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आपके लिए मैकडॉनाल्ड बड़ा या देश के गरीब बच्चे ये आप फैसला करें

आपके लिए मैकडॉनाल्ड बड़ा या देश के गरीब बच्चे ये आप फैसला करें
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आज हम आपको एक ऐसी घटना बताने जा रहे है जिसे जान कर आपकी आखों में आसूं आ जायेगें. जहाँ एक तरफ भारत के प्रधानमन्त्री "नरेन्द्र मोदी" गरीबों के लिए निरंतर प्रयास किये जा रहे है वहीँ उनके ही देश में विदेशी कम्पनियाँ भारत के गरीबों के साथ दुर्व्यवार कर रही है और वो भी गरीब बच्चो के साथ. मामला ग्वालियर का है जहाँ के डी डी मॉल में मैकडॉनाल्ड रेस्टोरेंट का जहाँ पर पहले से बैठे एक परिवार ने बाहर खड़े गरीब बच्चों को बर्गर खाने के लिए अन्दर बुला लिया. तब उस परिवार के साथ वहां का गार्ड बदतमीजी करने लगा और कहने लगा की आपने इन लोगों को अन्दर क्यों बुला लिया. उस परिवार ने कहा की अगर ये गरीब हैं तो क्या मैकडॉनाल्ड में नहीं आ सकते हैं. महज़ इतनी बात पर बात बढ़ती गई और उस फैमिली को बाहर नहीं निकलने दिया गया. मैकडॉनाल्ड में ही उस परिवार को बंधक बना लिया गया.

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  • क्या किसी गरीब को ये अधिकार नहीं है की वो किसी अच्छे से रेस्टोरेंट में जा कर कुछ खा सके
  • क्या गरीब बच्चों को ये अधिकार नहीं है की वो अपने ही देश में किसी महगें रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा या बर्गर खा सके और वो भी भीख में नहीं.
  • भारत में गरीब बच्चों के साथ हुए इस दुर्व्यवार के मामले में आप किसके साथ है उस विदेशी रेस्टोरेंट के साथ या उन गरीब बच्चों के साथ.

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ये बिलकुल गलत बात है क्योंकि लोग क्लास बनाने में जुटे हुए हैं. ऐसा क्लास जिसमें अगर गरीब फैमिली के बच्चे अगर मैकडॉनाल्ड में कुछ खाए तो मैकडॉनाल्ड की शान घाट जाएगी क्यूकि मैकडॉनाल्ड ऐसी जगह है जहां फटे-पुराने कपड़ों वाले गरीब नहीं जा सकते है. भला ये कैसी सोच है कि आप उन गरीब बच्चों को बदमाश कह रहे हो, चोर कह रहे हो सिर्फ इसीलिए की वो गरीब है, सिर्फ इसीलिए क्योंकि वो हालात के मारे हैं. क्या ये बेहतर नहीं होगा कि उन बच्चों को लताड़ने के बजाए उनको समझाकर एक अच्छी राह दिखाई जाए.

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  • मैं अभी मन पर भारी दुख लेकर डीडी मॉल से लौटी हूं.
    हम डीडी मॉल के मैकडॉनाल्ड में बैठे थे. आपने वहां अकसर बैलून बेचने वाली छोटी लड़कियों को देखा होगा। आज जब हम मैकडॉनाल्ड में खा रहे थे तो मैंने एक बच्ची को झांकते पाया, अवनि ने कहा , पापा उस बच्ची को बर्गर दिला दो.
  • अंशु ने कहा बाहर जाकर बर्गर क्या देना, उस बच्ची और उसके साथ की दूसरी बच्चियों को जो छह थीं अंदर बुला लें, वो सम्मान से अंदर बैठ कर खाएं. अवनि उनको बुला लाई. मैंने देखा सारे कस्टमर तो मुस्कुरा रहे थे. मैकडॉनाल्ड के कर्मचारियों का मुंह सड़ गया.
  • जब तक उन बच्चियों के बर्गर और फ्रेंच फ्राइज़ आए. मैं उनसे बात करने लगी. सब चौथी से पांचवीं में पढ़ते थे. उन बच्चियों ने खाना शुरू किया ही था. एक बच्ची बाहर उनके बैलूनों की रखवाली कर रही थी जिसका बर्गर ये बच्चे बाहर जाकर देने वाले थे, उसकी चीख की आवाज़ आई. ये बच्चे अपने अपने बर्गर छोड़ कर लथड़ पथड़ भागे.

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  • मैकडॉनाल्ड वालों ने चुपचाप कॉल करके एक गार्ड को बुलाया था. जिसने बाहर रखे उनके सारे बैलून फोड़ दिये.
    मेरा मन खराब हुआ, अंशु को गुस्सा आ गया. हमने और अन्य लोगों ने गार्ड को घेरा डांटा. बैलूनों के पैसे देने को कहा. दूसरा मेन मुच्छड़ गार्ड आकर हम पर रौब चलाने लगा कि इन बच्चियों को बाहर बर्गर दे दो, भीतर क्यों बुलाया. ये बच्चियां बदमाश हैं, पत्थर फेंकती हैं ग्राहकों पर. भीतर आती हैं. गालियां देती हैं. वहां खड़े कॉलेज के लड़के बोले, हम रोज आते हैं हमने इन बच्चियों को कभी पत्थर फेंकते, गाली देते नहीं सुना.
  • बच्चियां बोली, ये गार्ड जिसने बैलून फोड़े हमसे तंबाकू खाने के पैसे लेता है. डंडे से मारता है.

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  • आंधे घंटे तक काफी झगड़ा हुआ. मैंने उन बच्चियों को उनके बचे बर्गर और फूटे बैलूनों का पैसा दिया और हम पार्किंग से गाड़ी लेकर बाहर निकले तो मुच्छड़ गार्ड वहां खड़ा था. गाड़ी का नंबर नोट करने और हमारी कम्प्लेन करके, गेट बंद करके रखा था. रात के पौने ग्यारह बजे थे. अब अंशु बहुत गुस्से में थे. पास के थाने से बीट इंचार्ज आया. हमने उसे पूरी कहानी बताई. अब तक अंशु ने अपनी रैंक भी नहीं बताई थी, अब उन्होंने अपना आई डी कार्ड निकाला और पूरी कहानी सुनाई.
  • अंशु ने कहा, ‘मैं उन बच्चियों के पैसे दे रहा हूं, उन्हें मैकडॉनाल्ड में बिठा कर खिलाने का हक है मेरा. वो भी इस आजाद भारत की संतानें हैं. मैं उनको बाहर बर्गर देकर भीख नहीं, साथ बिठा कर खिलाना चाहता था. और उनके जेब में पैसे हैं तो वो मॉल में भी घुसेंगीं. कोई रोक नहीं सकता.’

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  • वो भला बंदा था. उसने अंशु को सैल्यूट किया और डीडी मॉल का एग्जिट गेट खोला गया. तब तक मैं हताश हो गई कि उन गरीब बच्चियों के लिए कुछ करना मेरे लिए भारी पड़ गया तो वो रोज़ क्या झेलती होंगी? या अब वो गार्ड उनको और तंग न करें?
  • मैं पूरे रास्ते आंसुओं में थी. घर आकर पहला काम यह पोस्ट लिखने का कर रही हूं जबकि कल सुबह मुझे भोपाल जाना है. दिल बुरी तरह दुखा हुआ है. कि वो बच्चियां चैन से मैकडॉनाल्ड के भीतर बैठ कर बर्गर न खा सकीं. उनके बैलून फोड़ दिए गए.

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