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यही मुद्दे जो हावी रहेंगे मध्य प्रदेश चुनाव 2018 में



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  • आगामी चुनावों पर चिन्तन...

  • मध्यप्रदेश में कौन हारेगा

  • मोदी जी या राहुल जी..


पंडित दयानंद शास्त्री - आगामी दिसम्बर माह में मध्य प्रदेश 2018 में भाजपा अब तक का सबसे मुश्किल चुनाव लड़ने जा रही है. 15 साल से सत्ता पर जमी भाजपा खुद इस चुनावी घमासान से डरी हुई नजर आ रही है. इतना ही नहीं, भाजपा के जिस कार्यकर्ता महाकुंभ को विश्व का सबसे बड़ा कार्यकर्ता महाकुंभ बताकर प्रचारित किया जा रहा था, उसकी स्थिति बमुश्किल प्रदेश स्तर के कार्यक्रम जितनी ही रही.


न तो उसमें लाखों की तादाद में कार्यकर्ता पहुंचे और न ही उनमें वैसा उत्साह दिखा, जो देश के ओजस्वी प्रधानमंत्री की उपस्थिति में दिखना चाहिए था. उल्टे बड़ी संख्या में कार्यकर्ता पीएम मोदी के भाषण के बीच से ही उठकर चले गए. उधर, मध्य प्रदेश में सालों से वनवास काट रही कांग्रेस में वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने ऑक्सीजन देकर कुछ दम-खम लौटाने की कोशिश तो की है, लेकिन अब भी वहां के वरिष्ठ नेताओं के बीच चल रही तनातनी के कारण कांग्रेस प्रदेश की बजाए अपनी पार्टी के अंदर की ही राजनीति में उलझी हुई है.


जिस सत्ता विरोधी लहर के कारण कांग्रेस को ज्यादा मजबूती से उभरकर आना चाहिए था, उसकी नैया भी डंवाडोल ही नजर आ रही है. उधर भाजपा के अंदर भी अर्ंतकलह कम नहीं है, लेकिन फर्क बस इतना है कि वहां के नेता सीधे तौर पर शिवराज सिंह का विरोध नहीं कर पा रहे हैं. इन दोनों पार्टियों की कमजोरी का फायदा उठाने के लिए नए और छोटे दल तैयार हो रहे हैं. दो महीने पहले अस्तित्व में आई सपाक्स समाज पार्टी प्रदेश की सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है, वहीं अब तक मध्य प्रदेश में एक भी सीट हासिल न कर सकी आम आदमी पार्टी भी सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है. ऐसा ही माहौल रहा तो तीन से चार फीसदी वोट ये छोटी पार्टियां ले जाएंगी. अगर ऐसा हुआ तो मध्य प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों के चुनावी समीकरणों का खतरे में आना तय है. उधर मायावती ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस के साथ न आने की बात कहकर चुनावों में नया रंग घोल दिया है.

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