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इस फ़िज़ा की मुस्कराहट के पीछे कोई श्मशान नज़र आता है



इस फ़िज़ा की मुस्कराहट के पीछे कोई श्मशान नज़र आता है

सलिल सरोज की कविता

जो देखूँ दूर तलक तो कहीं बियाबाँ , कहीं तूफाँ नज़र आता है 

इस फ़िज़ा की मुस्कराहट के पीछे कोई श्मशान नज़र आता है

 

इंसानों ने अपनी हैवानियत में आके किसी को भी नहीं बख्शा है

कभी ये ज़मीं लहू-लुहान तो कभी घायल आसमाँ नज़र आता है 

 

मशीनी सहूलियतों ने ज़िन्दगी की पेचीदगियाँ यूँ बढ़ा दी हैं कि 

जिस इंसान से मिलो,वही इंसान थका व परेशान नज़र आता है  

 

क़ानून की सारी ही तारीखें बदल गई हैं पैसों की झनझनाहट में 

मुजरिमों के आगे सारा तंत्र ही न जाने क्यों हैरान नज़र आता है  

 

किताबें,आयतें,धर्म,संस्कृति,संस्कार,रिवाज़ सब के सब बेकार 

शराफत की आड़ में छिपा सारा महकमा शैतान नज़र आता है 

 

बच्चों की मिल्कियत छीनके अपने उम्मीदों का बोझ डाल दिया

मेरी निगाहों में अब तो हर माँ-बाप ही बेईमान नज़र आता है 

 

सलिल सरोज 

 


परिचय


नई दिल्ली

शिक्षा: आरंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, तिलैया, कोडरमा,झारखंड से। जी.डी. कॉलेज,बेगूसराय, बिहार (इग्नू)से अंग्रेजी में बी.ए(2007),जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए(2011),  जीजस एन्ड मेरीकॉलेज,चाणक्यपुरी(इग्नू)से समाजशास्त्र में एम.ए(2015)।

प्रयास: Remember Complete Dictionary का सह-अनुवादन,Splendid World Infermatica Study का सह-सम्पादन, स्थानीय पत्रिका”कोशिश” का संपादन एवं प्रकाशन, “मित्र-मधुर”पत्रिका में कविताओं का चुनाव।सम्प्रति: सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिश।



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