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पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुटरेजा के साथ इंटरव्यू



पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुटरेजा के साथ इंटरव्यू

पूनम मुटरेजा

 


1. मैं कुछ भी कर सकती हूं जैसे मनोरंजनपूर्ण शिक्षा शो कितनी लोकप्रिय और प्रासंगिक है?



उत्तर- यह प्रारूप मनोरंजन के मजबूत तत्व की वजह से विश्व स्तर पर लोकप्रिय साबित हुआ है. दर्शकों के लिए, सामाजिक संदेश के साथ यह पहला और सबसे महत्वपूर्ण मनोरंजन कार्यक्रम है. मैं कुछ भी कर सकती हूं (एमकेबीकेएसएच) के क्रिएटिव डायरेक्टर फिरोज अब्बास खान ने लगातार इस तथ्य को बनाए रखा है कि हमें पहले लोगों और उनकी आकांक्षाओं से जुड़ने की जरूरत है. तभी हमारे दर्शक कहानी और पात्रों के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित करते हैं, ताकि वे उन संदेशों को आत्मसात कर सके, जो उनके इर्दगिर्द बुने हुए हैं. तथ्य यह है कि एमकेबीकेएसएच का सीज़न 1 और 2 दूरदर्शन के राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, साथ ही 14 क्षेत्रीय चैनलों के साथ 216 ऑळ इंडिया रेडियो स्टेशनों पर प्रसारित हुआ और अब भारत के प्रीमियम स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म हॉटस्टार पर उपलब्ध है. ये इसकी दर्शकों के बीच लोकप्रियता और प्रासंगिकता दिखाता है.


 


2. सीरीज़ के विषय किस प्रकार और किस उद्देश्य से विकसित किए गए है?



उत्तर- मैं कुछ भी कर सकती हूं एक सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन के लिए संचार पहल है जो गहरे तक जड जमा चुके सामाजिक पूर्वाग्रहों और मानदंडों को चुनौती देते है. ये पूर्वाग्रह समाज में महिलाओं की स्थिति को प्रभावित करते हैं और परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण को प्रभावित करते हैं. इसमें उन युवा लड़कियों और महिलाओं की कहानी है, जिनके जीवन विकल्प उनके हाथों में नहीं हैं. यह दिखाता है कि क्यों सामाजिक परिवर्तन महत्वपूर्ण है, न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि पुरुषों के लिए भी. सीजन 1 में बाल विवाह, लिंग पहचान, गर्भावस्था के दौरान देखभाल और परिवार नियोजन के मुद्दों को शामिल किया गया था. सीजन 2 में किशोरावस्था स्वास्थ्य पर मजबूत ध्यान दिया गया. सीजन 3 में, एमकेबीकेएसएच अच्छे स्वास्थ्य साधनों के रूप में स्वच्छता और स्वच्छता प्रथाओं को अपनाने वाले समुदायों और युवाओं द्वारा यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बेहतर पहुंच को दिखाने के लिए संदेश देता है. सिरीज का विषय हमारे देश की बदलती जरूरतों के साथ विकसित हुआ है, खासकर युवाओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए.


3. सामाजिक परिवर्तन के लिए टेलीविजन कार्यक्रमों का उपयोग कैसे किया जा सकता है?



उत्तर-टेलीविजन एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है और भारत में, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में इसके व्यापक दर्शक है. मैं कुछ भी कर सकती हूं (एमकेबीकेएसएच) के दर्शकों ने अपनी कहानी और पात्रों के साथ बहुत करीबी संबंध विकसित किया है. हमारे पास ऐसे कई उदाहरण है, जहां इस कार्यक्रम से प्रेरित हो कर देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों के लोग सोशल चैंपियन बने है. साथ ही, हमने रेडियो, सामुदायिक आउटरीच और डिजिटल मीडिया के माध्यम से कार्यक्रम पहुंच का विस्तार किया है. ये विस्तार न केवल टीवी ड्रामा के संदेशों को मजबूत करते हैं बल्कि दर्शकों के साथ जुड़कर और बातचीत करके उन्हें आगे भी बढ़ाते हैं.


4. एमकेबीकेएसएच की प्रमुख उपलब्धियों के बारे में आप क्या सोचते हैं?



उत्तर- कार्यक्रम का उद्देश्य महिला अधिकारों, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले मुद्दों, इन पर सामाजिक मानदंडों, दृष्टिकोणों और प्रथाओं को बताना और समाधान देना है. मैं चेंज के असली नायकों की कहानियों पर विचार करता हूं, जो हमारे कार्यक्रम की सफलता के वास्तविक हीरो है. मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के नयागांव गांव की एक लड़की अपने माता-पिता को कॉलेज भेजने और स्कूल के बाद शादी नहीं करने के लिए मना कर सकी, बिहार की एक युवा महिला अपने समुदाय में जल्दी-जल्दी बच्चा पैदा करने से मना कर के चैंपियन बन गई है, मध्यप्रदेश के एक गांव के एक पुरुष पत्नी को मारने की जगह परिवार नियोजन में पुरुष भागीदारी के चैंपियन बन गए. ऐसी कई और कहानियां हमारी धारणा को मजबूत करती हैं कि कार्यक्रम उन लोगों के साथ गहरा संबंध बनाता है, जो अंडरसर्व्ड है और जिन्हें चेंज एजेंट बनने के लिए शक्तिशाली कहानियों की आवश्यकता है.


5. एमकेबीकेएसएच के पहले दो सीजन ने क्या बदलाव किए और आप सीज़न 3 के लिए अलग क्या कर रहे हैं?



उत्तर- एमकेबीकेएसएच मनोरंजन पर ध्यान देते हुए, वास्तविक जीवन और सामाजिक गतिशीलता पर रिसर्च करता है. भले ही कथा काल्पनिक हो, सिरीज में हम जो समाधान दिखाते हैं, वे वास्तविक होते है. ऐसे लोगों की कहानियों पर आधारित होते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में बदलाव किए हैं या पितृसत्ता, भेदभाव और पूर्वाग्रहों का सामना करते हुए अद्वितीय समाधान दिए हैं. यह सिरीज को असली जीवन और वास्तविकता का एहसास देता है. सीजन 3 में, हम भारत की युवा आबादी तक पहुंचना चाहते हैं. इसलिए, हमारे पास टेलीविज़न नाटक के साथ डिजिटल मीडिया पर बड़ा फोकस है. विश्व स्तर पर अपनी तरह के पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संचालित चैटबॉट पर डॉ स्नेहा डिजिटल अवतार में दिखाई देंगी. वे सवालों के जवाब देंगी और दर्शकों के साथ जानकारी साझा करेंगी. अब हम डिजिटल स्पेस पर भी संदेश का विस्तार कर रहे हैं. कहानी पहले से कहीं अधिक मनोरंजक है और डॉ स्नेहा की यात्रा देश के चेहरे को बदलने (या इस नारे की तरह कि- देश का चेहरा बदल दूंगी) के लिए जारी है.


6. खुले में शौच, स्वच्छता और स्वच्छता से जुड़े सामाजिक मानदंड के बारे में आप क्या कहेंगे और कैसे सशक्त महिलाएं और समुदाय इस स्थिति को सुधारने में योगदान दे सकते है?



उत्तर- खुले में शौच के कारणों को समझने के लिए 2015 में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि खुले में शौच के कुछ प्राथमिक कारण थे. जैसे कई लोग घर के अन्दर या आसपास शौचालय होने को पवित्रता, स्वास्थ्य जैसे विश्वास व गलत धारणाओं से जोड कर देखते है. ओडी को महिलाओं के सामाजिककरण के लिए एक समय के रूप में माना जाता है. शौचालयों के उपयोग को महिलाओं के लिए अतिरिक्त काम माना जाता था कि उन्हें शौचालयों का उपयोग करने के लिए और खुद को साफ रखने के लिए अधिक पानी इकट्ठा करना होता है. शौचालयों के साथ संरचनात्मक समस्याएं भी थी और यह एक ऐसी आदत भी थी जिससे वे छुटकारा नहीं पा सके. सशक्त महिलाएं शौचालयों के उपयोग से जुडे मिथकों को दूर करने में मदद कर सकती हैं और सुनिश्चित करती हैं कि शौचालयों के उपयोग और रख-रखाव का काम परिवार के सभी सदस्यों का है. ऐसे कई उदाहरण हैं जहां सशक्त महिलाओं और समुदायों ने शौचालयों निर्माण का काम अपने हाथ में लिया है, जिससे इसका उपयोग और रख-रखाव सुनिश्चित किया जा सके ताकि कोई भी घर शौचालय से वंचित न हो और उनके क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति खुले में शौच न करे. (विशिष्ट उदाहरणों के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं और स्वच्छता पर पीडी स्टोरीज का उल्लेख कर सकते है).


7. लोग अक्सर उन सामाजिक मानदंडों पर सवाल करते हैं जहां महिलाओं को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए अपने घरों से बाहर निकल कर काम करने की इजाजत नहीं दी जाती है, लेकिन उन्हें खुले में शौच के लिए मजबूर किया जाता है? इस पर आप क्या कहेंगे?



उत्तर- एक अध्ययन से पता चला कि महिलाओं, विशेष रूप से घर की बहू, मानती हैं कि शाम में खुले में शौच के लिए जाने से उन्हें अपने ससुराल वालों (सास-ससुर) के नियंत्रण से कुछ समय बाहर रहने का मौका मिलता है. महिलाओं को सशक्त बनाना चाहिए ताकि वे अपने घरों से बाहर निकलने के लिए स्वतंत्र हों, चाहे काम के लिए या सामाजिककरण के लिए. ये इस तरह की प्रथाओं को खत्म करने के लिए पहला कदम होना चाहिए. यह अजीब बात है कि खुले में शौच के लिए जाने वाली महिला की सुरक्षा और गरिमा के बारे में नहीं सोचा जाता. हालांकि, यह सिर्फ महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा का सवाल ही नहीं बल्कि उनके स्वास्थय से भी जुडा मसला है. आइए, स्वच्छता प्रथाओं के माध्यम से अपने, पूरे परिवार और समुदाय के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के काम में पुरुषों को उनकी जिम्मेदारी से हटने न दे.


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