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जानिए किस तरह से Mahakali ne रक्तबीज का संहार mahakali jayanti 2019 को



जानिए किस तरह  से Mahakali ne रक्तबीज का संहार mahakali jayanti 2019  को

Mahakali jayanti 2019

आज मनेगी माँ महाकाली जयंती Mahakali jayanti 2019 (23 अगस्त 2019 को)---


--लेखक - अरविंदर सिंह शास्त्री (मेरठ)..



इस वर्ष महाकाली जयंती 23 अगस्त 2019 के दिन मनाई जाएगी. मधु और कैटभ के नाश के लिये ब्रह्मा जी के प्रार्थना करने पर देवी जगजननी ने महाविद्या काली मोहिनी शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं. महामाया भगवान श्री हरि के नेत्र, मुख, नासिका और बाहु आदि से निकल कर ब्रह्मा जी के सामने आ जाती हैं इसी शुभ दिवस को महाकाली जयंती के रुप में मनाया जाता है। महाकाली जी


Mahakali jayanti 2019दुष्टों के संहार के लिए प्रकट होती हैं तथा दैत्यों का संहार करती हैं.


*ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघात्र्छूलं भुशुण्डीं शिर: शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वांगभूषावृताम्।*
*नीलाश्म धुतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौव्स्वपिते ह्वरौ कमलजो हन्तुं मधुंकैटभम्।।*


अरविन्दर सिंह शास्त्री ने बताया कि महाकाल पुरुष की शक्ति महाकाली है. शक्ति और शक्तिमान में अभेद है. यहीं अर्द्धनारीश्वर उपादना का रहस्य है. सृ्ष्टि से पूर्व इन्हीं का साम्राज्य रहता है. यहीं प्रथम स्वरुप है. आगमशास्त्र में इसे ही प्रथमा कहा गया है. महाकाली को अर्द्धरात्री के समान कहा गया है. महाकाली को प्रलय का रुप भी कहा गया है. इनके अनेक रुप है, अनेक भुजाएं हैं. महाकाली की प्रसन्नता इच्छाओं की पूर्ति करती है.


अरविन्दर सिंह शास्त्री ने बताया कि देवी संहार करने वाली है, प्रलय उनकी प्रतिष्ठा है. शव उनका आसन है.  उनकी चार भुजाएं संहार की मुद्रा में होती हैं नाश करने के लिये उनके हाथ में खडग है. अन्य एक हाथ में कटा हुआ मस्तक है, जो नष्ट होने वाली प्राणी का रुप है. तीसरे हाथ अभय मुद्रा में है. उनकी आराधना अभयदायक है.


ऐसा हैं माँ महाकाली का स्वरुप--


*महाकाली शव पर बैठी है, शरीर की आकृति डरावनी है. देवी के दांत तीखे और महाभयावह है. ऐसे में महाभयानक रुप वाली, हंसती हुई मुद्रा में है. उनकी चार भुजाएं है. एक हाथ में खडग, एक में वर, एक अभयमुद्रा मेम है. गले में मुण्डवाला है, जिह्वा बाहर निकली है, वह सर्वथा नग्न है. वह श्मशानवासिनी हैं. श्मशान ही उनकी आवासभूमि है. उनकी उपासना में सम्प्रदायगत भेद हैं. श्मशानकाली की उपासना दीक्षागम्य है, जो किसी अनुभवी गुरु से दीक्षा लेकर करनी चाहिए. देवी कि साधना दुर्लभ है.


जाने महाकाली की कथा को--Mahakali jayanti 2019


*शुंभ-निशुंभ दानव, महापराक्रमी दैत्य रक्तबीज को देवी के साथ युद्ध करने के लिए भेजते हैं. रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था की उसके शरीर की बूंद जहां भी गिरती थी वहां से एक नया रक्तबीज उत्पन्न हो जाता था अत: देवी जब भी रक्तबीज पर प्रहार करती तब उसके रक्त से कई सारे दैत्य रक्तबीज उत्पन्न हो जाते, तब मां भगवती के रूप में महाकाली का आगमन होता है और काली रक्तबीज का रक्त धरती पर गिरने से पहले ही उसे अपने मुख में ग्रहण कर लेती है इस प्रकार देवी काली ने रक्तबीज का संहार किया  तथा दैत्यों को मारकर देवताओं को उनके आतंक से मुक्ति किया. भगवती कालिका अर्थात काली के अनेक स्वरूप हैं इन्हें श्यामा, दक्षिणा कालिका (दक्षिण काली) गुह्म काली, कालरात्री, भद्रकाली, महाकाली आदि नाम से पुकारा गया है.


*काली दक्षिण काली च कृष्णरूपा परात्मिका ।*
*मुण्डमाला विशालाक्षी सृष्टि संहारकारिका ॥*
*स्थितिरूपा महामाया योगनिद्रा भगात्मिका ।*
*भगसर्पि पानरता भगोद्योता भागाङ्गजा ॥*
*आद्या सदा नवा घोरा महातेजाः करालिका ।*
*प्रेतवाहा सिद्धिलक्ष्मीरनिरुद्धा सरस्वती ॥*
*एतानि नाममाल्यानि ए पठन्ति दिने दिने ।*
*तेषां दासस्य दासोऽहं सत्यं सत्यं महेश्वरि ॥* 


*भावार्थः महाकाल बोले, हे  पार्वती ! उन देवी के नाम हैं-काली, दक्षिणकाली, कृष्णरूपा, परात्मिका, विशालाक्षी, सृष्टिसहारिका, स्थितिरूपा, महामाया, योगनिद्रा, भगात्मिका, भागसर्पि, पानरता, भगांगजा, भगोद्योता, आद्या, सदानवा, घोरा, महातेजा, करालिका, प्रेतवाहा, सिद्धलक्ष्मी, अनिरुद्धा, सरस्वती ।*


जो कोई उपरोक्त नामों को जपता है, मैं भी उसके वशीभूत हो जाता हूं । मैं स्वयं भी काली, कालहरा, कंकालबीज, काकरूपा, कलातीता व दक्षिणा तथा काली का ध्यान-जाप करता हूं ।


जाने और समझें महाकाली जयंती Mahakali jayanti 2019के महत्व को --


अरविंदर सिंह शास्त्री ने बताया कि महाकाली मां की उपासना करने से उनकी कृपा भक्तों पर सहज हो जाती है. मां कृपालु हैं इनकी शरण में आने वाला कोई खाली हाथ नहीं जाता. महाकाली जयंती के अवसर पर कहीं कहीं सुन्दर काण्ड के पाठ का भी आयोजन किया जाता है. महाकाली जयंती के अवसर पर श्री महाकाली मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ रहती है. भक्त महाकाली जयंती श्रद्धा के साथ मनाते हैं. सैकड़ों श्रद्धालु मां के दरबार में माथा टेकते हैं मंदिरों में यज्ञ एवं भंडारों का आयोजन किया जाता है.


*काली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्


*भैरवोवाच*


शतनाम प्रवक्ष्यामि कालिकाय वरानने ।
यस्य प्रपठनाद्वाग्मी सर्वत्र विजयी भवेत् ॥


*अथ स्तोत्रम्*


काली कपालिनी कान्ता कामदा कामसुन्दरी ।
कालारात्रिः कालिका च कालभैरव पूजिता ॥


क्रुरुकुल्ला कामिनी च कमनीय स्वभाविनी ।
कुलीना कुलकत्रीं च कुलवर्त्म प्रकाशिनी ॥


कस्तूरिरसनीला च काम्या कामस्वरूपिणी ।
ककारवर्णनिलया कामधेनुः करालिका ॥


कुलकान्ता करालस्या कामार्त्ता च कलावती ।
कृशोदरी च कामाख्या कौमारी कुलपालिनी ॥


कुलजा कुलमन्या च कलहा कुलपूजिता ।
कामेश्वरी कामकान्ता कुञ्जरेश्वरगामिनी ॥


कामदात्री कामहर्त्री कृष्णा चैव कपर्दिनी ।
कुमुदा कृष्णदेहा च कालिन्दी कुलपूजिता ॥


काश्यापी कृष्णमाता च कुलिशाङ्गी कला तथा ।
क्रीं रूपा कुलगम्या च कमला कृष्णपूजिता ॥


कृशाङ्गी किन्नरी कत्रीं कलकण्ठी च कार्तिकी ।
कम्बुकण्ठी कौलिनी च कुमुदा कामजीविनी ॥


कलस्त्री कीर्तिका कृत्या कीर्तिश्च कुलपालिका ।
कामदेवकला कल्पलता कामाङ्गवर्द्धिनी ॥


कुन्ता च कुमुदप्रीता कदम्बकुसुमोत्सुका ।
कादम्बिनी कमलिनी कृष्णानन्दप्रदायिनी ॥


कुमारीपूजनरता कुमारीगणशोभिता ।
कुमारीरञ्जनरता कुमारीव्रतधारिणी ॥


कङ्काली कमनीया च कामशास्त्रविशारदा ।
कपालखट्वाङ्गधरा कालभैरवरूपिणी ॥


कोटरी कोटराक्षी च काशीकैलासवासिनी ।
कात्यायनी कार्यकरी काव्यशास्त्र प्रमोदिनी ॥


कामाकर्षणरूपा च कामपीठनिवासिनी ।
कङिकनी काकिनी क्रीडा कुत्सिता कलहप्रिया ॥


कुण्डगोलोद्भवप्राणा कौशिकी कीर्तिवर्द्धिनी,
कुम्भस्तनी कलाक्षा च काव्या कोकनदप्रिया ।
कान्तारवासि कान्तिश्च कठिना कृष्णवल्लभा ॥


*फलश्रुति*


इति ते कथितम् देवि गुह्याद् गुह्यतरम् परम् ।
प्रपठेद्य इदम् नित्यम् कालीनाम शताष्टकम् ॥


त्रिषु लोकेषु देवेशि तस्यासाध्यम् न विद्यते ।
प्रातः काले च मध्याह्ने सायाह्ने च सदा निशि ॥


यः पठेत्परया भक्त्या कालीनाम शताष्टकम् ।
कालिका तस्य गेहे च संस्थानम् कुरुते सदा ॥


शून्यागारे श्मशाने वा प्रान्तरे जलमध्यतः ।
वह्निमध्ये च संग्रामे तथा प्राणस्य संशये ॥


शताष्टकम् जपेन्मंत्री लभते क्षेममुत्तमम्,
कालीं संस्थाप्य विधिवत्श्रुत्वा नामशताष्टकैः ।
साधकः सिद्धिमाप्नोति कालिकायाः प्रसादतः ॥ 


  *काली अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् जो मनुष्य इस काली अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का प्रातः मध्याह्न, सायं तथा रात्रि में सदैव पाठ करता है, उसके घर में काली का वास होता है । इस स्तोत्र के पाठकर्ता को जल, अग्नि, श्मशान, युद्धस्थल में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता । यदि काली की प्रतिमा स्थापित कर विधिवत इसका पाठ किया जाए तो साधक को काली की कृपा से सिद्धियां प्राप्त होती हैं।*


*महाकालीMahakali jayanti 2019का ध्यान करने से प्राणी भवबंधन मुक्त हो जाता है ।  वह निश्चित ही मोक्ष पाता है ।


*ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी , दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते।।


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