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सेमिनार आयोजित



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हिंदी व्यंग्य उपन्यास का समकाल विषय पर संगीत नाटक अकादमी,गोमतीनगर,लखनऊ में बृहस्पतिवार को परिचर्चा का आयोजन हुआ जिसमें देश के युवा हिंदी व्यंग्य उपन्यासकारों और व्यंग्यकारों ने अपनी धाक जमाई।बताते चलें की व्यंग्य उपन्यास पर परिचर्चा का यह अपनी तरह का अनूठा कार्यक्रम था।कार्यक्रम की परिचर्चा में शामिल थे-मलय जैन (ढाक के तीन पात),अर्चना चतुर्वेदी (गली तमाशे वाली),बालेन्दु द्विवेदी (मदारीपुर जंक्शन),जमुना बीनी तादर (जब आदिवासी गाता है)शंखधर दुबे (ब्लॉगर-फ़र्ज़ीनामा),शशि पांडेय (चौपट नगरी अंधेर राजा)।कार्यक्रम का संचालन धीरज मिश्र ने किया।*



धीरज ने आते ही वक्ताओं से सीधे सवालों का बौछार किया।जैसे अभी हिंदी व्यंग्य उपन्यासो की कोई परंपरा क्यों नही बन पाई है?जबकि व्यंग्य लेखन निरंतरता में होता रहा है?इसका जवाब देते हुए मलय जैन ने कहा कि व्यंग्य उपन्यासों की एक सुदीर्घ परंपरा रही है।इस सम्बन्ध में अरुणाचल विश्वविद्यालय में हिंदी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर जमुना बीनी का कहना था कि व्यंग्य उपन्यासों की यह परंपरा सुदीर्घ भले ही न हो पर सुदृढ़ ज़रूर रही है।*



जब यह पूछा गया कि बहुत अधिक व्यंग्य लिखे जाने के बावजूद व्यंग्य को वह सम्मान और स्थान क्यों नहीं मिल रहा जो बाकी विधाओं को मिल रहा है?तो इस विषय में अर्चना चतुर्वेदी का कहना था कि व्यंग्य लेखन सबसे अधिक होने के बावजूद व्यंग्यकारों को वह सम्मान नहीं मिलता।शायद इसके लिए बाल पकने का इंतज़ार किया जाता है.हालांकि मलय का कहना था कि व्यंग्यकारों को सम्मान मिलता  रहा है.इसका सबसे बड़ा प्रमाण है राग दरबारी को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया जाना.*



यह पूछे जाने पर कि राग दरबारी का सच,ढाक के तीन पात और मदारीपुर जंक्शन से कितना अलग है?क्या तीनों का ज़मीन एक है या अलग?बालेंदु ने कहा कि राग दरबारी की ज़मीन हथियाई नहीं जा सकती लेकिन उसे उधार लिया जा सकता है.और हम दोनों ही लेखकों का सौभाग्य है कि हमारी ज़मीन बहुत कुछ वही है जो राग दरबारी की है-अर्थात ग्रामीण जीवन के विद्रूप की.जब यह पूछा गया कि क्या विद्रूपता केवल गाँव में है,शहरों में नहीं.तो बालेंदु का कहना था विद्रूपता दोनों जगह है.लेकिन उन्होंने जो जीवन देखा,जिया और महसूस किया है वह गाँव का जीवन है और बहुत कुछ बदलने के बाद वह आज भी बहुत कुछ वैसा ही है जैसा राग दरबारी के समय में था.बल्कि विद्रूपताएं और बढ़ गई हैं,शोषण के नए तरीके इज़ाद कर लिए गए हैं.पहले शोषण करने वाला बाहर से आता था,कैम्प लगाता था और अपना काम करके चलता बनता था.आज इन शोषक तत्त्वों के स्लीपर सेल गाँव में ही हैं.इसलिए इस शोषण का स्वरुप अधिक सघन,अधिक गहरा और अधिक व्यापक हो गया है.


अर्चना चतुर्वेदी ने 'गली तमाशे वाली' की ज़मीन का स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उनके उपन्यास की ज़मीन राग दरबारी से बिल्कुल अलग है और उन्होंने अस्सी से नब्बे के दशक के बीच के मथुरा के आम जन जीवन को उकेरा है।*



राजयसभा सचिवालय में उपनिदेशक के रूप में कार्य कर रहे शंखधर दुबे से जब पूछा गया प्राय: सरकारी-सिस्टम में काम करने वाले लोग व्यंग्य ही क्यों लिख रहे?क्या उनको अपने सिस्टम में व्यंग्य के लिए विद्रूप अधिक दिखता है.शंखधर दुबे ने शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त राजनीति को उदाहरणों के माध्यम से इस विद्रूप को बखूबी समझाया भी.उनका कहना था कि हम सभी क़ानून बनते देखते हैं लेकिन उसी कानून को जब ज़मीनी स्तर पर दम तोड़ते देखते हैं तो कष्ट होता है.व्यंग्य इसी पीड़ा से उपजता है. *



जब जमुना बीनी से पूछा गया कि उत्तर भारतीय समाज,पूर्वोत्तर भारत की अपेक्षा अधिक जटिल है.यहाँ की विद्रपतायें भी अधिक विस्तीर्ण हैं.फिर भी पूर्वोत्तर भारत में उत्तर भारत के सामाज को चित्रित करने वाले व्यंग्य उपन्यास बड़े चाव से पढ़े जाते हैं.वह कौन सी चीज़ है जो पूर्वोत्तर के पाठकों को इन रचनाओं की ओर आकर्षित करती है?जमुना का कहना था कि व्यंग्य की कोई भाषा और भौगोलिक सीमा नहीं होती.इसीलिये हमारे यहां भी हिंदी के व्यंग्य लेखक जैसे श्रीलाल शुक्ल,हरिशंकर परसाई,शरद जोशी आदि खूब पढ़े जाते हैं.शशि पांडे का कहना था कि साहित्यिक गुटबंदी ने साहित्य का सबसे ज़्यादा नुकसान किया है।उन्होंने भविष्य के व्यंग्य को लेकर आश्वस्त किया।और नए व्यंग्य लेखकों को मंच देने के लिए आयोजकों का आभार भी व्यक्त किया.



पूरे कार्यक्रम में वार्ताकारों ने सभी सवालों के सटीक और सधे हुए जवाब दिए।जिन पर श्रोताओं की खूब तालियां भी बजीं।शीला पांडेय सर्वेश अस्थाना,विजय राय,रामबहादुर मिश्र,महेंद्र भीष्म,विजय पुष्पम पाठक,दिव्या शुक्ल,नीरज अरोरा आदि गंभीर श्रोताओं ने भी बारी-बारी से वक्ताओं से सवाल पूछे।'अट्टहास' के संपादक अनूप श्रीवास्तव के इस सवाल का अब पहले की तरह धारदार व्यंग्य क्यों सामने नहीं आ रहा,बालेन्दु ने कहा कि व्यंग्य ओढ़ा नहीं जा सकता,व्यंग्य एक शैली है जिसे इंसान लेकर पैदा होता है।कबीर या प्रेमचंद बनते नहीं,पैदा होते हैं।व्यंग्य लिखने के लिए जीवन के यथार्थ से मुठभेड़ ज़रूरी है।व्यंग्य धारदार हो,इसके लिए ज़रूरी है कि इंसान जीवन के गहन अनुभवों से गुज़रे।प्रायोजित होकर असल व्यंग्य लिखा ही नहीं जा सकता।*


सर्वेश अस्थाना जी ने सवाल किया कि व्यंग्य उपन्यास और उपन्यास में क्या अंतर है.उस पर अर्चना ने जवाब दिया कि जब आपके पास केनवास बड़ा हो , कहानियाँ कई हों और आप पात्रों को लेकर पूरा माहौल रचते है तो उपन्यास बनता है जिसमें व्यंग्य आ सकता है। पर व्यंग्य तो विसंगतियों पर वार करने का हथियार है और आप जब लगातार अपनी भाषा और शिल्प के माध्यम से व्यंग्य पर प्रहार करते हुए साथ में कथा को और माहौल को रचते हैं ,जिसमें व्यंग्य पूरे उपन्यास के केंद्र में रहता है वह होता है व्यंग्य उपन्यास.


अंत में कार्यक्रम के सांस्कृतिक आयोजन की प्रमुख शीला पांडेय ने वक्ताओं को पुष्प भेंट किया और सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।*


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