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एक किया तो अल्पेश जैसे बांस के फूल भी हैं जो देश के सम्मुख विपत्ती पैदा करने की फिराक में हैं।



एक किया तो अल्पेश जैसे बांस के फूल भी हैं जो देश के सम्मुख विपत्ती पैदा करने की फिराक में हैं।

राहुल गाँधी अल्पेश ठाकुर फ़ाइल फोटो

बांस के पौधे पर बरसों के बाद बसंती चढ़ती है परंतु इसका फूल विपदा का संकेत माना जाता है।


अपनी संपन्नता के चलते लघु भारत के रूप में विख्यात गुजरात वर्तमान में क्षेत्रवाद की आग में झुलस रहा है। कांग्रेस के विधायक अल्पेश ठाकोर के नेतृत्व वाली ठाकोर सेना वहां दूसरे राज्यों से आए लोगों पर अत्याचार ढहा रही है। विशेषकर बिहार व उत्तर प्रदेश के श्रमिकों को निशाना बनाया जा रहा है। ठाकोर सेना की इस गुंडागर्दी से हजारों लोग पलायन करने को विवश हैं। वहां विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने जिस तरीके से अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवानी व हार्दिक पटेल नामक जातिवादी त्रिदेवों की अशुभ प्रतिमाओं में प्राण प्रतिष्ठा की उसका परिणाम अब सामने आरहा है।


अल्पेश पिछड़ा वर्ग, जिग्नेश दलितों के और हार्दिक पटेल पाटीदार समाज के हितपोषण का दावा करते हैं। कांग्रेस के उस समय के नए-नए बने अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस अशुभ जातीय त्रिवेणी को युवा ब्रिगेड बता कर अपनी जीत का जातिगत समीकरण बैठाने का प्रयास किया जो आज गंभीर संकट का कारण बन कर सामने आया है। बता दें कि महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुए जातीय दंगों में गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवानी का नाम पहले आ चुका है और अब अल्पेश ठाकोर अपनी कारसतानियों से देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं।

इसे गुजराती मिट्टी का विरोधाभासी प्रकृति ही कहा जा सकता है कि जिसने जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश विभाजन के खलनायक जिन्नाह को एक साथ जन्म दिया। इसी धूल में लोटपोट हो बचपन गुजारने वाले सरदार पटेल ने पूरे देश को एक किया तो अल्पेश जैसे बांस के फूल भी हैं जो देश के सम्मुख विपत्ती पैदा करने की फिराक में हैं। अल्पेश ने ओबीसी, एससी और एसटी एकता मंच गठित कर अपनी राजनीतिक शुरूआत की थी। आज वो पाटन जिले की राधनपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस के विधायक हैं।


विधानसभा चुनाव के दौरान गांधी नगर में अल्पेश ठाकोर, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ नजर आए और उन्होंने अपने कई समर्थकों को भी कांग्रेस से टिकट दिलवाया। अल्पेश बिहार में कांग्रेस के सह-प्रभारी भी हैं। पार्टी ने वहां के पिछड़ा समाज को आकर्षित करने की जिम्मेदारी अल्पेश को दी हुई है। देश के स्वतंत्रता संग्राम के नेतृत्व का दंभ भरने व छह दशक तक पूरे देश में एकछत्र राज कर चुकी राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता प्राप्त कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने गांधी की जन्मभूमि को जिस तरीके से बदनाम किया है उसके लिए इतिहास उससे अवश्य हिसाब मांगेगा।

जातिवाद व क्षेत्रवाद का दुर्योधन व कर्ण जैसे अटूट संबंध हैं, जो बिना विवेक के साथ-साथ चलते हैं। यह जातीय भनवाएं ही हैं जो आगे बढ़ कर भाषाई व क्षेत्रवादी समस्या का रूप लेती हैं। अपने यहां राष्ट्र के लिए अखिल भारतीय चेतना के समक्ष इसकी क्षेत्रीय संस्कृतियों की देश के रूप में व्याख्या करने की एक परम्परा है। यहाँ के विविध भाषा-भाषी क्षेत्रों में संस्कृति के कई रंग इस बात की पुष्टि भी करते हैं। राष्ट्रीय विविधता एवं क्षेत्रीयता के संतुलनकारी अंत:सम्बन्ध का नियामक रहे हैं। ब्रटिश काल में बड़े ही सुनियोजित ढंग से क्षेत्रीयता को पृथकतावादी भावना से मजबूत बनाए रखने का प्रयास हुआ। भारत में ही नहीं संसार के अनेक भागों में ऐसा ही हुआ। यूरोपीय जातियां पंद्रहवीं सोलहवीं और सत्रहवीं शती में जब संसार के विभिन्न भागों में पहुँची तो उन्होंने स्थानीय निवासियों को अधीन कर लिया।


शासन प्रणाली कुछ इस ढंग की रखी कि औपनिवेशिक शासितों में कभी एकजुट होने की कोई संभावना नहीं छोड़ी। औपनिवेशिक भारत में 18वीं व 19वीं शती के विद्रोह स्थानीय एवं क्षेत्रीय ही बने रहे। देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति को दबाने वाले भी भारतीय-ब्रिटिश सैनिक ही थे। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय संघर्ष के दौरान क्षेत्रीयता, विशेषकर भाषा एवं संस्कृति को राष्ट्रवाद के पक्ष में पूरी तरह भुला देने की त्यागवृत्ति जाग गई हो।


स्वाधीनता की लड़ाई के दौरान ही प्रश्न उठने लगे थे कि स्वतंत्र के बाद देश में विभिन्न भाषा-भाषियों की स्थिति क्या होगी ? क्या उन्हें अपनी क्षेत्रीय अस्मिता की रक्षा करने दी जायेगी और उनकी अपनी पहचान सुरक्षित रह सकेगी ? उस समय कांग्रेस ने यह वायदा किया कि स्वाधीनता के बाद देश के सभी राज्यों का भाषा के आधार पर गठन किया जायेगा। यही वह आधार था, जिसके तहत छठे दशक में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया और उसकी सिफारिशों में कहीं-कहीं फेरबदल करके अधिसंख्य राज्यों का पुनर्गठन किया गया।


विभाजन के पूर्व एक विभाजनकारी चेतना का संकट तो था ही, देश को उपराष्ट्रीयता और क्षेत्रीयता के तमाम प्रश्नों से भी गुजरना पड़ा। क्षेत्रीयता के मूल में पहचान का कृत्रिम संकट है। अनेक क्षेत्रीय, भाषाई, धार्मिक और नस्लीय वर्गों को यह भय सताता रहता है कि कुछ समुदाय जनसंख्या बल, आर्थिक शक्ति, राजनैतिक प्रभुता या पंथिक आक्रामकता से उनकी पहचान को लुप्त कर देंगे। क्षेत्रीयता की उभरती नवीन प्रवृत्ति, विशेष रूप से आठवें दशक के उत्तराद्र्ध एवं नव दशक की राजनैतिक और आर्थिक प्रवृत्तियों की उपज है।


राजनैतिक परिदृश्य में स्थानीय आवश्यकताओं की अनदेखी और असंतुलित विकास ने क्षेत्रीयता को और विसंगतिपूर्ण तथा और प्रासंगिक सा बना दिया। आर्थिक विसंगति ने ही देशव्यापी प्रवास को बढ़ावा दिया। बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान से मजदूरों का बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों को पलायन हुआ। इससे आर्थिक रूप से सम्पन्न कुछ क्षेत्रों तथा संभावना वाले क्षेत्रों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया। पहचान के लिए सबसे बड़ा संकट असम व त्रिपुरा के सम्मुख रहा है, शायद इतना किसी अन्य प्रदेश को नहीं रहा। अवैध घुसपैठ व प्रवासियों के चलते स्थानीय निवासियों में अल्पसंख्यक होने का भय सताने लगा।

चार दशक पहले महाराष्ट्र विशेष रूप से मुम्बई में जब बाल ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना का उदय हुआ तो उनका निशाना मुम्बई में बसने वाले दक्षिण भारतीय थे। पंजाब में भी एक सुगबुगाहट प्राय: सुनाई देती है कि यहां उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वालों की संख्या बढ़ी है। भाषा पर आधारित पुनर्गठित इस राज्य के लोगों में यह आशंका पैदा करवाई जाती रही है कि यदि यही जारी रहा तो पंजाब में जनसंख्या का संतुलन ही बिगड़ेगा और वह हिन्दी भाषी प्रदेश बन जायेगा।


किसी प्रदेश या क्षेत्र में जब इस तरह की मानसिकता विकसित होने लगे तो स्वभाविक है कि उससे अवसरवादी दल व संगठन भी पनपनते हैं। संकीर्ण स्वार्थों के फलीभूत यह शक्तियां राष्ट्र के अभिन्न घटक हर क्षेत्र की मन मुताबिक व्याख्या करते और अपना एजेंडा लागू करते हैं जिस तरह से अल्पेश की ठाकोर सेना ने किया है। ऐसे में राष्ट्रीय दलों व राष्ट्रवादी शक्तियों का दायित्व बनता है कि वह अपने सामयिक हित व मतभेद भुला कर क्षेत्रवादी ज्वर का उपचार करें। वास्तव में क्षेत्रीयता, राष्ट्रीय छत्रछाया में ही प्रासंगिक रूप से व्याख्यायित की जा सकती है। खण्ड-खण्ड में बंटी क्षेत्रीय अस्मिताओं को राष्ट्रवाद एक सुरक्षा कवच उपलब्ध करवाता है। दूसरी ओर क्षेत्रीय अस्मिता और पहचान की वर्तमान दुविधा पर भी राष्ट्रीय स्तर पर विचार होना चाहिए और आवश्यक हो तो इस संबंध में कुछ नीति भी बनाई जानी चाहिए।


 

- राकेश सैन

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