aapkikhabar aapkikhabar

जानिए कुंडली में कैसे बनता है कालसर्प योग



जानिए कुंडली में कैसे बनता है कालसर्प योग

 कालसर्प योग

 पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यह कालसर्प योग व्यक्ति को शिखर तक भी ले जाता है।


डेस्क-कालसर्प योग अथवा दोष के बारे में अनेकानेक लेख प्रकाशित हो चुके हैं और भविष्य में भी होते रहेगें लेकिन वास्तविकता में कालसर्प दोष होता भी है या ज्योतिषियों तथा पंडितों की केवल कमाई का साधन ये योग बना हुआ है क्योंकि भारतीय ज्योतिष में या पराशर जी द्वारा कहीं भी “कालसर्प” दोष या योग का जिक्र नहीं किया गया है, पर सर्पदोष का वर्णन जरुर मिलता है जो एक अलग प्रकार का योग है। जिस प्रकार नाभस योग बनते हैं (जो जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति पर आधारित होते हैं) उन्हीं नाभस योगों के आधार पर ही कालसर्प योग भी ग्रहों की आकाशीय स्थिति है।



जानिए कुंडली में कैसे बनता है “कालसर्प योग”


जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह राहु से केतु के मध्य आ जाते हैं तब इस स्थिति को कालसर्प दोष का नाम दिया जाता है। कालसर्प की गणना कब ज्योतिषी करने लगे ये बताना कठिन है और किसने आरंभ की ये कहना भी मुश्किल हैं किन्तु ये तय है कि उत्तर भारतीय ज्योतिषी इस दोष को कुछ वर्ष पहले से जानते हैं। इस योग का प्रचार दक्षिण भारत में ज्यादा मिलता है और धीरे-धीरे यह पूरे भारत में फैल गया।


यह एक ऐसा योग है जो जातक के पूर्व जन्म के किसी जघन्य अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में परिलक्षित होता है। व्यावहारिक रूप से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता ही है, मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान होती ही नहीं, या होती है तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है।


धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। तरह तरह के रोग भी उसे परेशान किये रहते हैं।


कालसर्प दोष में राहु को साँप का मुख तो केतु को पूँछ माना गया है। यदि किसी की कुंडली में यह योग बन भी रहा है तो जरुरी नहीं कि ये सदा हानि ही पहुंचाएगा क्योंकि वर्तमान समय में जो टेक्नॉलॉजी है वह राहु के अधिकार में आती है तब राहु को बुरा नहीं कहा जा सकता है। जीवन में आ रही हर समस्या की जड़ “कालसर्प” नहीं कालसर्प राहु/केतु से बनने वाला योग है और किसी भी जातक को यदि लगता है कि उसके जीवन में जो रुकावट अथवा बाधा आ रही है वह इस योग की वजह से आ रही है तब उसे सबसे पहले यह समझना होगा कि जो भी जातक जन्म लेता है वह अपने पूर्व जन्म के बहुत से कर्म साथ लेकर पैदा हो रहा है जिन्हें संचित कर्म कहते हैं, जिनसे वह जन्मों तक बंधा रहता है। जो कर्म वह भोग रहा हैं वह जातक का प्रारब्ध कहलाता है और जो कर्म वर्तमान में जातक कर रहा है वह क्रियमाण कर्म कहलाता है। हर व्यक्ति अपनी कुंडली में अच्छे व बुरे कर्म लेकर पैदा होता है और उन कर्मों का फल(अच्छा या बुरा) ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में मिलता है। किसी भी व्यक्ति के संचित कर्म कैसे हैं वह कुंडली के योग बताते हैं। जो दशा-अन्तर्दशा जातक भोगता है और उसी के अनुसार फल पाता है तो वह प्रारब्ध के कर्म बताती है। जो क्रियमाण कर्म जातक कर रहा है वह ग्रहों का गोचर बताता है क्योंकि पहले कुंडली का योग हैं फिर योग में शामिल ग्रह की दशा है और अंत में दशा का फल ग्रहों का गोचर प्रदान करता है। इस प्रकार तीनों बातें परस्पर संबंध बनाती हैं या ये भी कहा जा सकता है कि तीनों बातें एक-दूसरे की पूरक हैं। अब कोई भी अच्छे या बुरे फल मिल रहे हैं तब उसका सारा दोष कालसर्प योग पर नहीं मढ़ देना चाहिए क्योंकि जन्म कुंडली का उचित विश्लेषण अति आवश्यक है।


परंतु याद रहे, कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस योग का समान प्रभाव नहीं पड़ता। किस भाव में कौन सी राशि अवस्थित है और उसमें कौन-कौन ग्रह कहाँ बैठे हैं और उनका बलाबल कितना है - इन सब बातों का भी संबंधित जातक पर भरपूर असर पड़ता है। इसलिए मात्र कालसर्प योग सुनकर भयभीत हो जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसका ज्योतिषीय विश्लेषण करवाकर उसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी हासिल कर लेना ही बुद्धिमत्ता कही जायेगी। जब असली कारण ज्योतिषीय विश्लेषण से स्पष्ट हो जाये तो तत्काल उसका उपाय करना चाहिए।


यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में ये योग बन भी रहा है और राहु की दशा भी चल रही है तो ये उसकी कुंडली का “योग” है जिसका फल उसे भुगतना पड़ रहा है।


ध्यान रखें,कालसर्प योग सदा अशुभ नहीं होता है कई बार ये शुभ फल भी प्रदान करता है। राहु/केतु का अपना कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है और ये जिस राशि में बैठते हैं उस राशि के स्वामी की जन्म कुंडली मैं स्थिति के आधार पर अपना फल प्रदान करते हैं। वैसे राहु को शनि की तरह माना जाता है और केतु को मंगल की तरह माना जाता है।

जानिए राहु और केतु कब देता है बुरे फल?


जन्म कुंडली में यदि राहु के साथ सूर्य, चन्द्र या गुरु स्थित है और वह कालसर्प योग बना रहा है तब यह शुभ फलों में कमी कर सकता है इसलिए नहीं कि ये योग बना है इसलिए कि सूर्य/चन्द्र, राहु के साथ ग्रहण योग बनाते हैं जो अशुभ योग है। सूर्य आत्मा तो चंद्र मन है जबकि राहु का कोई अस्तित्व ही नहीं है वह तो धुँआ भर है। जब चारों ओर धुँआ छाया होगा तब कैसे आत्मा का निखार होगा और कैसे हमारा मन निर्मल हो पाएगा। इस धुँए में व्यक्ति को कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देगा तो अनिर्णय की स्थिति में रहेगा और जब निर्णय ही नहीं ले पाएगा तो जीवन थमा सा लगेगा ही। दूसरा ये कि राहु धुँआ-सा है तो व्यक्ति को स्पष्ट परिस्थितियाँ दिखाई नहीं देती जिससे उसके द्वारा लिए निर्णय सही नहीं हो पाते और जीवन में बाधाएं तथा हानि होती है। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब यही राहु गुरु के साथ रहकर इस योग को बना है तब मन में सही-गलत को लेकर कशमकश सी चलती रहती है क्योंकि गुरु ज्ञान का कारक है वह व्यक्ति को गलत करने से रोकता है लेकिन राहु का प्रभाव इतना ज्यादा हो जाता है वह ज्ञानी को भी अज्ञानी बना देता है और जातक परंपरा से हटकर कार्य कर बैठता है। 

जानिए इन ज्योतिषीय संभावनाओं को जब जन्म कुण्डली में बनता है कालसर्प योग(कालसर्प दोष)


जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भ्रम की बीमारी सताती रहती हो, या उसे हमेशा लगता है कि कोई उसे नुकसान पहुँचा सकता है या वह व्यक्ति मानसिक तौर पर पीड़ित रहता है।
जब लग्न में मेष, वृश्चिक, कर्क या धनु राशि हो और उसमें बृहस्पति व मंगल स्थित हों, राहु की स्थिति पंचम भाव में हो तथा वह मंगल या बुध से युक्त या दृष्ट हो, अथवा राहु पंचम भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक की संतान पर कभी न कभी भारी मुसीबत आती ही है, अथवा जातक किसी बड़े संकट या आपराधिक मामले में फंस जाता है।
जब कालसर्प योग में राहु के साथ शुक्र की युति हो तो जातक को संतान संबंधी ग्रह बाधा होती है।
जब लग्न व लग्नेश पीड़ित हो, तब भी जातक शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान रहता है।
चंद्रमा से द्वितीय व द्वादश भाव में कोई ग्रह न हो। यानी केंद्रुम योग हो और चंद्रमा या लग्न से केंद्र में कोई ग्रह न हो तो जातक को मुख्य रूप से आर्थिक परेशानी होती है।
जब राहु के साथ बृहस्पति की युति हो तब जातक को तरह-तरह के अनिष्टों का सामना करना पड़ता है।
जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है।
जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
जब राहु के साथ शनि की युति यानी नंद योग हो तब भी जातक के स्वास्थ्य व संतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी कारोबारी परेशानियाँ बढ़ती हैं।
जब राहु की बुध से युति अर्थात जड़त्व योग हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी आर्थिक व सामाजिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
जब अष्टम भाव में राहु पर मंगल, शनि या सूर्य की दृष्टि हो तब जातक के विवाह में विघ्न, या देरी होती है।
यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में और राहु बारहवें भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक बहुत बड़ा धूर्त व कपटी होता है। इसकी वजह से उसे बहुत बड़ी विपत्ति में भी फंसना पड़ जाता है।
जब लग्न में राहु-चंद्र हों तथा पंचम, नवम या द्वादश भाव में मंगल या शनि अवस्थित हों तब जातक की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती। उसे प्रेत-पिशाच बाधा से भी पीड़ित होना पड़ सकता है।
जब दशम भाव का नवांशेश मंगल/राहु या शनि से युति करे तब संबंधित जातक को हमेशा अग्नि से भय रहता है और अग्नि से सावधान भी रहना चाहिए।
जब दशम भाव का नवांश स्वामी राहु या केतु से युक्त हो तब संबंधित जातक मरणांतक कष्ट पाने की प्रबल आशंका बनी रहती है।
जब राहु व मंगल के बीच षडाष्टक संबंध हो तब संबंधित जातक को बहुत कष्ट होता है। वैसी स्थिति में तो कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब राहु मंगल से दृष्ट हो।
जब लग्न मेष, वृष या कर्क हो तथा राहु की स्थिति 1ले 3रे 4थे 5वें 6ठे 7वें 8वें 11वें या 12वें भाव में हो। तब उस स्थिति में जातक स्त्री, पुत्र, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य का सुख प्राप्त करता है।


Shani Dev कि पूजा करते समय जाने किन बातों का रखे विशेष ध्यान



जानिए हमेशा बुरा नहीं होता कालसर्प योग 


ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यह कालसर्प योग व्यक्ति को शिखर तक भी ले जाता है। जब केन्द्र में राहु स्थित है तब यह अपनी अशुभता भूल जाता है और अच्छे फल प्रदान करता है। जब राहु केन्द्र में त्रिकोण भावों के स्वामी के साथ स्थित है तब यह राजयोगकारी हो जाता है और शुभ फल देता है। जब राहु त्रिकोण में स्थित होकर केन्द्र के स्वामी से संबंध बनाता है तब भी यह राजयोगकारी हो जाता है।


पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि राहु यदि मेष, वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, मकर, कुंभ में है तब भी अच्छा कहा जाता है विशेषकर मेष, वृष व कर्क का राहु।


यदि दशम भाव में राहु स्थित है तब व्यक्ति अपने कैरियर में शिखर तक पहुंचता है। तृतीय भाव में राहु स्थित होने से व्यक्ति कभी हार मानता ही नहीं है क्योंकि यहाँ राहु उसे सदा आगे बढ़ने को प्रेरित करता है।


राहु के बारे में एक भ्राँति यह भी है कि पंचम भाव में स्थित राहु संतान हानि करता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पंचम भाव का राहु एक पुत्र संतति भी प्रदान करता है। छठे भाव में स्थित राहु कभी शत्रुओं को जातक पर हावी नहीं होने देता है। इसलिए व्यक्ति को जीवन में बाधाएँ आती हैं, धन हानि होती है या अन्य कोई भी घटना घटती है तब उसका सारा दोष इस कालसर्प दोष पर नहीं थोपना चाहिए क्योंकि अगर ये बन रहा है तो आपका कर्म है और यदि इस योग में शामिल राहु या केतु की दशा आती है तब पूर्व जन्मों के संचित कर्मों के कारण आपको इसे भोगना भी पड़ेगा।

इन सरल उपायों द्वारा पाएं कालसर्प योग/दोष से मुक्ति .



  • ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि किसी जातक( व्यक्ति) को लगता है कि कालसर्प योग होता ही है और उसी के कारण उसे बाधा आ रही है तब आवश्यक नहीं कि उसके निवारण के लिए वह सिद्धवट,(उज्जैन), नारायणी शिला-हरिद्वार, पिचाश मोचनि कुंड- वाराणसी, ब्रह्म सरोवर- पुष्कर, काल हस्ती-तमिलनाडु, मातृ गया- गुजरात, बिहार के गया तीर्थ ओर कुरुक्षेत्र-हरियाणा स्थित सरोवर आदि स्थानों पर जाकर इसकी वैदिक विधि विधान से पूजा कराकर आए।

  • जैसा कि बताया गया है कि राहु साँप का मुख तो केतु पूँछ है और यह साँप भगवान शंकर के गले की शोभा बढ़ाता है, उनके गले का हार है इसलिए कालसर्प दोष का सर्वोत्तम उपाय शिव की पूजा-उपासना से बढ़कर कोई दूसरा नहीं हैं।

  • शिवलिंग पर नियमित जलाभिषेक से जातक को राहु के प्रकोप से राहत मिलती है।

  • व्यक्ति नियमित रूप से रुद्री पाठ कर सकता है, मासिक शिवरात्रि का उपवास रख सकता है। प्रतिदिन एक माला “ऊँ नम: शिवाय” की कर सकते है अथवा महामृत्युंजय मंत्र की एक माला नियमित रूप से करने पर भी व्यक्ति को राहत मिलती है।

  • इसके साथ साथ चंदन से बनी वस्तुओं का उपयोग करने से मन शांत होता है और भ्रम की स्थिति से व्यक्ति बचता है। शनिवार के दिन राहु के नाम का दान भी दिया जा सकता है विशेषकर जो कुष्ठ रोगी होते हैं उन्हें खाने-पीने की वस्तुएँ दान की जाएँ।

  • रात्रि में राहु के मंत्र की एक माला करने से भी राहु शांत होता है।

  • राहु की एक खासियत यह भी है कि जो व्यक्ति इसकी दशा/अन्तर्दशा में जितना भयभीत होता है यह ग्रह उसे और अधिक डराने का काम करते हैं।

  • इसलिए बिना डरे व्यक्ति को अपना कर्म करते रहना चाहिए और ईश्वर का भजन करना चाहिए।

  • यदि किसी बात को लेकर अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है तब किसी योग्य एवम अनुभवी ज्योतिषी से अवश्य परामर्श कर लेना चाहिए।


 


Vastu Tips :घर के मेन गेट पर करे ये उपाय जिससे घर से दूर हो जाएगी Negative Energy


पण्डित दयानन्द शास्त्री



-



सम्बंधित खबरें



खबरें स्लाइड्स में


खबरें ज़रा हट के