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एक चुटकी ज़िन्दगी



एक चुटकी ज़िन्दगी

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सुबह की दौड़ती ज़िन्दगी से
शाम के बिखरते पलों तक
कुछ पल , बस कुछ पल
सिर्फ़ अपने लिये
चुरा लूँ ...
ख़्वाहिश नहीं ..दूर गगन की
पर, अपने आँगन में तो
फैला लूँ पँख
सबके लिये कर रही
सब कुछ ...
बस दे दूँ , अपने
मन पर दस्तक
ना जाऊँ
दहलीज़ से बाहर
पर झरोखे खोल
आने तो दूँ ब्यार
गीत सँगीत की
ना हो , रुनझुन
बस हो एक
निशब्द मौन
जो घुल जाये
मेरी धड़कन में
बनकर
सुर लय ताल

भोर की अरुणिमा से
सन्ध्या की लालिमा
के बीच
चुरा लूँ
एक टुकड़ा धूप
अपने हिस्से की
और .....
सावन की रिमझिम
बूँदे चुराकर
चमका दूँ
इस नभ में
अपना भी एक
इन्द्रधनुष


लेखक - स्वाति शर्मा



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