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वटसावित्री व्रत में ये पांच चीजें रखती है खास मायने...



वटसावित्री व्रत में ये पांच चीजें रखती है खास मायने...

वट सावित्री का व्रत

डेस्क-वट सावित्री का व्रत हर साल ज्येष्ठ महीने की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। करवाचौथ की तरह ही इस व्रत को सुहाग की लंबी उम्र के लिए सुहागन स्त्रियां रखती हैं। इस व्रत की कथा का संबंध सावित्री नाम की एक सुहागन स्त्री से है जिसने अपने मृत हो चुके पति की आत्मा को यमराज से वापस छीनकर अपने पति को जीवित कर लिया और लंबे समय तक वैवाहिक जीवन का आनंद प्राप्त किया।यह घटना शनि जयंती के दिन यानी ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि को हुई थी इसलिए सुहागन स्त्री इस दिन व्रत रखती हैं और देवी सावित्री के साथ यमराज की भी पूजा करती हैं। इस व्रत में 5 चीजों का विशेष महत्व है और इनके बिना यह व्रत अपूर्ण माना गया है। आइए जानें वो 5 चीजें क्या हैं और क्यों है इनका महत्व।


वट वृक्ष
इस व्रत में वट यानी बड़गद के पेड़ की पूजा की जाती है। क्योंकि वट के वृक्ष ने सावित्री के पति सत्यवान के मृत शरीर को अपनी जटाओं के घेरे में सुरक्षित रखा ताकि जंगली जानवर शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा सके।


चना
सावित्री को चना के रूप में यमराज ने उनके पति की आत्मा को लौटाया था। इसलिए आत्मा स्वरूप को मानकर इस व्रत में प्रसाद के तौर पर चना रखा जाता है।


कच्चा सूत
सावित्रि ने कच्चे धागे से वटवृक्ष को बांधकर उनसे अपने पति के शरीर के सुरक्षित रखने की प्रार्थना की थी इसलिए इस व्रथ में कच्चा सूत आवश्यक है।


सिंदूर
सुहाग का प्रतीक होने के कारण सिंदूर का प्रयोग इस व्रत में जरूरी माना गया है। सिंदूर वट वृक्ष में लगाया जाता है और इससे मांग भरा जाता है ताकि सुहाग बना रहे।


बांस का बयना
जेठ के महीने में बहुत गर्मी पड़ती है। वट वृक्ष को वर यानी पति स्वरूप मानकर इन्हें बांस का बयना झला जाता है। सत्यवान लकड़ी काटते हुए अचेत होकर गिर पड़े थे तो सावित्री ने अपने पति को बयना झला था इसलिए इसमें बयना का प्रयोग किया जाता है।


 


 


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