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ये है लखनऊ के 78 साल के कुवारे Google

ये है लखनऊ के 78 साल के कुवारे Google
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स्पेशल डेस्क - सौरभ शुक्ल - आज तक आपने इन्टरनेट के गूगल के बारे में बहुत सुना और देखा होगा बलिकी गूगल को इतेमाल भी किया होगा, आप गूगल को भली भाति जानते होंगे जहाँ पर दुनिया की किसी भी चीज को ढूँढा जा सकता है पर आज हम आपको भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी "लखनऊ" के गूगल #Google से मिलाने जा रहे है जिनको लोग यूँ ही गूगल नहीं कहते है दरअसल लखनऊ में शायद ही किसी आदमी को लखनऊ के बारे में पूरी जानकारी हो लेकिन इस शख्स के पास राजधानी से जुड़ा पूरा इतिहास आपको पलक झपकने से पहले ही मिल जायेगा

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आखिर इनको क्यों कहते है गूगल

लखनऊ के इतिहास से जुडी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जानकारी ये कुछ सेकेंडो में आपके सामने रख देते है चाहे वह नवाबों की कहानी हो या मुग्लों की कब इमामबाड़ा बना कब रेज़िडेंसी बनी या फिर किसने भूल भुलैया बनवाया ये सारी जानकारी इनकी उँगलियों पर है और सबसे ख़ास बात इनके बारे में हम आपको बता दें की इस मुकाम तक पहुचने के लिए इन्होने अविवाहित रहने का निर्णय लिया जिसका इन्हें कोई अफ़सोस नहीं है बल्कि इन्हें गर्व होता है मैं लखनऊ के लिए कुछ कर सका और आने वाली पीढ़ी को कुछ दे कर जा रहा हूँ. राजधानी की आबोहवा बड़े बड़े शायरों कहानीकारों इस कदर भाई की भारत के दुसरे प्रदेशों से आये ये शायर लखनऊ के होकर रह गए. चाहे बेगम अख्तर हो या यशपाल नागर इन बड़े लोगों को लखनऊ ने एक अलग पहचान दी.

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लखनऊ में पले बढे ये है"डॉ योगेश प्रवीण" पेशे से तो एक डिग्री कॉलेज में प्रोफ़ेसर रहे लेकिन तबियत से इतिहासकार और साहित्यकार बन गए ..इनके गूगल बनने की कहानी भी बड़ी अजीब है बचपन पुराने लखनऊ की तंग गलियों में बीता जिस उम्र में बच्चे खिलौने से खेलते है उस उम्र में ये नामचीन शायरों और कहानीकारों के साथ रहा करते थे और लखनऊ के बारे में सब जानकारी इकट्ठी किया करते थे और पूरा दिन साहित्य और कहानियों के बीच गुज़र जाता था. अपनी माँ गहरी छाप इनके ऊपर साफ़ साफ़ देखने को मिल जाती है इनकी माँ कुशल गृहणी और एक अच्छी लेखक हुआ करती थी अपनी माँ को देख कर इनके मन में अपने लखनऊ और अपने लोगों के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत ने इन्हें लखनऊ का गूगल बनाया.

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आधा दर्जन किताबें लखनऊ के ऊपर लिख चुके डॉ साहब लखनऊ की तहजीब बचाने को लेकर जद्दो जहद कर रहे है, उनका कहना है की नए लखनऊ का इंसान उस मुर्दे की तरह है जो किसी से मिलना नहीं चाहता आदमी का जामा है लेकिन जानवर की जमात है जो फिजा जो जबां पुराने लखनऊ में है वो नए लखनऊ में नहीं ये असर सैकड़ों सालों में लखनऊ में आया है. अपने लिए तो सभी जीते है इस जहाँ में है जिंदगी का मकसद औरों के काम आना, यही शगल आदमी और जानवर को अलग अलग करता है. वो ये भी कहते है की अगर कुछ चीज़े प्रगति की रफ़्तार को कम करती है तो उनको छोड़ना चाहिए और लखनऊ की गंगा जमुनी तहजीब को हमें बचाना है और ये संस्कार आने वाली पीढ़ी में हमें पहुचाने है.


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