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जब स्वप्न में देखा त्रिजटा ने ये भयंकर दृश्य देखा जिसे कांप उठी



जब स्वप्न में देखा त्रिजटा ने ये भयंकर दृश्य देखा जिसे कांप उठी

त्रिजटा

डेस्क-रावण के भाई विभीषण की पत्नी गन्धर्व कन्या सरमा थीं। सरमा की पुत्री का नाम त्रिजटा था। जब रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था तो उन्हें अशोक वाटिका में रखा गया था। इस वाटिका में त्रिजटा को उनकी देखरेख के लिए नियुक्त किया गया था।रामायण में त्रिजटा का जिक्र बहुत बार हुआ है।



दोनों मां और बेटी ने माता सीता की बहुत मदद की थी। रामभक्त त्रिजटा हर मोड़ पे सीता का हौसला बनाए रखती थीं। एक बार त्रिजटा ने अपने स्वप्न में बहुत ही भयानक दृश्य देखा।
रामचरितमानस के सुंदरकांड में गोस्वामीजी ने लिखा है,,,,,
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥


उनमें एक त्रिजटा नाम की राक्षसी थी। उसकी श्री रामचंद्रजी के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान) में निपुण थी। उसने सबों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा- सीताजी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥


स्वप्न (मैंने देखा कि) एक बंदर ने लंका जला दी। राक्षसों की सारी सेना मार डाली गई। रावण नंगा है और गदहे पर सवार है। उसके सिर मुँडे हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥


भावार्थ:-इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो लंका विभीषण ने पाई है। नगर में श्री रामचंद्रजी की दुहाई फिर गई। तब प्रभु ने सीताजी को बुला भेजा॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥


मैं पुकारकर (निश्चय के साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार (कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गईं और जानकीजी के चरणों पर गिर पड़ीं॥उसने देखा की पूरी लंका धू-धू कर जल रही है। चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। उसने यह भी देखा की इस लंका को एक वानर उड़ उड़ कर जला रहा है। यह दृश्य देखकर वह सहम गई। बाद में उसने सभी राक्षसनियों को अपना स्वप्न सुनाया।

बाद में जब हनुमानजी सीता माता को ढूंढते-ढूंढते अशोक वाटिका पहुंचे तो उन्होंने माता सीता को राम की अंगूठी दी। फिर जब हनुमानजी लंका का दहन कर रहे थे तब उन्होंने अशोक वाटिका को इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि वहां सीताजी को रखा गया था। दूसरी ओर उन्होंने विभीषण का भवन इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि विभीषण के भवन के द्वार पर तुलसी का पौधा लगा था। भगवान विष्णु का पावन चिह्न शंख, चक्र और गदा भी बना हुआ था। सबसे सुखद तो यह कि उनके घर के ऊपर 'राम' नाम अंकित था। यह देखकर हनुमानजी ने उनके भवन को नहीं जलाया।


 


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