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डरती नहीं तभी तो फंसती है कांग्रेस



डरती नहीं तभी तो फंसती है कांग्रेस

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सियाराम पांडेय ‘शांत’


 कांग्रेस कार्रवाई डरती नहीं है। उसका हर छोटा-बड़ा नेता आजकल ऐसी ही शेखी बघार रहा है। इसकी वजह शायद यह है कि उन्हें किसी ने ‘डर के आगे जीत’ वाली बात समझा दी है। ओखली में सिर दिया तो मूसलों से डर कैसा? वैसे भी जो डर गया, वह मर गया। कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी पार्टी है। डरने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। कांग्रेस अगर डर रही होती तो देश में इतने कांड कैसे होते? 


पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम के पुत्र कार्ति चिदंबरम की गिरफ्तारी इस बात का प्रमाण है कि दाल में कुछ न कुछ काला तो है ही। कांग्रेस भले ही यह समझाती रहे कि यह धुआं किसी आग की परिणिति नहीं है लेकिन इससे वह इस देश को समझा पाएगी, इसमें संदेह ही है। कांग्रेस का तर्क यह है कि वह नरेंद्र मोदी सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए सत्य बोल रही है। वैसे भी सत्य बोलना और सत्य बोलने का दावा करना दो अलग बातें हैं और उनके बीच के फर्क को समझना वक्ती जरूरत भी है। विपक्ष में रहते हुए सच बोलना आसान होता है लेकिन जब मन में पूर्वाग्रह की गांठे पड़ी हों तो सच बोलते भी नहीं बनता। भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी के खुलासे के आधार पर ही कार्ति चिदंबरम इस मुकाम तक पहुंचे हैं। उनका दावा है कि जल्द ही पी. चिदंबरम भी गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। दोषी तो वे भी हैं। सच तो यह है कि भ्रष्टाचार में लिप्त कांग्रेसियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 


पी. चिदंबरम से पहले केंद्र सरकार कहीं सोनिया गांधी के दामाद रावर्ट वाड्रा को जेल में न डाल दे, इसे लेकर राहुल गांधी भी परेशान हैं। यह भी हो सकता है कि रावर्ट वाड्रा का नंबर चिदंबरम के बाद आए। रावर्ट वाड्रा को जेल भेजने की मुनादी भाजपा के कई बड़े नेता लोकसभा चुनाव के दौरान ही कर चुके हैं। पी. चिदंबरम को अभी तक अभयदान देने की पीछे केंद्र सरकार की यह सोच कदाचित यह भी रही हैै कि कहीं कांग्रेस इस कार्रवाई का सहानुभूतिक लाभ न उठा ले जाए। शहादत का लाभ उठाने में वैसे भी कांग्रेस का कोई जोड़ नहीं है। कार्ति को पकड़े जाने,पटियाला कोर्ट द्वारा उनके चार्टर्ड एकाउंटेंट को जेल भेजने और सीबीआई द्वारा कार्ति को 14 दिन की रिमांड पर देने की मांग के बाद कांग्रेस नेे जिस तरह सरकार पर आरोपों के बाण छोड़े हैं, उसकी मारक क्षमता से मोदी सरकार का तिलमिलाना स्वाभाविक है लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त जनों पर कार्रवाई तो करनी ही होगी। भ्रष्टाचार मिटाना है तो भ्रष्टाचारियों पर शिकंजा कसने का वादा तो निभाना ही पड़ेगा। 


कार्ति चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने मुंबई स्थित आईएनएक्स मीडिया से कथित तौर पर 3.5 करोड़ रुपये की रिश्वत ली और उन्हें एफआईपीबी से मंजूरी दिलाई। यह सब उन्होंने वर्ष 2007 में अपने पिता पी चिदंबरम के देश का वित्तमंत्री रहते किया।  इस लिहाज से देखा जाए तो पी. चिदंबरम भी दोषी हुए। भले ही वे अपने बेटे के अलग काम और उसमें हस्तक्षेप और मदद न करने की दुहाई दें। केंद्रीय अन्वेंषण ब्यूरो को चिदंबरम और उनके बेटे के विरुद्ध कार्रवाई तो बहुत पहले ही करनी चाहिए थी लेकिन जब जागै तभी सबेरा। बेटे की गिरपफ्तारी के बाद चिदंबरम भी पकड़े जा सकते हैं लेकिन उनकी जमानत के लिए जिस तरह प्रयास हो रहे हैं। कार्ति सीने में दर्द का बहाना बना रहे हैं,वह सीबीआई को और अधिक पूछताछ का मौका न देने की कोशिश तो है ही।  


जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। बबूल बोकर आम खाने का कोई सिद्धांत नहीं है? कांग्रेस का आरोप है कि वित्तीय घोटालों और कुशासन से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए केंद्र सरकार यह सब कर रही है। उसने पीएनबी बैंक घोटाले के आरोपी नीरव मोदी को बचाने और कार्ति को पफंसाने का आरोप लगाया है। इसके बरक्स भाजपा का जवाब यह है कि कोई भी व्यक्ति कानून सेे ऊपर नहीं है। कानून अपना काम कर रहा है। यह कर्म प्रधान देश है जो जैसा करेगा, वैसा ही भरेगा। सीबीआई ने 15 मई 2017 को कार्ति चिदंबरम के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। आईएनएक्स मीडिया उस समय पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी के हाथ में था। भले ही इस प्राथमिकी में पी.चिदंबरम का नाम न हो लेकिन उन पर आरोप तो  है ही कि उन्होंने 18 मई, 2007 की एफआईपीबी की एक बैठक में आईएनएक्स मीडिया में 4.62 करोड़ रुपये के विदेशी निवेश को मंजूरी दी थी। इस रहस्य का उद्घाटन भाजपा ने नहीं, खुद प्रवर्तन निदेशालय ने किया था और सीबीआई को इसकी जानकारी दी थी। कार्रवाई का सिलसिला तो यहीं से तेज हुआ था। 


सीबीआई ने अपनी प्राथमिकी में इस बात का जिक्र किया है कि कार्ति ने अपने प्रभाव से  मॉरिशस से निवेश प्राप्त करने में एफआईपीबी की शर्तों के उल्लंघन की जांच को प्रभावित किया और इसके लिए आईएनएक्स मीडिया से पैसे लिए। सीबीआई ने इस बावत 10 लाख रुपये की राशि के वाउचर्स भी जब्त किए थे। 2011 में एयरसेल के संस्थापक सी. शिवशंकरण ने सीबीआई में एक शिकायत दर्ज करवाई थी कि उन पर अपने शेयर मैक्सिस को बेचने का दबाव बनाया जा रहा है। ऐसा करने वाले कौन थे, अगर सीबीआई इसका खुलासा करे तो कांग्रेस के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाएगा कि इसमें उसका इंटरेस्ट क्या था? 


 2006 में मलेशिया की कंपनी मैक्सिस कम्युनिकेशन ने एयरसेल में 74 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी। शिवशंकरण की शिकायत पर सीबीआई ने दयानिधि मारन और कलानिधि मारन, मैक्सिस के मालिक टी. कृष्णन आदि के विरुद्ध प्राथमिकी  दर्ज की थी। दयानिधि मारन के आवास पर छापेमारी भी हुई थी। यह अलग बात है कि 2017 में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की विशेष अदालत ने मारन और अन्य को इस मामले में आरोपमुक्त कर दिया था। 


पहली बार साल 2015 में कार्ति का नाम भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने उछाला था। उन्होंने कार्ति की विभिन्न कंपनियों के बीच वित्तीय लेन-देन का खुलासा किया था। उस समय भी कांग्रेस के नेताओं ने सुब्रह्मण्यम स्वामी की खुलकर आलोचना की थी। उनके खिलापफ जाने कौन-कौन से विशेषणों का प्रयोग किया था। उसके मूल में जाने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस में सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को खुलकर खेलने का अवसर नहीं मिल पाता था लेकिन मोदी सरकार के गठन के बाद उसे जब भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने का अवसर मिला तो कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमले भी तेज कर दिए। उसके सही निर्णयों को भी  गलत ठहराना आरंभ कर दिया। 


 अगर कांग्रेस वाकई सच बोल रही है या सच बोलने में यकीन रखती है तो देश में हुए करोड़ों-अरबों रुपये के घोटालों से उसके तार क्यों जुड़ रहे हैं?कांग्रेस ने अपने दौर में इन घोटालों की पर्देदारी क्यों की, मंथन तो इस पर भी होना चाहिए। कांग्रेस अगर सच बोलती है तो वह इस मामले में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय क्यों गई? कार्ति चिदंबरम सीबीआई को जांच में सहयोग कर रहे हैं या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा लेकिन बिना आग के धुआं हो रहा है, यह बात गले नहीं उतर रही है। कांग्रेस के दौर में पहले भी अनेक बड़े घोटाले हुए हैं, सबके नाम गिनाना जरूरी नहीं है। भ्रष्टाचार का नाम लेते ही कांग्रेस का बोध होने लगता है। सांच को आंच नहीं लगती। सच तो यह है कि कांग्रेस ने देश का बड़ा नुकसान किया है। अब जब जनता उसे सत्ता से बाहर की राह दिखा चुकी है तो वह गुमराह करने वाली नीति पर आगे बढ़ चली है लेकिन पब्लिक है, सब जानती है। छिटपुट विजयों से उन्मत्त होने, उसे कुशासन और अहंकार की हार बताने से नहीं, आत्म सुधार से ही कांग्रेस का कायाकल्प होगा। अपनी पूर्व की पराजय का ठीकरा कांग्रेस ईवीएम पर फोड़ती रही है, राजस्थान और मध्यप्रदेश के उपचुनाव में हुई अपनी जीत और भाजपा की हार के लिए क्या वह इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन को जिम्मेदार नहीं ठहराएगी? विरोध के लिए भी सुविधा का संतुलन तलाशना ठीक नहीं है। 


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