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श्री जड़ भरत जी महाराज के 3 जन्मों रहस्य जानिए



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इन्होंने अपने पुत्र भरत को राजगद्दी सोंप दी 


डेस्क-श्री ऋषभ देव जी के 100 पुत्र थे जिनमें सबसे बड़े भरत जी थे। इन्होंने अपने पुत्र भरत को राजगद्दी सोंप दी। इनका विवाह विश्वरूप की कन्या पञ्चजनी से हुआ। इनके 5 पुत्र हुए- सुमति, राष्ट्रभृत, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु। पहले भारत को अजनाभवर्ष कहते थे लेकिन राजा भरत के समय से “भारतवर्ष” कहा जाने लगा।


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इन्होंने बड़े अच्छे से प्रजा का पालन किया और ये बहुत अच्छे राजा साबित हुए। एक करोड़ वर्ष बीत जाने पर इन्होंने राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया। और खुद पुलहाश्रम(हरिहरक्षेत्र) में आ गए। यहाँ पर गंडकी नाम की नदी थी उसकी तलहटी में शालिग्राम जी मिलते हैं। वहीँ पर भगवान का ध्यान करते, पूजा पाठ करते और कंद मूल से भगवान की आराधना करते। इस तरह ये भगवान में मन को लगाए रहते।



  • एक बार भरतजी गण्डकी में स्नान कर रहे थे तो इन्होंने देखा की एक गर्भवती हिरनी पानी पीने के लिए नदी के तट पर आई।

  • अभी वह पानी पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंह की लोक भयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी।

  • जैसे ही उसने शेर की दहाड़ सुनी तो वह डर गई और उसने नदी पार करने के लिए छलांग लगा दी।

  • उसी समय उसके गर्भ से मृगशावक बाहर आ गया और नदी में गिर गया।

  • हिरनी ने भी नदी पार की और डर के मरे गुफा में मर गई।


भरत जी ने देखा की हिरनी का बच्चा नदी में बह रहा है। उन्हें बड़ी दया आई और कूदकर उस हिरन के बच्चे को बचा लिया और अपने आश्रम पर ले आये। वे बड़े प्यार से उस हिरनी के बच्चे का पालन करने लगे। वो हिरन भी अब भरत जी को ही अपना सब कुछ समझने लगा। लेकिन भरत जी एक गलती कर गए ।उनका मन भगवान की पूजा से हटकर उस हिरन के बच्चे में आशक्त हो गया।


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  • हरिन के बच्चे में आसक्ति बढ़ जाने से बैठते, सोते, टहलते, ठहरते और भोजन करते समय भी उनका चित्त उसके स्नेहपाश में बँधा रहता था।

  • क्योकि मन एक है या तो आप इसे संसार में लगा लो या भगवान में।

  • अब वो जो भी भगवान का पूजा पाठ करते तो उस समय उन्हें उस हिरन के बच्चे की याद आ जाती।

  • कहीं उसे कोई कुत्ता, या सियार या भेड़िया खा न जाये।

  • अगर भरत जी को वह दिखाई नही देता तो उनकी दशा ऐसे हो जाती की किसी का सारा धन लूट गया हो।

  • भरत जी को उसके रहने की, खाने की और सोने की चिंता लगी रहती थी।


एक दिन ऐसा आया की भरत जी अपने दैनिक कर्म में लगे हुए थे वहां हिरनों का झुंड आया और वह हिरन का बच्चा उनके साथ चला गया। जब भरत जी को हिरन का बच्चा कहीं भी नही मिला तो उसे निरंतर उस हिरन की याद सताने लगी। काल का प्रभाव हुआ भरत जी की मृत्यु हुई। मृत्यु के समय भरत जी उस हिरन का ही चिंतन कर रहे थे। इस कारण उन्हें अगला जन्म कालिंजर पर्वत पर एक हिरनी के गर्भ से हुआ।

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