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छह साल बाद एक बार फिर कांग्रेस ने  दिल्ली की कमान शीला दीक्षित को  सौंपी



छह साल बाद एक बार फिर कांग्रेस ने  दिल्ली की कमान शीला दीक्षित को  सौंपी

 शीला दीक्षित

 


इस बीच दिल्ली कांग्रेस के तीन चार अध्यक्ष आये और चले गये।आखिरकार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी शीला दीक्षित पर विश्वास किया|


दिल्ली -शीला दीक्षित ने दिल्ली की सल्तनत पर 15 साल तक राज किया। लेकिन आम आदमी पार्टी की आंधी में उनकी सल्तनत ताश के पत्तों की तरह ढह गयी। ऐसा नहीं कि 15 साल में दिल्ली की कांग्रेस सरकार दिल्लीवासियों के लिये कुछ भी नहीं किया। लेकिन स्थानीय लोग 15 साल में कांग्रेस से ऊब गये थे। विकास तो दिल्ली के हर इलाके में था साथ ही कई घोटाले भी शीलाजी के नाम पर सुनाई देने लगे।


जिस शान से शीलाजी ने 15 साल तक दिल्ली का राजपाट संभाला उतनी तल्खी से दिल्लीवासियों ने उन्हें दिल्ली से रुखसत किया। लगभग छह साल बाद शीला दीक्षित को एक बार दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गयी है। इस बीच दिल्ली कांग्रेस के तीन चार अध्यक्ष आये और चले गये।आखिरकार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी शीला दीक्षित पर विश्वास किया।



उन्हें पता नहीं क्यों विश्वास है कि जिस दिल्ली में अजय माकन, अरविंदर सिंह लवली और जेपी अग्रवाल जैसे दिग्गज कांग्रेसी कांग्रेस की साख नहीं बचा पाये उसे शीला दीक्षित किस करिश्मे से वापस दिला पायेंगी। शीला दीक्षित की ताजपोशी के बाद ही उनके पुराने साथी जो अजय माकन, लवली और जेपी के आने से छिटक गये थे वापस प्रदेश कार्यालय में दिखने लगे हैं। शीला दीक्षित को दिल्ली की कमान ऐसे वक्त में सौंपी गयी है जब लोकसभा चुनाव बिल्कुल सिर पर है। ऐसे में शीला की किस्मत और करिश्मा ही दिल्ली में कांग्रेस की राजनीतिक हालात सुधार सकते हैं दिल्ली कांग्रेस पूर्व अध्यक्ष अजय माकन ने भी प्रदेश संगठन में जान फंूकने की काफी कोशिशें भी की लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं आया। माकन के नेतृत्व में कार्यकताआंे काफी धरना-प्रर्दशन भाजपा और दिल्ली सरकार के खिलाफ किये। लेकिन लोकसभा, विधानसभा और एमसीडी के चुनावों में जनता ने उन्हें दरकिनार कर दिया। बाद में शीर्ष नेतृत्व ने स्वेच्छा से पद छोड़ने की सलाह दे दी। माकन ने भी सेहत ठीक न रहने का कारण बता कर पद से किनारा कर लिया। अब यह देखना है कि शीला दीक्षित ऐसी कोैनी सी घुट््टी कार्यंकर्ताओं को पिलाती हैं जो मृतप्राय संगठन में जान पड़ जाये।


आज हालात यह हैं कि दिल्ली विधानसभा में एक भी कांग्रेसी विधायक नही ंहै। वही हालात सांसदों का है एक समय में दिल्ली के सातो सांसद कांग्रेस के होते थे लेकिन आज उनके खाते में शून्य है। इतना नहीं एमसीडी में भी कांग्रेस के पार्षदों में भारी कमी आयी है। वहीं एमसीडी के चुनाव में पहली बार उतरी आम आदमी पार्टी ने 50 वार्डों में जीत हासिल कर कांग्रेस की रही बची कमर तोड़ कर रख दी। नवजात आम आदमी पार्टी के हाथों कांग्रेस को शीलाजी के नेतृत्व में करारी हार का सामना करना पड़ा। उनकी पार्टी के मात्र सात विधायक ही बमुश्किल जीत सके। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस और भाजपा दोनों ही आम आदमी पार्टी को खास तवज्जो नहीं दे रहे थे। चुनावी विश्लेषक भी आप को दिो या तीन सीटें देने की बात कह रहे थे। लेकिन चुनाव परिणाम सामने आने पर दोनों ही राष्ट्रदलों के आंखों के आगे अंधेरा छा गया। आम आदमी पार्टी ेंके 28 विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे यह बात और है कि आम आदमी पार्टी ने बहुमत न होने पर कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बनायी। इससे कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता में आने से रोक दिया। भाजपा की मजबूरी यह थी वो संख्या बल से सात विधायक कम थी। आम को समर्थनदे कर कांग्रेस ने बीजेपी के सामने से थाली छीन ली।कांग्रेस की मंशा थी कि हर हाल में दिल्ली की सत्ता बीजपी से दूर रहे।



कांग्रेस ने वही किया जो एक बिल्ली करती है। बिल्ली जब दूध नहीं पी पाती तो पंजा मार कर लुढ़का देती है। भाजपा के शीर्ष नेता सिवाए खंभा नोचने के कुछ भी नहीं कर पाये। ये बात दीगर है कि कांगे्रस समर्थित केजरीवाल सरकार मात्र 49 दिनों तक ही चली। पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल ने यह कहते हुए विधानसभा भंग कर दी कि कांग्रेस सरकार को सही तरह से काम नहीं करने दे रही है। जनहित के कार्याें में अड़चने डाल रही है। इससे किसी को खुशी हुई हो या नहीं लेकिन बीजेपी की छाती में ठंडक पड़ गयी।


फिर से दिल्ली की सल्तनत हासिल करने के लिये भाजपा ने कमर कसनी शुरू कर दी। 2014 में एक बार फिर दिल्लीवासियों ने सरकार बनाने के लिये मतदान किया।इस बार भी दिल्लीवासियों ने आम आदमी पार्टी को भारी मतों से सरकार बनाने का मौका दिया। इस बार तो कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ हो गया और भाजपा के तीन ही विधायक बन पाये। 2013 से अब तक जितने भी चुनाव हुए हैं उनमें कांग्रेस की मिट्टी पलीत ही हुई है।


विनय गोयल 


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