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वो दिन दूर नहीं ,जब पुरुषों को भी घर के काम में महिलाओं के साथ करना होगा काम



वो दिन दूर नहीं ,जब पुरुषों को भी घर के काम में महिलाओं के साथ करना होगा काम

House Wife

 


घरेलू महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन

 

 

इनदिनों दावोस(davos) में चल रहे वल्र्ड इकनॉमिक फोरम (World Economic Forum) में ऑक्सफैम(Oxfam) ने अपनी एक रिपोर्ट ‘टाइम टू केयर’ (Time To Care)प्रस्तुत की है, जिसमें उसने घरेलू औरतों की आर्थिक स्थितियों का खुलासा करते हुए दुनिया को चौंका दिया है।

 

वे महिलाएं(House Wife)  जो अपने घर को संभालती हैं, परिवार का ख्याल रखती हैं, वह सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक अनगिनत सबसे मुश्किल कामों को करती है। अगर हम यह कहें कि घर संभालना(House Keeping)  दुनिया का सबसे मुश्किल काम है तो शायद गलत नहीं होगा।

 

दुनिया में सिर्फ यही एक ऐसा पेशा है, जिसमें 24 घंटे, सातों (24x7) दिन आप काम पर रहते हैं, हर रोज क्राइसिस झेलते हैं, हर डेडलाइन को पूरा करते हैं और वह भी बिना छुट्टी के। सोचिए, इतने सारे कार्य-संपादन के बदलने में वह कोई वेतन नहीं लेती। उसके परिश्रम को सामान्यतः घर का नियमित काम-काज कहकर विशेष महत्व नहीं दिया जाता।

 

साथ ही उसके इस काम को राष्ट्र की उन्नति में योगभूत होने की संज्ञा भी नहीं मिलती। जबकि उतना काम नौकर-चाकर के द्वारा कराया जाता तो अवश्य ही एक बड़ी राशि वेतन के रूप में चुकानी पड़ती। दूसरी ओर एक महिला जो किसी कंपनी में काम करती है, निश्चित अवधि एवं निर्धारित दिनों तक काम करने के बाद उसे एक निर्धारित राशि वेतन के रूप में मिलती है। उसके इस कार्य को और उसके इस क्रम को राष्ट्रीय उन्नति ( जीडीपी ) में योगदान के रूप में देखा जाता है। यह माना जाता है कि देश के आर्थिक विकास में अमुक महिला का योगदान है। प्रश्न है कि घरेलू कामकाजी महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाता? घरेलू महिलाओं के  साथ यह दोगला व्यवहार क्यों?

 


ऑक्सफैम (Oxfam)के अनुसार भारत की महिलाएं (Indian Womans) और लड़कियां हर दिन 3.26 अरब घंटे घरेलू काम करती हैं। अर्थव्यवस्था (Indian Economy) में उनके योगदान को कीमत में आंका जाए तो यह सालाना 19 लाख करोड़ के करीब होगा, जो भारत के वार्षिक शिक्षा बजट (Annual Education Budget) 93 हजार करोड का चार गुना है।

 

ये रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि महिलाओं पर घरेलू काम का दबाव बेहद ज्यादा है। इस वजह से वे या तो कम घंटे का रोजगार करने को मजबूर हैं या फिर उन्हें नौकरी ही छोड़नी पड़ जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में ‘केयर टेकिंग’ के बोझ के चलते बेरोजगारी का प्रतिशत महिलाओं में 42 है, जबकि पुरुषों में यह मात्र छह प्रतिशत है।

 

Housewives को नहीं मिलता है Economic Growth का लाभ 

ऑक्सफैम इंडिया (Oxfam India) के सीईओ अमिताभ बेहर कहते हैं कि घरेलू महिलाओं और लड़कियों को आज की आर्थिक व्यवस्था का लाभ बहुत कम मिलता है। वो खाना बनाने, बच्चों को पालने, सफाई करने और बुजुर्गों की देखरेख में अरबों घंटे लगाती हैं। उनकी वजह से ही हमारी अर्थव्यवस्था, बिजनेस और समाज के पहिये चलते रहते हैं। इन औरतों को पढ़ने या रोजगार हासिल करने का पर्याप्त समय नहीं मिलता। इसके चलते वे अर्थव्यवस्था के निचले हिस्से में सिमट कर रह गई हैं।’ क्योंकि घर के लगभग सभी कामों का दायित्व एक महिला अपने ऊपर ओढ़ती है, फिर भी इस दृष्टि से नहीं सोचा जाता कि वह भी आर्थिक योगदान कर रही है। ऐसी महिलाएं घर की इनकम में सीधे कुछ नहीं जोड़ती, इसलिए उसके काम की कोई इकनाॅमिक वैल्यू नहीं समझी जाती।

 

जीडीपी(GDP)  के नाम से देश की दौलत का जो सालाना हिसाब लगाया जाता है, उसमें वही इनकम शामिल होती है, जिसमें पैसे का लेनदेन हुआ हो। यह कहने की जरूरत नहीं कि परिवार में एक हाउसवाइफ की क्या अहमियत होती है और उसके बिना समाज नहीं चल सकती, लेकिन उसके काम को अनउत्पादक समझ लिया जाना उसकी हैसियत को गिराता ही नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व और अस्मिता को भी खत्म कर देता है। घरेलू कामकाजी महिलाओं का घर की देखरेख एवं परिवार के भरण-पोषण का काम भले सहज दिखता हो,लेकिन बहुत जटिल, श्रमसाध्य एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम है, लेकिन विडम्बना देखिये कि परिवार के स्तर पर या जीडीपी के स्तर पर इसका कोई मूल्यांकन नहीं है।

 

इनदिनों हाऊसवाइफ के अस्तित्व को लेकर ऐसी व्यापक चर्चाएं हैं। Social Media  पर हाऊसवाइफ की सक्रियता से उन्हीं के बीच ऐसे प्रश्न उछलने लगे हैं कि क्या हाऊसवाईफ का परिवार, समाज और देश के प्रति योगदान नगण्य हैं? क्या हाऊसवाइफ का कोई आर्थिक अस्तित्व नहीं? क्या उसे आर्थिक निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं? क्या हाऊसवाइफ सिर्फ बच्चे पैदा करने और घर सँभालने के लिए होती हैं? क्यों हाऊसवाइफ का योगदान देश के विकास में एक पुरुष से कमतर आंका जाता हैं? हाउसवाइफ को उनके काम के बदले सैलरी का प्रावधान होना ही चाहिए|

 

ये और ऐसे अनेक प्रश्न है जिन पर न केवल देश में बल्कि दुनिया में जागरूकता (Awareness) का वातावरण बन रहा है। इस विषय ने नारी जागृति एवं महिला सशक्तीकरण के अभियानों को भी आंदोलित किया है। ऐसी चर्चाएं होना, एक सकारात्मक वातावरण घरेलू महिलाओं को लेकर बनना और सरकार की सोच में भी बदलाव आना निश्चित ही नारी के अस्तित्व को धुंधलकों से बाहर लाने का प्रयास कहा जायेगा। साथ ही भविष्य एक बड़ी चुनौतीपूर्ण समस्या पर समय रहते  मानसिकता को विकसित करने का वातावरण बनेगा।

 

हाउसवाइफ के घरेलू भूमिका और उसके आर्थिक मूल्यांकन का काम कई मोर्चों पर चल रहा है। हमारे देश में भी और बाहर भी। सन् 2004 में एक हाईकोर्ट कह चुका है कि हाउसवाइफ की कम से कम वैल्यू रुपयों में माहवार निश्चित होना चाहिए। केरल में हाउसवाइफ के लिये मासिक भत्ते की मांग भी सामने आ चुकी है। बांगलादेश के वित्तमंत्री का मानना है कि हाउसकीपिंग की वैल्यू तय की जानी चाहिए। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। हाउसवाइफ की वैल्यू तो निश्चित हो ही जायेगी लेकिन उससे बड़ा चिन्ताजनक प्रश्न हाउसवाइफ के अस्तित्व को ही समाप्त करने की मानसिकता से जुड़ा है।  

 

Housekeeping को नीची नजरों से देखा जाता है Swiden में 

 

स्वीडन(Swiden) के जर्नलिस्ट पीटर लेटमार्क ने लेख में ‘हाउसवाइफ होने का दाग’ में अनेक चिन्ताजनक स्थितियों को प्रस्तुत किया है। इस लेख में घरेलू कामकाम की जटिल होनी स्थितियों और उनमें निष्क्रिय होती महिलाओं की भूमिका को उठाया गया है। उनका यह लेख न्यूयार्क टाइम्स (Newyork times) में छपा है। स्वीडन और नाॅर्वे में हाउसवाइफ कहलाना बेइज्जती माना जा रहा है, महिलाएं हाउसकीपिंग से तौबा कर रही है। ऐसा अकेले स्वीडन नाॅर्वे में नहीं, भारत में भी हो रहा है। हालांकि यहां हाउसवाइफ अभी गायब नहीं हुई हैं और ऐसा होने में बरसों लग जायेंगे, लेकिन हाउसकीपिंग को अब पुराने जमाने की दकियानूसी मानकर नीची नजर से देखा जाता है। न्यू जेनरेशन की लड़कियां इसके लिए कतई तैयार नहीं है।

 

लिहाजा हम उन जटिल स्थितियों की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जहां हमारे लिये भी घरेलू काम-काज चुनौती बन कर प्रस्तुत होगा भले ही हम घरेलू महिलाओं के श्रम को आर्थिक मूल्य देने को तो तैयार हो जाये, लेकिन तब तक परिवार का यह महत्वपूर्ण सेक्टर खतरे में पड़ चुका होगा। हमें हाउसकीपिंग की जरूरत लगभग पहले जितनी है, बल्कि वह और बढ़ी है, उस बढ़ी जरूरत को पूरा करना हमारे लिये चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

 

हमें हाउसकीपिंग की वैल्यू तय करके उसकी इज्जत तो लौटानी ही होगी, साथ ही पुरुषों को इसके लिए आगे आना होगा। उन्हें घरेलू काम-काज में बराबर का हाथ बंटाना होगा। महिलाओं के इस एकाधिकार क्षेत्र को संतुलित करने के लिये पुरुषों को भी सहभागिता निभानी होगी। हमारे सामने स्वीडन का माॅडल है। वहां मर्दों को कई महीनों की पैटरनिटी लीव तो मिलती ही है, इसके लिए इंसेटिव भी दिए जाते हैं।

 

 

  (ललित गर्ग)


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