aapkikhabar aapkikhabar

कागजों पर नहीं, धरातल पर मिटती है गरीबी



कागजों पर नहीं, धरातल पर मिटती है गरीबी

राहुल गांधी

 सियाराम पांडेय 'शांत'


कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बेहद सदाशयता भरी घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि वे भारत को अमीरों और गरीबों के बीच बंटने नहीं देंगे। अमीर और गरीब की खाई पाट देंगे। बहुत उम्दा विचार हैं, इस विचार का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन देश में अमीरी-गरीबी का अंतर बहुत बड़ा है। समानता का विचार कहने में तो अच्छा लगता है लेकिन उसे व्यावहारिक रूप देना लोहे के चने चबाने जैसा है। गरीबी मिटाने का विचार कांग्रेस में आज नया नहीं आया है। हर चुनाव में कांग्रेस गरीबी मिटाने का राग अलापती रही है लेकिन गरीबी तब मिटती है जब हर हाथ में काम हो।


साथ ही, उसका उचित दाम भी मिले। गरीबी मिटती है सतत प्रयास और पुरुषार्थ से। एक व्यक्ति के पुुरुषार्थ से एक अरब 35 करोड़ लोगों की गरीबी नहीं मिट सकती। सबको कार्य के लिए प्रेरित करना भी बड़ा पुरुषार्थ है लेकिन राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए प्रलोभनों के अंबार लगाते रहते हैं। इस मामले में नरेंद्र मोदी ने हर स्तर पर लोगों को प्रेरित करने का काम किया है । अगर यही काम कांग्रेस की सरकारों के दौर में हुआ होता तो आज भारत दुनिया का सबसे ताकतवर देश होता। 


कांग्रेस की सरकारों ने गरीबी उन्मूलन की कितनी योजनाएं बनाईं लेकिन कोई भी गरीबी नहीं मिटा पाई। ऐसे में यह कहना कि देश से अमीरी और गरीबी का फर्क मिट जाएगा, वचने किं दरिद्रता की भाव भूमि का ही द्योतन करता है। भारत में आज भी 42 करोड़ गरीब हैं। यह संख्या 26 अफ्रीकी देशों से एक करोड़ ज्यादा है। कांग्रेस ने गरीब तो हटाए नहीं, गरीबी रेखा की सीमा कागजों में जरूर हटा दी। गरीबी धरातल पर मिटनी चाहिए। कागज पर नहीं। 

योजना आयोग की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि 2००4-०5 से लेकर 2००9-1० के दौरान देश में गरीबी 7 प्रतिशत घटी है और गरीबी रेखा अब 32 रुपये प्रतिदिन से घटकर 28 रुपए 65 पैसे प्रतिदिन हो गई है। वर्ष 2००9-2०1० के गरीबी आंकड़े कहते हैं कि इन पांच सालों में देश में गरीबी 37.2 प्रतिशत से घटकर 29.8 प्रतिशत हो गई। मतलब शहर में 28 रुपए 65 पैसे प्रतिदिन और गांवों में 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता। यह चमत्कार कांग्रेस का था। अगर इसी तरह का चमत्कार करना है तो वह पलक झपकते किया जा सकता है। यह कुछ ऐसा चमत्कार है जिसमें करना कुछ नहीं, बदलना कुछ नहीं, पापुलरिटी ही मिलनी है। तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मनमोहनी फार्मूले के अनुसार शहरों में महीने में 859 रुपए 6० पैसे और ग्रामीण क्षेत्रों में 672 रुपए 8० पैसे से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं रह गया। क्या मौजूदा महंगाई के दौर में इतने कम में किसी भी व्यक्ति का खर्च चल सकता है। क्या कांग्रेस के सांसद, विधायक, मंत्री इतना वेतन, भत्ता लेकर जनसेवा करना पसंद करेंगे। उच्चतम न्यायालय में योजना आयोग ने 2००4-०5 में गरीबी रेखा 32 रुपये प्रतिदिन तय किए जाने संबंधी हलफनामा दायर किया था। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने योजना आयोग के तत्कालीन प्रमुख मोंटेक सिह अहलूवालिया को इस बावत चुनौती दी थी कि वे स्वयं 32 रुपये में एक दिन का खर्च चलाकर दिखाएं। विश्व बैंक ने एक रिपोर्ट दी थी कि वर्ष 2०13 में देश की 3० फीसद आबादी अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रही थी। आबादी का यह हिस्सा प्रति दिन 1.9० अमेरिकी डॉलर पैमाने के तहत आता है।

अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों की सर्वाधिक संख्या भारत में है । एक व्यक्ति या व्यक्ति समूह अगर अपनी दैनिक जीवन निर्वाह की आवश्यकताओं जैसे:- भोजन, वस्त्र की पूर्ति नहीं कर पाता तो वह गरीब है। गरीबी वास्तव में न्यूनतम आवश्यक पोषक स्तर नहीं मिलने के रूप में देखा जाता है। अगर ग्रामीण क्षेत्र में 24०० कैलोरी और शहरी क्षेत्र में 21०० कैलोरी प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति आपूर्ति नहीं हो रही है तो वह गरीब माना जाएगा। 

राहुल गांधी की न्याय योजना केवल देश के गरीबी रेखा के नीचे के केवल कुछ करोड़ लोगों को 72 हजार रुपये की न्यूनतम आय गारंटी देती है। समानता का सिद्धांत तो यह कहता है कि आर्थिक दृष्टि से देश में कोई भी बड़ा और छोटा न हो। कोई राजा न हो, कोई प्रजा न हो। इस तरह की स्थिति या तो बेहद आदर्श होती है या फिर अत्यंत अराजक क्योंकि उस स्थिति में सभी संपन्न होंगे। पैसा इफरात होगा तो व्यक्ति वैसे ही काम नहीं करता और जिसे बिना मेहनत के पैसा मिल जाएगा, वह काम तो करने से रहा। परिश्रम से अर्जित धन को अनावश्यक रूप से खर्च करने में संकोच होता है। आदमी सौ बार सोचता है लेकिन अगर पैसा अनुदान स्वरूप मिले तो उसका उपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा होता है। ऐसे में बहुत कुछ संभव है कि राहुल गांधी की न्यूनतम आय गारंटी योजना व्यक्ति को परिश्रम से दूर ले जाएगी। मुफ्त खाने और पाने की लगन व्यक्ति को कामचोर बना देती है। दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक फायदे के लिए कांग्रेस देश के धन को मुफ्त बांटना चाहती है। कांग्रेस को देश की गरीबी मिटाने की दिशा में आजादी के बाद से ही प्रयास शुरू कर देना चाहिए था। उसने कुछ प्रयास किए भी लेकिन उसमें देश में समान अर्थ व्यवस्था का सिद्धांत लागू करने जैसा संकल्प कभी नजर नहीं आया। राहुल गांधी अगर वाकई गरीबी मिटाना चाहते हैं या गरीबों की पीड़ा की अनुभूति करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी पूरी संपत्ति केंद्र सरकार को सौंप देनी चाहिए। सारे कांग्रेसी मंत्रियों, विधायक, सांसदों, पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्रियों की संपत्ति का उसी तरह राष्ट्रीयकरण करा देना चाहिए जैसा कि इंदिरा गांधी ने निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। कांग्रेस को इस तरह की पहल अपने घर से करनी चाहिए। किसी के पास कई-कई घर हैं और किसी की छत खुला आसमान है। इस विसंगति के रहते देश गरीब और अमीर में क्यों कर नहीं बंटेगा, विचार तो इस पर होना चाहिए। क्या गांधी परिवार अपनी संपत्ति देश के हवाले करना पसंद करेगा। क्या वह वे सभी कांग्रेसियों से इस तरह की पहल की अपील करेगा। दूसरा तरीका यह है कि कांग्रेस सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लेकर भारत में रहने वाले हर व्यक्ति की संपत्ति को राष्ट्रीय घोषित करवाए। यह कानून पास हो कि व्यक्ति उस संपत्ति का बस सीमित उपयोग कर सकता है। इसका लाभ यह होगा कि आवासीय जरूरतों के विकास के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण की जरूरत होगी ही नहीं। जो मकान पहले से ही बने हैं, उन्हीं से पूरे देश का काम चल जाएगा। सभी संपत्तियों का इस्तेमाल सरकार अपने स्तर से कर सकेगी। शायद इस स्थिति के लिए कांग्रेस ही तैयार न हो। 

कांग्रेस हमेशा गांधीवादी राजनीति की बात करती है और महात्मा गांधी तो संग्रह को पाप समझते थे। वे सीमित उपभोग की बात करते थे लेकिन उनके इन आदर्शों से सबक लेना क्या कांग्रेस को आज तक आ पाया है। फिर कांग्रेस अध्यक्ष भगवान श्रीकृष्ण के फार्मूले पर काम क्यों नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण से मिलने गरीबी सुदामा गए थे । उनसे दो मुट्ठी चावल लेकर कृष्ण ने उन्हें राजा बना दिया था। देवी रुक्मणि ने हाथ न पकड़ा होता तो वे खुद गरीब हो जाते। गरीबों को इस तरह देने का भाव क्या राहुल के पास है? अगर वे ऐसा करते हैं तो इसका संदेश भारत के जन-मन में जाएगा। लोग अपनी संपत्ति राष्ट्र के हवाले करने लगेंगे और तब उसे बांटकर लोगों को आर्थिक रूप से समानता प्रदान की जा सकेगी। संख्या के हिसाब से उस संपत्ति का एक अंश संबंधित नेता को भी मिल जाएगा। सच है कि भारत में अधिकांश लोगों के पास दो जून की रोटी का इंतजाम है और कुछ लोगों की सौ पीढ़ियों के ऐशो आराम का इंतजाम है। इस विसंगति के लिए इस देश की आर्थिक नीति जिम्मेदार है। 

 मोदी सरकार दावा कर रही है कि भारत 2०2० में विकसित देश बन जाएगा। आंकड़ों की रोशनी में यह बताने-जताने का प्रयास हो रहा है कि हम जल्द ही 1० प्रतिशत विकास दर हासिल कर लेंगे। इस मामले में जल्द ही चीन को पीछे छोड़ देने के दावे भी हो रहे हैं लेकिन इस देश में सबकी संपत्ति समान हो, यह बात किसी भी राजनीतिक दल के स्तर पर कही नहीं गई है। 

यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट बताती है बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और राजस्थान में गरीबी निरंतर बढ़ती जा रही है। गौरतलब है कि यूएनडीपी की नजर में गरीब का मतलब है कि वह परिवार जिसे हर रोज एक डॉलर से कम आमदनी पर गुजारा करना पड़ता है। आज के हिसाब से जिस परिवार की आमदनी 45 रुपये या उससे कम है। भारत के आठ राज्यों में रहने वाले गरीबों की हालत सबसे ज्यादा गरीब अफ्रीकी देश इथोपिया और तंजानिया में रहने वाले गरीबों जैसी है। 

 वित्त वर्ष 2००5-०6 से 2०15-16 के बीच के एक दशक में भारत में 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल गए हैं। इस समय देश की आबादी लगभग 135 करोड़ है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की कुल आबादी 1०4 देशों की कुल आबादी की एक-चौथाई है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में दस वर्ष में गरीब लोगों की संख्या घटकर आधी रह गई है, जो 55 फीसदी से घटकर 28 फीसदी हो गई है। भारत की गरीबी आज भी आंकड़ों के भ्रम जाल में उलझी हुई है। आजादी के 71 सालों में गरीब और गरीबी पर लगातार अध्ययन और खुलासा हुए हैं, लेकिन उनमें कभी भी एकरूपता नहीं रही। यहां दो रुपये किलो चावल गेहूं तो बेचा गया लेकिन गरीबों की आय बढ़ाने, उनके लिए जरूरी संसाधन विकसित करने पर जोर नहीं दिया गया।

मनरेगा के तहत साल में सौ दिन तो हमने काम दिया लेकिन 265 अन्य दिनों की बेरोजगारी पर विचार नहीं किया। विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि दुनिया में करीब 76 करोड़ गरीब हैं इनमें भारत में करीब 22.4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जिदगी गुजार रहे हैं। जितने अध्ययन हुए, उतनी ही रिपोर्ट आई और किसी में भी एकरूपता नहीं रही। मतलब जब अध्ययन ही सटीक नहीं है तो गरीबी कैसे दूर होगी? गरीबी मिटाना है तो अधिकारियों, कर्मचारियों की कार्यशैली पर नजर रखनी होगी। बिना इसके बात बनने वाली नहीं है। 

-



सम्बंधित खबरें



खबरें स्लाइड्स में


खबरें ज़रा हट के