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अरे पगली ! गम क्या है , तुझे अभी नहीं पता l



अरे पगली ! गम क्या है , तुझे अभी नहीं पता l

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आभाव 


ज़िन्दगी में गम क्या कम है ,
कहीं आसुओं की धारा तो कहीं 
आँखें अभी भी नम हैं ,
अधूरी सी इस ज़िन्दगी में ,
शरीर अभी भी बेदम है ,
जो हँसी रुखसारों तक आते आते ,
ठहर सी जाती हैं l


फिर एक धुंधली सी याद ,
दिल को सताती है l 
जीवन संघर्ष , मेहनत , और जीने का ही तो संगम है l


बरखोरदार ! हमारा गम तो फिर भी कम है।
रुआंसी सी मैं , जब पहुंची नदी के किनारे ,
देखा एक बूढ़ी माँ , किसी बड़े रईस को ,
बेटा बेटा पुकारे ;


उस शहज़ादे ने उससे मुह मोड़ लिया,
अपनी पत्नी का आँचल पकड़,
माँ की गोद को छोड़ दिया,
और उस औरत ने कहा - " बेटा रुक जा ",
तो साहब बोला - "अरे बुढ़िया, यहां से जा ",


शायद वह उसकी माँ नहीं रही होगी l 
शायद वह किसी को ढूंढ रही होगी ,
शायद वह ठण्ड से काँप रही होगी ,
शायद वह भूख से बिलक रही होगी l 
शायद वह उसका सहारा मांग रही होगी,


शायद वह उस पत्थरदिल की माँ रही होगी।
शायद वह उस पत्थरदिल की माँ रही होगी।


उस औरत के घाव के आगे ,
जब मैंने अपना गम सोचा ,
तो दिल ने मुझ पर वयंग करा -
" अरे पगली ! गम क्या है , तुझे अभी नहीं पता l "


- अन्वेषा सिन्हा 



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