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कुमार स्वामी के आंसुओं से विपक्षी एकता का गर्भपात



कुमार स्वामी के आंसुओं से विपक्षी एकता का गर्भपात

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कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार कहा था कि सत्ता उनके लिए विष के समान है, उनकी बात सत्य साबित हो रही है।


कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी ने दो महीनों के कार्यकाल में ही अपने सहयोग से चल रही सरकार के मुख्यमंत्री कुमार स्वामी को विषकंठ बना दिया जो सत्ता का हलाहल पीने को अभिशप्त हैं। राज्य के मुख्यमंत्री और जनता दल (धर्मनिरपेक्ष) के नेता कुमारस्वामी ने कहा है कि वह सत्ता में तो हैं लेकिन इसके लिए उन्हें नीलकंठ की तरह विष पीना पड़ रहा है। मैं भगवान शंकर की तरह विष पी रहा हूं। कुमार स्वामी ने यह बात अपनी पार्टी द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में कही। इतना कहते हुए कुमार स्वामी की आंखें भर आईं और वे मंच पर ही रोने लगे। कुमारस्वामी के आंसुओं को चाहे कांग्रेस के कुछ नेताओं ने मन ही मन अपनी उपलब्धि माना हो परंतु दो आंसुओं से आई बाढ़ से कर्नाटक में ही डली विपक्षी एकता की ईमारत की नींव के बहने का खतरा पैदा हो गया है। कांग्रेस के व्यवहार से संकेत गया है कि उसका रवैया सहयोगियों के प्रति मित्रता का नहीं बल्कि उस स्वार्थी बंदरिया की भांति है जो गर्मी में पांव जलने पर अपने बच्चों को ही पैरों के नीचे ले  लेती है। कमजोर कांग्रेस और ऊपर से अहंकारी स्वभाव विपक्षी एकता के गर्भपात का कारण बन सकता है।


 

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, हालांकि भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस और जनता दल (ध) ने चुनाव बाद गठबंधन किया था। कांग्रेस ने ज्यादा सीटें  (78) जीतने के बावजूद जद (ध) नेता कुमारस्वामी (37 सीटें) को मुख्यमंत्री बनवा दिया। कुमारस्वामी के पिता एचडी देवेगोड़ा के कनिष्ठ रहे निवर्तमान मुख्यमंत्री व वर्तमान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैय्या के बीच तल्खी के संबंध रहे हैं। एचडी देवेगोड़ा की मेहरबानी से दो बार राज्य के उपमुख्यमंत्री रहे सिद्धारमैय्या को जनता दल में कुमार स्वामी के बढ़ते प्रभाव के चलते ही पार्टी छोड़ कांग्रेस में आना पड़ा था। चाहे सिद्धारमैय्या ने कुमार स्वामी के मजबूरीवश मुख्यमंत्री बनवा तो दिया परंतु इसे वे अपनी पराजय मान रहे हैं। यही कारण है कि कदम-कदम पर कुमार स्वामी के रास्ते में कांटे बीजे जा रहे हैं। सरकार गठित होने के दो महीने से भी कम समय में मंत्री पद के बंटवारों, किसान कर्जमाफी, पेट्रोल-डीजल की कीमत जैसे मसलों पर कई बार जनता दल और कांग्रेस आमने-सामने आ चुकी है। झगड़ा सुलझाने के लिए कुमारस्वामी और खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की कई बार मुलाकात हो चुकी है। कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल की सरकार बड़ी कोशिशों से बनी थी और अब इस सरकार पर भी एक के बाद एक आफतें आती दिख रही हैं। जून में ही सिद्धारमैया के दो वीडियो टेप सामने आए। इनमें से एक में सिद्धारमैया कुछ विधायकों से कह रहे हैं, आम तौर पर नई सरकार बजट पेश करती है, लेकिन यहां तो पहले ही बजट पेश हो चुका है। तो ऐसे में नए बजट की तैयारियां कैसे शुरू हो सकती हैं जब हमने सांझा न्यूनतम कार्यक्रमों पर चर्चा तक नहीं की है। सियासी गलियारों में बजट को लेकर इतना विवाद इसलिए भी हुआ क्योंकि सिद्धारमैया ने मैसूर में मीडिया से कहा था कि कुमार स्वामी सिर्फ एक पूरक बज पेश करेंगे और इसके ठीक बाद कुमार स्वामी ने नया बजट पेश करने के लिए राहुल गांधी की मंज़ूरी ले ली। इससे सिद्धारमैय्या की सरकार के प्रति नाराजगी और बढ़ गई। वे अपने कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि सरकार चलाते रहने के लिए वे बाध्य नहीं है और 2019 (लोकसभा चुनाव) के बाद कुछ भी हो सकता है। एक स्थानीय टीवी चैनल पर जब उनसे पूछा गया कि क्या कांग्रेस-जेडीएस सरकार पांच साल तक चल पाएगी तो उन्होंने कहा, पांच साल तो मुश्किल है...लोकसभा चुनाव तक तो सरकार है, लेकिन इसके बाद क्या होगा, ये देखा जाएगा।

 

याद रहे कि कुमार स्वामी के शपथग्रहण समारोह के दौरान देश के लगभग सभी भाजपा विरोधी दल एक मंच पर एकत्रित हुए थे और इसके बाद शुरू हुई थी विपक्षी एकता की चर्चा। लेकिन बहुत से कारण हैं जो इस संभावित एकता पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। सबसे पहले तो अरविंद केजरीवाल की पार्टी को लेकर कांग्रेस और खुद आप में ही काफी विरोध हो चुका है। कांग्रेस के दिल्ली के स्थानीय नेता केजरीवाल को फूटी आंख पसंद नहीं करते। उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा का कद कांग्रेस से इतना बड़ा हो चुका है कि संभावित महागठजोड़ के कोटे से कांग्रेस को यूपी की 80 सीटों में कांग्रेस को केवल दो या तीन सीटें ही लडऩे के लिए दिए जाने की बातें हो रही हैं। यूपी कांग्रेस इससे ज्यादा की मांग कर रहा है। उधर महागठजोड़ की धुरंधर नेता कहे जाने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बैनर्जी खुद अपने राज्य में इतनी बुरी तरह से घिर गई हैं कि उन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए एडी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। अब रही सही कसर कर्नाटक में कांग्रेस ने अपने सहयोगी जनता दल के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करना शुरू करके पूरी कर दी है। कुमार स्वामी के आंसू प्रकरण से कांग्रेस के सहयोगी दलों में उसकी नीयत को लेकर संदेह पैदा कर दिया है जो महागठजोड़ की भ्रूण हत्या का कारण बन सकता है।

 

वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है जब कांग्रेस पार्टी ने भाजपा को रोकने के लिए पहले किसी भी दल का साथ दिया और मौका आते ही उसे लातिया कर बाहर कर दिया हो। इससे पूर्व कांग्रेस पार्टी चंद्रशेखर व इंदर कुमार गुजराल की सरकारों के साथ ऐसा व्यवहार कर चुकी है। चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापिस लेने का कांग्रेस ने जो कारण बताया वह आज तक का सबसे बड़ा राजनीतिक परिहास है, जिसमें कांग्रेस ने दस जनपथ के बाहर गिरफ्तार हरियाणा पुलिस के चार जवानों का हवाला देते हुए कहा था कि तत्कालीन केंद्र सरकार राजीव गांधी व गांधी परिवार की जासूसी करवा रही है। आज कर्नाटक में यही कुछ हो रहा है। कांग्रेस अपने समर्थन का मूल्य वसूल रही है और जनता दल (ध) को अपने एजेंडे पर चलने को मजबूर कर रही है। मुख्यमंत्री होते हुए भी कुमार स्वामी अपने आप को असमर्थ मान रहे हैं। प्रश्न पैदा होता है कि कांग्रेस के इस रवैये के चलते आखिर कौन सा दल 2019 में कांग्रेस के साथ मोदी विरोधी मोर्चे पर डटेगा?

 

- राकेश सैन

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