाया गया |पार्टी में एससी मिश्र के सबसे करीबी व पूर्व सांसद ब्रिजेश पाठक का भी बसपा से ऐसा मोहभंग हुआ कि आगरा की रैली में उपेक्षित होने के बाद वो सीधे दिल्ली जाकर अध्यक्ष  अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा  का दामन थाम लिया |इसी तरह ब्राह्मणों की उपेक्षा होती रही तो स्वामी प्रसाद मौर्य ,आरके चौधरी व ब्रिजेश पाठक जैसे अभी और झटके पार्टी  को लग सकते हैं जिसका सीधा असर आगामी विधान सभा चुनाव के परिणामों पर पड़ना तय है |

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