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मोदी को नहीं जानतीं सोनिया गांधी



मोदी को नहीं जानतीं सोनिया गांधी

सोनिया गाँधी और पीएम मोदी

यह बात कितनी सच है नहीं जानता, परंतु एक बार कहीं पढऩे में आया था कि दिवंगत कलाकार राजकुमार को जब उस समय नए-नए बने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के बारे पूछा गया तो उन्होंने अपने अंदाज में जवाब दिया कि यह नाम सुना-सुना सा लगता है। यह वह दौर था जब राजकुमार का जलवा ढलान पर था जो अंत तक जारी रहा। लगभग राजकुमार की ही शैली में एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्षा सोनिया गांधी ने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं जानती। उन्होंने कहा, 'मैं मोदी को नहीं जानती। बतौर प्रधानमंत्री उन्हें संसद में अथवा देश और दुनिया में अलग-अलग कार्यक्रमों में जरूर देखती हूं, लेकिन निजी तौर पर मैं उन्हें नहीं जानती।' निर्णय नहीं कर पा रहा हूं कि इसे सोनिया का अहंकार कहा जाए या नासमझी और अज्ञानता या फिर तीनों ही। 


 

सोनिया गांधी के बारे एक बात कही जाती है कि वह अपने विरोधियों को कभी माफ नहीं करतीं और विरोधी उन पर अहंकारी नेता होने के आरोप लगाते रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी की पार्थिव देह को कांग्रेस कार्यालय प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी थी, कारण था कि केसरी के सोनिया से मनमुटाव थे। सोनिया के संस्कारों में पली-बढ़ी प्रियंका गांधी भी मोदी के बारे में ऐसा अहंकारमयी व्यवहार कर चुकी हैं, एक जनसभा के दौरान मोदी ने प्रियंका को बेटी बताया तो कान्वेंट स्कूलों में शिक्षित प्रियंका ने तपाक से जवाब दिया कि वह अपने पापा की बेटी है। ऐसा कहते हुए वह भूल गईं कि भारतीय संस्कृति में अपने से कम उम्र की लड़कियों के लिए बेटी शब्द ही प्रयोग किया जाता है। परंतु खानदानी अहंकार के चलते प्रियंका ने मोदी को नीचा दिखाने का प्रयास किया। 

 

सोनिया से यह भी पूछा जा सकता है कि जब वे मोदी को निजी तौर पर जानती नहीं तो उन्होंने गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान 'मौत का सौदागर' किस आधार पर ठहरा दिया। उनकी पार्टी के नेता मोदी को नए-नए विशेषण किस जानकारी के आधार पर देते रहते हैं? एक राष्ट्रीय दल की दो दशक तक अध्यक्ष व यूपीए सरकार के समय निर्णायक भूमिका निभाती रही क्या यह बताना चाहती है कि वे बिना तथ्यों की जांच किए भाषण देती हैं। जिस मोदी ने साल 2014 में कांग्रेस को उसके इतिहास की सबसे शर्मनाक पराजय का स्वाद चखाया हो और वर्तमान में केवल चार राज्यों तक जिसे समेट कर रख दिया हो उसके बारे में यह कहना कि मैं मोदी को जानती नहीं तो यह केवल अहंकार का प्रदर्शन ही माना जाएगा।

 

सवाल ये भी उठता है कि जब विपक्ष की सबसे बड़ी नेता ही प्रधानमंत्री मोदी को नहीं जानती हैं तो फिर विपक्ष उनके खिलाफ अभियान का संचालन कैसे करेगा। युद्ध हो या चुनाव प्रतिद्वंद्वी के बारे पूरी जानकारी रखना अनिवार्य है। बिना जानकारी के न तो दुश्मन या विरोधी को जीता जा सकता है और न ही अपना बचाव किया जा सकता। अपनी पुस्तक फ्रीडम एट मिडनाइट में लेखक लैरी कॉलीन लिखते हैं कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्नाह टीबी के मरीज थे परंतु यह बात उन्होंने गुप्त रखी। अगर कांग्रेस के नेताओं को इसकी भनक मिल जाती तो देश का बंटवारा नहीं होता क्योंकि टीबी उन दिनों में जानलेवा बीमारी थी जिसका कोई उपचार नहीं था। कॉलीन की बात सही भी साबित हुई क्योंकि पाकिस्तान बनने के एक साल कुछ दिन बाद ही 11 सितंबर, 1948 को जिन्ना का देहांत हो गया। 

 

उक्त टीवी कार्यक्रम में सोनिया गांधी ने कहा कि कांग्रेस 2019 के आम चुनाव में केंद्र में सरकार बनाएगी परंतु सोनिया के हावभाव से लग रहा था कि अपने कहे पर खुद उन्हें ही विश्वास नहीं है। कांग्रेस देश में सिमटती जा रही है और फिलवक्त तो किसी भी राज्य में बढ़ती हुई नहीं दिख रही है। अगर यूपीए में कुछ अन्य दल जुड़ते हैं तो गठबंधन की कुछ सीटें जरूर बढ़ सकती हैं। गुजरात से कांग्रेस को अच्छे संकेत मिले हैं, लेकिन वहां भी विधानसभा चुनाव के बाद हुए एक सर्वे ने उसकी दयनीय स्थिति को उजागर कर दिया है। कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में 42 प्रतिशत मत मिले थे और सर्वे किया गया कि अगर आज लोकसभा चुनाव हुए तो किसे वोट देंगे, इसमें सिर्फ 35 फीसद लोगों ने कांग्रेस का नाम लिया। जबकि विधानसभा चुनाव में 50 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली भाजपा की तरफ 54 प्रतिशत लोगों ने रुचि दिखायी। कांग्रेस की उम्मीद अब केवल राजस्थान और मध्य प्रदेश है जिसके बारे में अभी समय से पहले कुछ कहना उचित नहीं होगा क्योंकि जिस तरीके से मोदी व अमित शाह की जोड़ी राजनीति के नए प्रयोग कर रही है लगता नहीं कि इन राज्यों में यह जोड़ी कांग्रेस की दाल गलने देगी। एक प्रश्न के उत्तर में सोनिया ने कहा कि अच्छे दिन का नारा शाइनिंग इंडिया में बदल जाएगा। ऐसा कहते हुए वे भूलती हैं कि उनका मुकाबला अटल बिहारी वाजपेयी से नहीं जो उदारवादी छवि के स्वामी थे, भाजपा आज मोदी के नेतृत्व में आगे बढ़ रही है जो अपने विरोधियों के प्रति किसी भी तरह की नरमी नहीं दिखाते। संभवत: कांग्रेस और उसके नेता मोदी और वाजपेयी के बीच के अंतर को देख भी पा रहे हों, लेकिन सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने से बच रहे हैं। कांग्रेस के लोगों में यह धारणा है कि जैसे 1998 से 2004 के बीच कुछ नहीं करने के बावजूद सत्ता पेड़ से गिरे बेर की भांति उनके हाथ में आ गई थी, वैसा ही 2019 में भी होगा। लेकिन तब से अब तक राजनीति बहुत बदल चुकी है। कांग्रेस 2004 में जिस स्थिति में थी, वहां के मुकाबले आज वह बहुत कमजोर है और अब तो सिर्फ 4 राज्यों तक सिमटकर वह क्षेत्रीय दल जैसी हो गई है। कांग्रेसियों के बारे में खुद वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने बिल्कुल स्टीक टिप्पणी की थी कि पार्टी की सल्तनत चली गई परंतु कुछ लोगों की सुल्तानियत नहीं गई। यह बात किसी और पर नहीं परंतु सोनिया गांधी पर तो लागू होती दिख ही रही है। सोनिया गांधी अगर कांग्रेस की गाड़ी को दोबारा पटरी पर लाना चाहती हैं तो उन्हें अपने व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा क्योंकि देश की जनता अहंकारी नेता या दल को स्वीकार नहीं करती।

 

- राकेश सैन

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