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द्वारका मंदिर का A2Z कहाँ जाएं कैसे जाएं



द्वारका मंदिर का A2Z कहाँ जाएं कैसे जाएं

Dwarka temple

 


समुद्र में स्थित भेंट Dwarka द्वारका (गुजरात) में भगवान श्रीकृष्ण के श्री विग्रह के दर्शन करने के साथ साथ पूरे परिवार के दर्शन का सुखद सौभाग्य प्राप्त हुआ साथ ही


आज ( मंगलवार - 11 जून 2019) दोपहर 4 बजे से।


भेट का मतलब मुलाकात और उपहार भी होता हैं।द्वारका का कृष्ण मंदिर 500 वर्ष पुराना है। बेट द्वारका पहुँचने के लिए आपको ओखा पोर्ट जेट्टी पहुंचना पड़ता है जहां से आप नाव/स्टीमर/बोट द्वारा बेट द्वारका तक पहुँच सकते हैं जो लगभग 5 किमी. की दूरी पर स्थित है। इस प्राचीन मंदिर का निर्माण वल्लभाचार्य ने किया था तथा इसके गर्भगृह में जो मूर्ति स्थपित है, कहा जाता है कि उसे रुक्मिणी ने बनाया था।


एक अन्य किवदंती के अनुसार कृष्ण के सच्चे मित्र सुदामा जब द्वारका आये तो उन्होंने कृष्ण को भेंट स्वरुप पोहे दिए क्योंकि उनके पास भगवान को देने के लिए कुछ नहीं था। आज भी यहाँ आने वाले भक्त यहाँ रहने वाले ब्राह्मणों को पोहे दान करते हैं।


यह हिन्दुओं के साथ सर्वाधिक पवित्र तीर्थों में से एक तथा चार धामों में से एक है। यह सात पुरियों में एक पुरी है। जिले का नाम द्वारका पुरी से रखा गया है जीसकी रचना २०१३ में की गई थी। यह नगरी भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है। द्वारका भारत के सात सबसे प्राचीन शहरों में से एक है।



द्वारका स्थान परिचय:


द्वारका गुजरात के जामनगर जिले में स्थित एक पवित्र नगर है तथा प्रसिद्द हिन्दू तीर्थ स्थान है. पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने यहाँ पर शासन किया था, इसे भारत के कुछ अति प्राचीन तथा पवित्र नगरों में से एक माना जाता है तथा प्राचीन पुराणों के अनुसार इसे संस्कृत में द्वारावती कहा जाता था. ऐसा कहा जाता है की यह पौराणिक नगर भगवान श्री कृष्ण का निवास स्थान था. माना जाता है की समुद्री विध्वंश तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं की वजह से द्वारका अब तक छः बार समुद्र में डूब चुकी है तथा अभी जो द्वारका नगर उपस्थित है वह सातवीं बार बसाई गई द्वारका है. यह नगर भगवान श्री विष्णु के 108 दिव्य देसम में से भी एक है.


हिन्दू पुराणों के अनुसार द्वारका सात मोक्षदायी तथा अति पवित्र नगरों में से एक है. गरुड़ पुराण के अनुसार-


"अयोध्या,मथुरा, माया, कासी, कांची अवंतिका. पूरी द्वारावती चैव सप्तयिता मोक्षदायिकाः।।"


बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भगत नरसी की हुण्डी भरी थी। बेट-द्वारका के टापू का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मन्दिर है। इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते है। आगे बढ़ने पर गोमती-द्वारका की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े महल है। ये दुमंजिले और तिमंजले है। पहला और सबसे बड़ा महल श्रीकृष्ण का महल है। इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल है। उत्तर में रूक्मिणी और राधा के महल है। इन पांचों महलों की सजावट ऐसी है कि आंखें चकाचौंध हो जाती हैं। इन मन्दिरों के किबाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े हैं। भगवान कृष्ण और उनकी मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का सिंगार बड़ा ही कीमती है। हीरे, मोती और सोने के गहने उनको पहनाये गए हैं। सच्ची जरी के कपड़ों से उनको सजाया गया है।


काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की।अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए, लेकिन आज तक यह तय नहीं हो पाया कि यह वही नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बसाया था। आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं।


कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, पर राज उन्होने द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।



चौरासी धुना - भेंट द्वारका टापू में भगवान द्वारकाधीश के मंदिर से ७ कि॰मी॰ की दूरी पर चौरासी धुना नामक एक प्राचीन एवं एतिहासिक तीर्थ स्थल है। उदासीन संप्रदाय के सुप्रसिद्ध संत और प्रख्यात इतिहास लेखक, निर्वाण थडा तीर्थ, श्री पंचयाती अखाडा बड़ा उदासीन के पीठाधीश्वर श्री महंत रघुमुनी जी के अनुसार ब्रह्माजी के चारों मानसिक पुत्रो सनक, सनंदन, सनतकुमार और सनातन ने ब्रह्माजी की श्रृष्टि-संरचना की आज्ञा को न मानकर उदासीन संप्रदाय की स्थापना की और मृत्यु-लोक में विविध स्थानों पर भ्रमण करते हुए भेंट द्वारका में भी आये। उनके साथ उनके अनुयायियों के रूप में अस्सी (८०) अन्य संत भी साथ थें| इस प्रकार चार सनतकुमार और ८० अनुयायी उदासीन संतो को जोड़कर ८४ की संख्या पूर्ण होती है। इन्ही ८४ आदि दिव्य उदासीन संतो ने यहाँ पर चौरासी धुने स्थापित कर साधना और तपस्चर्या की और ब्रह्माजी को एक एक धुने की एकलाख महिमा को बताया, तथा चौरासी धुनो के प्रति स्वरुप चौरासी लाख योनिया निर्मित करने का सांकेतिक उपदेश दिया। इस कारण से यह स्थान चौरासी धुना के नाम से जग में ख्यात हुआ।


कालांतर में उदासीन संप्रदाय के अंतिम आचार्य जगतगुरु उदासिनाचार्य श्री चन्द्र भगवान इस स्थान पर आये और पुनः सनकादिक ऋषियों के द्वारा स्थापित चौरासी धुनो को जागृत कर पुनः प्रज्वलित किया और उदासीन संप्रदाय के एक तीर्थ के रूप में इसे महिमामंडित किया। यह स्थान आज भी उदासीन संप्रदाय के अधीन है और वहां पर उदासी संत निवास करते हैं। आने वाले यात्रियों, भक्तों एवं संतों की निवास, भोजन आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क रूप से चौरासी धुना उदासीन आश्रम के द्वारा की जाती है। जो यात्री भेंट द्वारका दर्शन हेतु जाते हैं वे चौरासी धुना तीर्थ के दर्शन हेतु अवश्य जाते हैं। ऐसी अवधारणा है कि चौरासी धुनो के दर्शन करने से मनुष्य की लाख चौरासी कट जाती है, अर्थात उसे चौरासी लाख योनियों में भटकना नहीं पड़ता और वह मुक्त हो जाता है।



श्री द्वारकाधीश मंदिर-एक परिचय:--


द्वारकाधीश का वर्तमान मंदिर सोलहवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था, जबकि मूल (ओरिजिनल) मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र राजा वज्र ने करवाया था. यह पांच मंजिला मंदिर चुने तथा रेत से निर्मित किया गया है. मंदिर के शिखर की ध्वजा प्रतिदीन पांच बार बदली जाती है. मंदिर के दो द्वार हैं स्वर्ग द्वार जहाँ से दर्शनार्थी भक्त प्रवेश करते हैं तथा दूसरा मोक्ष द्वार जहाँ से भक्त बाहर की ओर निकलते हैं. मंदिर से ही गोमती नदी का समुद्र से संगम देखा जा सकता है. मंदिर के अन्दर भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति है जिसे राजसी वैवाहिक पोषाक से प्रतिदीन सजाया जाता है.रुक्मणि देवी का मंदिर अलग से बनाया गया है जो की बेट द्वारका के रास्ते पर पड़ता है।


पंडित दयानंद शास्त्री 


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