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पहले खुद लोगों को डिप्रेशन में डालेंगे फिर बोलेंगे भारत में डिप्रेशन

बॉलीवुड अर्थात फ़िल्मजगत ने अस्तित्व में आने के पश्चात से ही बड़े पैमाने पर लोगों को प्रभावित किया।

पहले खुद लोगों को डिप्रेशन में डालेंगे फिर बोलेंगे भारत में डिप्रेशन
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Bollywood 

'बॉलीवुड'

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परम्पराएँ हमेशा ही परिवर्तन की आखेट हुईं हैं। समय की पटरी पर कितने ही परिवर्तन किनारे खड़े परम्पराओं पर प्रहार करने को व्याकुल रहते हैं, बिना जाने बिना समझे कि इन परम्पराओं के अभ्युदय के पीछे मनुष्य की कितनी कठिन तपस्या है। आधुनिकता की आड़ में कितनी ही परम्पराएँ विलुप्त होती चली गईं। आज अमरिकी देशों के समक्ष भारत को तुच्छ कहने वाले तथाकथित भारतीय इस बात से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं कि पूरी पृथ्वी में सभ्यता का बीज सर्वप्रथम भारतवर्ष में आरोपित हुआ। जब संसार के अन्य भागों में लोग मनुष्य की श्रेणी में भी रखने योग्य नहीं थे तब भारतीय अपने खानपान, बोली-व्यवहार, चिकित्सा विज्ञान, भूगोल-खगोल, नैतिक मूल्यों और आध्यात्म में शीर्ष स्थान प्राप्त कर चुके थे। सिंधुघाटी सभ्यता की विशेषता इसका विराट और प्रामाणिक इतिहास है।

'नाट्यशास्त्र' भारत की प्राचीनतम पद्धतियों में से एक है। इसका ही आधुनिक रूप है बॉलीवुड। बॉलीवुड अर्थात फ़िल्मजगत ने अस्तित्व में आने के पश्चात से ही बड़े पैमाने पर लोगों को प्रभावित किया। अगर बात केवल मनोरंजन की होती तो दिक्क़त नहीं थी लेकिन एक बड़ा जन समुदाय इन फिल्मों को अपने जीवन से जोड़ने लगा। निर्माता निर्देशकों को इस बात का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए कि वे पर्दे पर जो भी दिखा रहे हैं उसका लोगों के सामान्य जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। वह समाज के लिए कितना सही है। एक बार देखी हुई फ़िल्म के गीत और पटकथा हमें यूँ याद रह जाते हैं, फ़िर जैसे जैसे हमारी वास्तविक परिस्थितियाँ उस फ़िल्म से मिलने जुलने लगती है हम वैसे वैसे ही गीत सुनने लगते हैं, नायक नायिकाओं को अपना आदर्श मानने लगते हैं। उनसा दिखना, बोलना, पहनना और रहना किशोरों को खूब भाता है। लेकिन फ़िल्मों के इस दौर का एक घातक दुष्प्रभाव हो रहा है। इस दुष्प्रभाव को एक प्रश्न सुलझा सकता है। आपने कभी कोई ऐसी फिल्म देखी है जिसका अंत बुरा हुआ हो? जैसे मुख्य नायक/नायिका का अंत में अलग हो जाना, पागल हो जाना या फ़िर... मर जाना। क्या आपने महसूस किया है ऐसे अंत हमें कितना विचलित छोड़ जाते हैं? क्योंकि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाला तत्व भाव है। वह वस्तुओं और परिस्थितियों को शीघ्र ही स्वयं से जोड़ लेता है। इसलिए सावधान रहना अनिवार्य है क्योंकि हम किसी भी नाटिका को नाटिका की तरह नहीं देखते, उसमें लिप्त होना निश्चित है।

बॉलीवुड में अधिकतर फिल्में प्रेम प्रंसग में बर्बाद होने, परम्पराओं के विद्रोह, घर परिवार में कलह और षड्यंत्रों को बढ़ावा देते रहे हैं। आजकल के टीवी सिरियल्स भी दौड़ में पीछे नहीं रहे। कहीं सास को तानाशाही करती हुई दिखाए जा रहे हैं तो कहीं बहू। शायद ही कोई ऐसा सीरियल बचा हो जिसे सास और बहू बैठकर एक साथ देख सकें।

९० की दशक में एक फ़िल्म आयी थी जिसने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। फ़िल्म का नाम था 'डर'। निःसन्देह उसमें शाहरुख खान ने अपने उत्तम अभिनय से दर्शकों का दिल जीता लेकिन समाज के एक बड़े युवा वर्ग को इस फ़िल्म ने गलत मार्ग प्रशस्त कर दिया। फिर रॉन्ग नम्बर द्वारा लड़कियों को परेशान करना, 'ना' सुनने के बावजूद उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाना, 'तू है मेरी किरण' ट्रेंड बन चुका था। इस दौर में फ़िल्म द्वारा फैलाया गया वह डर गली-गली तक पहुँचा।

२००५ में एक और फ़िल्म आयी 'अपहरण'। इस फ़िल्म ने कितने ही नवयुवकों को बुरी तरह भटका दिया। मध्यप्रदेश के एक जिले में चार नाबालिकों ने फिरौती के लिए अपनी ही बस्ती के एक बच्चे को अगवा कर लिया। जब बच्चा भागने की कोशिश करने लगा तो नाबालिकों ने उसके सिरपर ईंट से मारा, जिससे वह बेहोश हो गया। डरकर उन किशोरों ने उसे पानी से भरी टँकी में फेंक दिया जिससे बच्चे की मौत हो गयी। जाँच में उन्होंने अपहरण की बात स्वीकार की और यह बात कबूली कि उन्हें फ़िल्म देखकर यह आईडिया आया था।

ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जिन घटनाओं का बॉलीवुड से सीधा सम्बन्ध है। लेकिन मनोरंजन ने यहाँ इतना व्यापार फैला लिया है कि इसे हटाना असंभव प्रतीत होता है तबतक जबतक हम इसके किसी फ़िल्म की पटकथा के शिकार नहीं बन जाते।

क्या ज़रूरी है कि लड़के/लड़की को एक दूसरे के प्यार में तड़पता हुआ ही दिखाया जाए? क्या ज़रूरी है प्रेमियों को हताश/निराश दिखाया जाए? पहले खुद लोगों को डिप्रेशन में डालेंगे फिर बोलेंगे भारत में डिप्रेशन के मरीज सबसे ज़्यादा हैं। स्मरण रहे भारत में ही फिल्मजगत का सबसे बड़ा कारोबार भी है।

क्यों युक्तियाँ दे दी जाती हैं उस अपरिपक्व मस्तिष्क को जिसे परिणाम की गम्भीरता ज्ञात भी नहीं। क्यों भारत जैसे राष्ट्र में जहाँ वीर भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद, अब्दुल कलाम आज़ाद जैसे यशस्वी जन्म लेते हैं, वहाँ के किशोर बड़े होकर सलमान खान बनना चाहते हैं? और दुर्भाग्यवश बन भी रहे हैं।

अगर बॉलीवुड के पास भीड़ है तो उसे एक सकारात्मक उद्देश्य के लिए उपयोग करना चाहिए। इन फिल्मों के परिणामस्वरूप आज प्रेम-प्रसंग ही मनुष्य जीवन का ध्येय बन चुका है। अब समय आ चुका है कि मनुष्य को भावना का पुतला बताने के बजाए धैर्य का स्तम्भ बताया जाए। वह पर्दे का रोता गाता, जीवन से हारा हुआ किरदार नहीं, पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान जीव है। उसकी सृजनात्मक क्षमता भावनाओं के ज्वार-भाटा से कहीं अधिक ऊर्जावान है। मनुष्य के पास हर परिस्थिति से उबरने के गुण विद्यमान है। पँच महाभूतों के अलावा जीवन के लिए आवश्यक है तो बस एक सही उद्देश्य। बॉलीवुड में कई ऐसी फ़िल्में बनती हैं जिसका उद्देश्य किसी सम्प्रदाय विशेष की आस्था को आहत किए बिना थके-हारे हर तबक़े के लोगों को नई दिशा प्रदान करता है। लेकिन अधिकांशतः ऐसी फ़िल्में प्रचार और सफलता से वंचित रह जाती हैं। २०१० में ऐसी ही एक फ़िल्म आयी थी 'आई एम कलाम'। जिसमें मित्रता, समानता और लक्ष्य का सकारातमक सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है।

अंग्रेजों और मुगलों ने हमारी परंपराओं को 'अंधविश्वास' कहा क्योंकि वे इतने अँधे थे कि हमारे विश्वास को देख ही नहीं पाए। उनके द्वारा आरोपित हर विचारधारा बॉलीवुड में फलती-फूलती नज़र आती है। आधुनिकता सभ्यता को विस्थापित करने में सफल रही। लेकिन सभ्यता के इस पतन में ज्ञान का क्षय है, पूर्वजों की जमापूँजी का क्षय है, कर्तव्यों का क्षय है और क्षय है जीवन का।

© जया मिश्रा 'अन्जानी'

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