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जानिए कैसे करें श्रावणी एकादशी का व्रत



जानिए कैसे करें श्रावणी एकादशी का व्रत

श्रावणी एकादशी

वर्ष में दो बार पुत्रदा एकादशी मनाई जाती है एक पौष शुक्ल पक्ष में और दूसरी सावन के शुक्ल पक्ष की एकादशी को।


 डेस्क-श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं। संतान प्राप्ति के लिए यह बहुत पुण्यदायी व्रत माना गया है। इस व्रत का अनंत फल है। इस व्रत को श्रद्धा पूर्वक करने से संतान प्राप्ति की कामना पूरी होती है।



  • यदि आपके पास संतान है तो भी इस व्रत को रखने से संतान योग्य होती है और शिक्षा तथा प्रतियोगिता में सफलता की प्राप्ति करती है।

  • कल 21 अगस्त 2018 (मंगलवार) को प्रातः 05:17 से 22 अगस्त 2018 बुधवार को सुबह 07:40 तक एकादशी है ।

  • विशेष - 22 अगस्त 2018 बुधवार को एकादशी व्रत (उपवास) रखें ।


ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि वर्ष में दो बार पुत्रदा एकादशी मनाई जाती है एक पौष शुक्ल पक्ष में और दूसरी सावन के शुक्ल पक्ष की एकादशी को। सावन के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सावन पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। माना जाता है, पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी व्रत करना चाहिए।


अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार



  • सावन पुत्रदा एकादशी जुलाई या अगस्त के महीने में आती है।

  • पौष की पुत्रदा एकादशी को उत्तरी भारत के प्रदेशों में बड़े स्तर पर मनाया जाता है|

  • जबकि सावन की पुत्रदा एकादशी अन्य प्रदेशों में मानी जाती है।

  • वैष्णव समुदाय, इस एकादशी को पवित्रोपना एकादशी या पवित्र एकादश के नाम से जानते हैं।


पुत्रदा एकादशी  की कथा ओर विधान


नि:संतान दंपति श्रावण शुक्ल एकादशी के दिन बिना कुछ खाए पिए पूरे संयम और नियम से व्रत करें।


सुबह जल्दी उठकर नहाएं और भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके बाद किसी ब्राह्मण को यथायोग्य दान-दक्षिणा दें।


फिर द्वादशी के दिन व्रत का पारणा करें। 


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पीपल के पेड़ की पूजा करें -



  • जिन दंपतियों की संतान पैदा होने के बाद मृत हो जाती हो या स्त्री का गर्भपात हो जाता हो वे इस एकादशी के दिन व्रत करें।

  • सुबह ब्रह्ममुहूर्त में किसी पीपल के पेड़ के पास जाकर उसकी जड़ में चांदी के लोटे से कच्चे दूध में मिश्री मिलाकर चढ़ाएं।

  • पीपल के तने पर सात बार मौली लपेटकर संतान की अच्छी सेहत की प्रार्थना करें।


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श्रावण पुत्रदा एकादश व्रत के लाभ



  • हिन्दू धर्म में बहुत से महत्वपूर्ण संस्कार किये जाते है, जिनमें से कुछ संस्कारों में पुत्र का होना बहुत जरुरी होता है।

  • इसलिए प्रत्येक शादीशुदा दंपत्ति पुत्र संतान की इच्छा रखते हैं।

  • परन्तु बहुत से कारणों की वजह से कुछ दम्पतियों को पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं होती जिसके कारण वे बहुत परेशान रहते हैं।

  • ऐसे ही स्थितियों में सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत करना लाभकारी माना जाता है।

  • पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए पुत्र एकादशी का व्रत रखा जाता है।

  • शास्त्रों के अनुसार जो दम्पत्ति पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखते हैं उन्हें साल में दोनों बार पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए।

  • इसके अलावा निःसंतान दंपत्ति भी सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत रखते संतान सुख प्राप्त कर सकते हैं।

  • कहा जाता है इस व्रत को रखने से वंश में वृद्धि होती है और मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।


श्रावण पुत्रदा एकादशी 2018 कब है?



  • 2018 में सावन पुत्रदा एकादशी 22 अगस्त 2018, बुधवार को है।

  • 23 अगस्त को व्रत खोलने का समय = 05:58 से 08:32 तक।

  • व्रत पारण के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय 10:15 बजे है।

  • एकादशी तिथि का प्रारंभ = 21 अगस्त 2018 को 05:16 बजे।

  • एकादशी तिथि समाप्त = 22 अगस्त 2018 को 17:40 बजे।


शास्त्रों के अनुसार जो दम्पत्ति पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखते हैं उन्हें साल में दोनों बार पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। इसके अलावा निःसंतान दंपत्ति भी सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत रखते संतान सुख प्राप्त कर सकते हैं। कहा जाता है इस व्रत को रखने से वंश में वृद्धि होती है और मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

यह हैं पुत्रदा एकादशी का महत्व


युधिष्ठिर ने पूछा : मधुसूदन ! श्रावण के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है ? कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! प्राचीन काल की बात है । द्वापर युग के प्रारम्भ का समय था । माहिष्मतीपुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे किन्तु उन्हें कोई पुत्र नहीं था, इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था । अपनी अवस्था अधिक देख राजा को बड़ी चिन्ता हुई । उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा: ‘प्रजाजनो ! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ है । मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है । ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है । पुत्रवत् प्रजा का पालन किया है । धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया है । दुष्टों को, चाहे वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है । शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया है और किसीको द्वेष का पात्र नहीं समझा है । फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ? आप लोग इसका विचार करें ।’

राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया । राजा का कल्याण चाहनेवाले वे सभी लोग इधर उधर घूमकर ॠषिसेवित आश्रमों की तलाश करने लगे । इतने में उन्हें मुनिश्रेष्ठ लोमशजी के दर्शन हुए ।

लोमशजी धर्म के त्तत्त्वज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं । उनका शरीर लोम से भरा हुआ है । वे ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हैं । एक एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक एक लोम विशीर्ण होता है, टूटकर गिरता है, इसीलिए उनका नाम लोमश हुआ है । वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते हैं ।

उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ । लोगों को अपने निकट आया देख लोमशजी ने पूछा : ‘तुम सब लोग किसलिए यहाँ आये हो? अपने आगमन का कारण बताओ । तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करुँगा ।’

प्रजाजनों ने कहा : ब्रह्मन् ! इस समय महीजित नामवाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है । हम लोग उन्हींकी प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भाँति पालन किया है । उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दु:ख से दु:खित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आये है । द्विजोत्तम ! राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है । महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं । मुने ! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो ।

उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी के लिए ध्यानमग्न हो गये । तत्पश्चात् राजा के प्राचीन जन्म का वृत्तान्त जानकर उन्होंने कहा : ‘प्रजावृन्द ! सुनो । राजा महीजित पूर्वजन्म में मनुष्यों को चूसनेवाला धनहीन वैश्य था । वह वैश्य गाँव-गाँव घूमकर व्यापार किया करता था । एक दिन ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह किसी गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा । पानी से भरी हुई बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया । इतने में वहाँ अपने बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची । वह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी, अत: बावली में जाकर जल पीने लगी । वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हाँककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीने लगा । उसी पापकर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं । किसी जन्म के पुण्य से इन्हें निष्कण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है ।’

प्रजाजनों ने कहा : मुने ! पुराणों में उल्लेख है कि प्रायश्चितरुप पुण्य से पाप नष्ट होते हैं, अत: ऐसे पुण्यकर्म का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय ।
लोमशजी बोले : प्रजाजनो ! श्रावण मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, वह ‘पुत्रदा’ के नाम से विख्यात है । वह मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली है । तुम लोग उसीका व्रत करो ।
यह सुनकर प्रजाजनों ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ के व्रत का अनुष्ठान किया । उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को अर्पण कर दिया । तत्पश्चात् रानी ने गर्भधारण किया और प्रसव का समय आने पर बलवान पुत्र को जन्म दिया ।

इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है|


ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री


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