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रुपये में इस दोष के कारण ही लगातार डॉलर से कमजोर होता जा रहा है रुपया  



रुपये में इस दोष के कारण ही लगातार डॉलर से कमजोर होता जा रहा है रुपया   

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जानिए की आखिर क्यों भारतीय मुद्रा के सिंबल रुपये को वास्तु सम्मत बनाये बिना नहीं सुधरने वाली रुपये की सेहत...



डेस्क -आजकल अमेरिकन डॉलर की तुलना में भारतीय रुपये के तेजी से हो रहे अवमूल्यन से समूचे देश में चिंता का माहौल है तथा रुपये का अवमूल्यन रोकने की दिशा में भारत सरकार की सारी कोशिशें टांय-टांय-फिस्स होती नजर आ रही हैं।


रुपये के सिंबल में वास्तु दोष के चलते रुपये का लगातार अवमूल्यन हो रहा है तथा सिंबल को वास्तु सम्मत बनाये बिना रुपये की सेहत में सुधार की उम्मीद नहीं।


भारतीय रुपये की इस वर्तमान डिजाइन को गुवाहाटी के इंजीनियर धर्मालिंगम उदय कुमार ने 2010 में बनाया था। जिसे भारत सरकार द्वारा स्वीकारे जाने के बाद 10 , 100 , 500 और हजार के नोट में इस्तेमाल किया गया था।


इस वर्तमान भारतीय रूपये के प्रतीक चिन्ह में देवनागरी और लैटिन शब्द आर का इस्तेमाल किया गया है। जिसमें आर अक्षर ऊर्ध्वाधर बार चिन्ह के शीर्ष पर दो समानांतर लाइनें तिरंगे का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये देश की आर्थिक समानता को कम करने की इच्छा का प्रतीक है।


आज रुपया डॉलर के मुकाबले कई प्रतिशत गिर चुका है। जिसके पीछे यही कारण है। अगर रूपये के वर्तमान प्रतीक चिन्ह को नहीं बदला गया तो स्तिथि इससे भी ज्यादा खराब हो सकती है। उन्होंने ये भी कहा कि अगर केंद्र सरकार वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक चाहे तो उनके द्वारा इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।



डॉ. मनमोहन सिंह जब भारत के प्रधानमंत्री थे, तब वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यह कहकर उन पर कटाक्ष किया करते थे कि गिरता रुपया जल्द ही उनकी उम्र को पार कर जायेगा। लेकिन अब चूंकि नरेन्द्र मोदी खुद भारत के प्रधानमंत्री हैं और रुपया उनकी उम्र 68 साल को पार कर 74 तक पहुंच चुका है, तब उनकी सरकार रुपये का अवमूल्यन रोकने में पूरी तरह व्यर्थ साबित हो चुकी है।


दरअसल भारत के राजनीतिक नेता रुपये के साथ गिर रही भारत की साख को बचाने के बजाय एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के गंदे खेल में ही व्यस्त हैं, जो वाकई चिंता का विषय है।


सोचने की बात है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1966 के भारी सूखे, 1975 की आपातस्थिति, 1997 के एशियाई वित्तीय संकट, 2007-08 की वैश्विक वित्तीय मंदी आदि सरीखी गंभीर परिस्थितियों के बावजूद रुपये का इतना अवमूल्यन नहीं हुआ था, जितना आज सामान्य हालातों में हो रहा है।


वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने कहा कि भारत सरकार द्वारा 2010 में रुपये का नया प्रतीक जारी करने के बाद से ही रुपये का तेजी से अवमूल्यन हो रहा है। रुपये के प्रतीक में वास्तु संबंधी भयंकर दोष है, जो रुपये के अवमूल्यन के साथ ही देश की अर्थनीति को नुकशान पहुँचायेगा और यह भविष्यवाणी पूरी तरह सत्य साबित हो चुकी है।


किसी भी सरकार ने रुपये के प्रतीक में वास्तु संबंधी दोष को दूर करने के संदर्भ में कोई कदम नहीं उठाया, जिसका परिणाम आज डॉलर की तुलना में रुपया ऐतिहासिक गिरावट के साथ 74 के रेकॉर्ड स्तर को पार कर चुका है।'


उन्होंने बताया कि कि हिंदी के 'रÓ में बीच में एक लाईन डालकर इस प्रकार रुपये का प्रतीक बनाया गया है, जो उसका गला काटता प्रतीत होता है।


वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार वास्तु के नजरिये से यह भयंकर दोष है क्योंकि वास्तु के अनुसार घर के उत्तर-पूर्व के कोने में वास्तु पुरुष का सिर होता है। कोई भी व्यक्ति अगर उत्तर-पूर्व को काटकर गृह निर्माण करता है तो वास्तु उस परिवार को तबाह कर देता है। रुपये के नये प्रतीक में भी 'रÓ का गला काट दिया गया है, जो उसके पतन का संकेत देता है।


लेकिन दुर्भाग्य की बात है किसी ने भी रुपये के प्रतीक में संशोधन हेतु कोई कदम नहीं उठाया, जिसका परिणाम रोज गिर रहा रुपया आज 74 के आंकड़े को पार कर चुका है।


उल्लेखनीय है कि 2012 में जब डॉलर के मुकाबले रुपया 44 के स्तर पर था, जो विगत सिर्फ 6 सालों में 30 रुपया गिरकर 74 तक पहुंच चुका है।


देश की आजादी के बाद रुपये के प्रतीक को जारी करने के पूर्व 65 सालों में सिर्फ 44 रुपये ही गिरा था, जबकि रुपये के प्रतीक को लागू करने के बाद से सिर्फ 8 सालों में 30 रुपये गिर चुका है। सोचने की बात है कि जबकि देश में युद्ध, आतंकवाद, दंगे-फसाद अथवा किसी प्रकार की भयंकर प्राकृृतिक आपदा भी नहीं है, जिसके चलते रुपये का इतना भारी अवमूल्यन हो।


ऐसे में सरकार को तत्काल रुपये के प्रतीक में वास्तु सम्मत सुधार करने हेतु गंभीरतापूर्वक कदम उठाने होंगे, वर्ना श्री नरेन्द्र मोदी की उम्र पार कर चुका रुपया 'सेंचुरी' भी मार जाये तो कोई बड़ी बात नहीं।
पंडित दयानंद शास्त्री


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