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काश, विकास के लिए होते एकजुट



काश, विकास के लिए होते एकजुट

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सियाराम पांडेय ‘शांत’
नोटबंदी के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता विस्मयकारी है। काश, ऐसा विकास के लिए होता। विपक्ष संसद में प्रधानमंत्री का स्पष्टीकरण चाहता है। उसे इस बात का मलाल है कि प्रधानमंत्री नोटबंदी जैसे मुद्दे पर संसद के बाहर तो खूब बोलते हैं लेकिन संसद में कुछ नहीं बोलते। विपक्ष चाहता है कि प्रधानमंत्री संसद में बैठें और जवाब दें। पिछले दो दिनों से प्रधानमंत्री संसद में जा भी रहे हैं। पहले दिन वह लोकसभा में बैठे। चाहते थे कि विपक्ष की शंकाओं का समाधान करें लेकिन विपक्ष के भारी हंगामे ने उनकी यह मुराद पूरी नहीं होने दी। दूसरे दिन वे राज्यसभा पहुंचे जहां विपक्ष गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रहा था कि प्रधानमंत्री नहीं आएंगे तो संसद नहीं चलने दी जाएगी। प्रधानमंत्री वहां भी लंचआवर तक बैठे रहे। विपक्ष के लोगों की बातें सुनते रहे। हंगामा झेलते रहे। उन्हें मौका मिलता तब तो अपनी बात कहते। भोजपुरी में एक कहावत है कि ‘मारय बरियरा रोवय न देय’। पूरा विपक्ष एकजुट है। वह बहस में कम, मोदी के विरोध में ज्यादा रुचि ले रहा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को तो सपने में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दर्शन होते होंगे। उन्होंने कहा है कि देश में नोट बदलने की नहीं, प्रधानमंत्री बदलने की जरूरत है। प्रधानमंत्री के विरोध में देश के तेरह दल लामबंद हंै। दो सौ सांसद पहले ही गांधी प्रतिमा के समक्ष अपना विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं। 28 नवंबर को विपक्ष केन्द्र सरकार के खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन करने वाला है। विपक्ष का खासकर किसी भी राजनीतिक दल का कोई ऐसा नेता नहीं है जो नोटबंदी के फैसले को गलत ठहरा रहा हो। सभी सरकार के साथ खड़े होने का दम भर रहे हैं। लेकिन उन्हें परेशानी इस बात की है कि जनता परेशान हो रही है। जबकि प्रधानमंत्री के एप पर कराए गए सर्वे में ज्यादातर लोगों ने नोटबंदी के फैसले का स्वागत किया है। बसपा प्रमुख मायावती को यह सर्वे फर्जी और पूर्वनियोजित नजर आता है। उन्होंने प्रधानमंत्री से अपील की है कि इस सर्वे की सच्चाई जानने के लिए वह लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर दें और नए सिरे से जनादेश प्राप्त करें। कहने का तरीका केजरीवाल से अलग हो सकता है लेकिन बसपा प्रमुख और आप संयोजक की मंशा में कोई फर्क नहीं है। केन्द्र सरकार ने नोटबंदी के पीछे जो कारण गिनाए थे, उनमें प्रमुख था आतंकी घटनाओं पर रोक, कालेधन पर पाबंदी और नकली नोटों की खेप को बेकार करना। विपक्ष इसे नकार तो नहीं पाया लेकिन जनता की तकलीफों के बहाने उसने केन्द्र सरकार को घेरने और उसकी योजना को नाकाम करने की कोई कोर कसर शेष नहीं रखी। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि नोटबंदी का आतंकवादियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि आतंकवादी बिटक्वाइन जैसी डिजिटल मुद्रा और डिट्टो करेंसी का इस्तेमाल करते हैं। इसे अलग साफ्टवेयर के जरिए पेश किया जाता है। सवाल यह उठता है कि कांग्रेस और उसके नेताओं को अगर इतनी सटीक जानकारी है या पहले रही थी तो उन्होंने आतंकी गतिविधियों को रोकने की दिशा में अपना सर्वश्रेष्ठ क्यों नहीं दिया। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी नरेन्द्र मोदी को घमंडी करार दे चुके हैं। नरेश अग्रवाल ने राज्यसभा में उन्हीं की विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री की भावुकता पर सवाल उठाया और कहा कि अगर वे भावुक हो जाएंगे तो पाकिस्तान से देश की रक्षा कौन करेगा। यह भी जोड़ा कि अगर वह वित्तमंत्री अरुण जेटली को अपनी योजना बता देते तो जेटली हमारे कान में कह देते। इस तरह की विचारधारा बरबस ही हंसने को बाध्य करती है। केवल विपक्ष ही मोदी विरोध की तोप दाग रहा हो, ऐसा नहीं है, भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा और उनकी बेटी सोनाक्षी सिन्हा को भी लगता है कि नरेन्द्र मोदी मुगालते में जी रहे हैं। उनका सर्वे फर्जी है। पूर्वनियोजित है कालाधन पर लगाम लगाने का फैसला गलत है और यह महज अपने निहित स्वार्थ के लिए उठाया गया है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस बावत अपना मौन तोड़ा है और नोटबंदी का असर सभी सेक्टरों में पड़ने की बात कही है। प्रधानमंत्री द्वारा जनता से मांगे गए पचास दिन के समय को उन्होंने गरीबों के लिए अत्यंत त्रासद करार दिया है। विपक्ष को यह तो जानना ही चाहिए कि विकास के लिए भी विनाश जरूरी होता है। बीज अंकुरित ही तब होता है जब वह पूरी तरह अपना कायान्तरण कर देता है। अंकुरण बीज का नया जन्म है। जो बीज मरता नहीं, वह पौधा, पेड़, फूल को जन्म नहीं दे पाता। विकास के लिए पुराने ढंाचे को तोड़ना पड़ता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगर नोटबंदी का फैसला न लेते तो किसी और को यह काम करना पड़ता। खुफिया रिपोर्ट पर ध्यान दें तो केन्द्र सरकार को सूचना मिली थी कि पाकिस्तान की ओर से जाली नोटों का बड़ा जखीरा भारतीय चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने और आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए भारत में भेजी जाने वाली है। सात करोड़ जाली नोट प्रतिदिन भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। क्या प्रधानमंत्री को सब जानबूझ कर जिंदा मक्खी अपने मुख में निगल लेनी चाहिए थी। जाली नोट का यह कारोबार नया नहीं है। पाकिस्तान लंबे अरसे से भारतीय अर्थव्यवस्था और विकास की गाड़ी को पटरी से उतारने का प्रयास करता रहा है। तो क्या पाकिस्तान को अपने मकसद में कामयाब हो जाने दिया जाना चाहिए था। विपक्ष की ओर से तर्क यह दिया जा रहा है कि जिस तरह इंदिरा गांधी के आपातकाल के खिलाफ सभी राजनीतिक दल कांग्रेस के खिलाफ हो गए थे, वैसा ही कुछ आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हो रहा है। कुछ राजनीतिक दल इसे आर्थिक आपातकाल करार दे चुके हैं। राजनीतिक दलों का मानना है कि केवल दो प्रतिशत लोगों के पास ही देश में काला धन है। केंद्र सरकार दो प्रतिशत लोगों पर तो हाथ डाल नहीं रही। 98 प्रतिशत लोगों को परेशान कर रही है। जब विपक्ष को इस बात का भान है कि काला धन रखने वाले दो प्रतिशत ही हैं तो जब वह सत्ता में था तो उसने उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की ? कांग्रेस, बसपा, सपा और वामदलों को इस बात से कोई ऐतराज नहीं है कि नोटबंदी हुई है। उन्हें नोटबंदी के तौर-तरीके से परेशानी है। बसपा नेत्री मायावती कुछ अधिक ही परेशान हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि नोटबंदी पर वे सरकार के साथ हैं लेकिन इसका क्रियान्वयन गलत ढंग से हुआ। इस पर उन्हें आपत्ति है। एक ओर तो वह सरकार के साथ होने की बात कह रही हैं और दूसरी ओर यह कहने में भी उन्हें गुरेज नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चहेते पंूजीपतियों और पार्टी के नेताओं के धन को ठिकाने लगाने के लिए नोटबंदी की है। सरकार के साथ खड़े होने का यह कौन सा आधार है। सपा नेता नरेश अग्रवाल ने तो राज्यसभा में हद ही कर दी, उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि नोटबंदी जैसे फैसले हमेशा तानाशाहों ने लिए हैं। अहंकार व्यक्ति को अंधकार की ओर ले जाता है। कभी इंदिरागांधी ने देश में आपातकाल लगाया था। उन्हें लगता था कि इससे देश की जनता खुश है। लेकिन उन्हें चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। नोटबंदी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी लग रहा है कि जनता इससे खुश है लेकिन जब चुनाव होगा तो उन्हें पता चल जाएगा कि जनता का रुख क्या है? जनता संप्रभु है। वह कुछ भी फैसला ले सकती है। चुनाव जीतने और हारने को कार्य का मानक नहीं बनाया जा सकता। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता की तकलीफों को दूर करने के लिए रोज ही कोई न कोई विकल्प दिए। यह अलग बात है कि विपक्ष उसमें खोट तलाशता रहा। विकल्पों को वह नियम परिवर्तन के आइने में देखता रहा। बात यहीं तक होती तो भी गनीमत थी, उसे लाइन में खड़े गरीब तो नजर आते हैं लेकिन सरकार के प्रयास से घटती लाइन नजर नहीं आती। विपक्ष का सवाल है कि बैंकों पर लगी कतारों में कोई बड़ा आदमी क्यों नहीं नजर आता। इसका आसान सा जवाब है कि राजा होने के बाद खाने की चिंता नहीं की जाती।
वित्तमंत्री अरुण जेटली की इस बात में दम है कि विपक्ष के पास चर्चा के लिए कुछ नहीं है। वह केवल बेवजह हंगामा कर रहा है। जब सभी राजनीतिक दलों का मानना है कि केन्द्र सरकार का फैसला सही है, फैसले का तौर तरीका गलत है। तो विपक्ष केन्द्र सरकार को सही तरीका क्यों नहीं सुझाता। एक ओर तो वह प्रधानमंत्री से संसद में उनका जवाब चाहता है और दूसरी ओर उन्हें अपनी बात रखने देने का वक्त भी नहीं देता। नोटबंदी के मुद्दे पर आम राय बनाने की केन्द्र सरकार की हर कोशिश को विपक्ष ने धता ही बताया है। इसे क्या कहा जाए। कड़े फैसले लंबी अवधि में सुख देते हैं। तत्काल तो उससे दुख ही होता है। दुख को लक्ष्य कर कड़े फैसले न लेना आखिर कहां की बुद्धिमानी है। मोदी के एक फैसले से देश में कई विसंगतियां समाप्त होंगी। भ्रष्टाचार पर अंशत: ही सही, अंकुश लगेगा। समरसता का वातावरण बनेगा। क्या इस देश का विपक्ष इसके लिए तैयार है?


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