भारत की जिस पुरानी पद्धति योग और आयुर्वेदा को पहले विदेशों में तिरस्कार की नजर से देखते थे अब वही सहारा बना 

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 photo credit yoga journal 
कोरोना महामारी ने पिछले लगभग डेढ़ वर्षों में जिस व्यापक स्तर पर अपना विकराल रूप पूरे विश्व को दिखाया है वो पूरे विश्व को पुनः अपने रहन-सहन,खान-पान और जीवन जीने के तौर तरीकों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करने के साथ ही एक बार फिर भारतीय पुरातन जीवन पद्धति की ओर लौटने का खुला सन्देश भी देता है !

                   लार्ड मैकाले शिक्षा पद्धति और पाश्चात्य शैली को अपनाकर जिस तरह भारतीयों ने स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी उसकी मिसाल विश्व के किसी दूसरे देश में शायद ही मिले ! सबसे दुखद सत्य ये है कि इसका नतीजा ये हुआ कि जो भारतवर्ष सदियों पहले से अपने ऋषि मुनियों के द्वारा प्रदत्त ज्ञान की चरम सीमा तक पहुँच चुका था वही भारतवर्ष अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान-विज्ञान-और चिकित्सा-शास्त्र को भुलाकर अंग्रेजों के द्वारा फैलाये गए प्रपंचों के कारण ही हीन भावना से ग्रसित होकर और पाश्चात्य शैली को अपनाकर अपने को गौरवान्वित समझने लगा ! कटु सत्य तो ये है कि आज़ादी के बाद भी हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने इस ओर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया और वो स्वयं भी इसी शैली को अपनाकर खुद को अंग्रेजों का उत्तराधिकारी समझते रहे जिस कारण आम जनमानस भी उनका अनुसरण करके धीरे धीरे अपनी भारतीय जीवन शैली को पाश्चात्य शैली की ओर ले जाने में ही स्वयं में श्रेष्ठता अनुभव करने लगा ! इतना सब होने के बाद भी लाखों-करोड़ों भारतीय परिवारों ने आज तक कमोवेश भारतीय संस्कृति को काफी हद तक अपना रखा है किन्तु दुर्भाग्य से इस पुरातन भारतीय संस्कृति का अपमान करने में तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग ने कोई कसर नहीं छोड़ी और आज भी वो यदा कदा भारतीय जीवन पद्धति और उसकी प्राचीन संस्कृति का उपहास उड़ा कर अपने को प्रगतिशील समाज का संरक्षक समझने की भयंकर भूल करते रहते हैं !

                    पिछले लगभग डेढ़ वर्षों के कोरोना काल में जिस तरह संक्रमित व्यक्तियों को आक्सीजन की कमी के साथ ही अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए काढ़े और आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन करना पड़ा वो पाश्चात्य संस्कृति और उनकी द्वारा चलन में आई जीवनशैली पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करतीं है ! आजाद भारत में हम यदि गावों को छोड़ दें तो नगरीय क्षेत्रों में जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन किया गया है वो भविष्य में हमें किसी बड़े खतरे की ओर ले जाने का खुला संकेत है और आज कोरोना के इस कालखंड में हम सब उसे अनुभव भी कर रहे हैं ! विकास के नाम पर जिस तरह बरगद,पीपल,नीम,बांस इत्यादि के पेड़ों को काट कर सड़कों और भवनों का निर्माण किया गया और आज भी यह कार्य बंद नहीं हुआ है वो आने वाले समय में मानव के जीवन पर मंडराता सबसे बड़ा खतरा है !

इन सभी पेड़ों का औषधीय महत्व हमारे शास्त्रों में युगों पहले से वर्णित है किन्तु विकास की अंधी दौड़ में लगे राजनीतिज्ञ और उनका अनुसरण करती ना-समझ जनता शायद इस बात को समझ नहीं पा रही या फिर उन्हें जानबूझकर समझाया ही नहीं जा रहा ! इस महामारी के दौर में जिस तरह लोग आक्सीजन के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं उसकी जगह यदि हमने अपनी प्राकृतिक संसाधनों को संजोकर रखा होता तो शायद हमें ये दिन न देखने पड़ते क्योंकि हमारे पूर्वजों ने युगों पहले ही हमें बता दिया था कि बरगद,पीपल,नीम,बांस जैसे पेड़ आक्सीजन के प्राकृतिक भंडार हैं और इन्हें काटने से पाप लगता है अर्थात इन्हें काटने से हमारा जीवन खतरे में पड़ सकता है और इस बात को आधुनिक विज्ञान भी सत्य मान चुका है कि ये सभी पेड़ आक्सीजन के श्रोत हैं

                आक्सीजन के अलावा इस समय चारो तरफ काढ़ा पीने के चर्चे आम हैं यहाँ तक कि भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के द्वारा इसकी रेसिपी भी जारी की गयी है, जिसमे हर भारतीय घर के किचन में पहले से उपलब्ध तुलसी,दालचीनी,कालीमिर्च,मुनक्का,गुड व नींबू इत्यादि आयुर्वेदिक औषधियों से बने काढ़े को जीवन रक्षक बताया गया है और सभी भारतीय घरो में इसका नित्य प्रति सेवन भी हो रहा है साथ ही गुनगुने दूध में दिन में दो बार हल्दी डालकर पीने से रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने की बात भी कही गयी है जो आयुर्वेद के सिद्धांत के अनुसार पूर्णतया सत्य भी है किन्तु फिर प्रश्न ये उठता है कि भारतीय बाजारों में वर्षों से स्थापित और हर भारतीय घर की आवश्यकता बन चुके बूस्ट,होर्लिक्स,कॉम्प्लान जैसे उत्पाद जो अपने विज्ञापनों में ताकत बढ़ाने और रोगों से लड़ने के लिए शरीर को मजबूत बनाने का दावा करते थे क्या वो सब सिर्फ अपने उत्पाद को बेचने के लिए ही हम भारतीयों को मूर्ख बना रहे थे और अगर नहीं तो फिर इन उत्पादों का वर्षों से सेवन करने वाले लोग भी क्यों बीमार हो रहे हैं ? यहाँ तक कि इन तथाकथित इम्युनिटी बूस्टर उत्पादों का वर्षों से सेवन करने वाले हजारों लोगों की मृत्यु तक हो चुकी है ! इसके विपरीत कोरोना संक्रमित व्यक्तियों के द्वारा आयुर्वेदिक काढ़ा पीने और गर्म पानी में अदरक तुलसी,पुदीना,अजवाईन इत्यादि डालकर उसकी भाप लेने वाले ज्यादातर लोग कोरोना को मात देकर स्वस्थ जीवन बिता रहे हैं फिर वो चाहे एक सामान्य व्यक्ति हो या खुद डॉक्टर ही क्यों न हों ! इसका सीधा और साफ़ अर्थ यही निकलता है कि भारतीय संस्कृति और उसके वाहकों ने सैकड़ों-हजारों वर्षों से अपनाई जा रही आयुर्वेदिक चिकित्सा के द्वारा एक बार फिर ये सिद्ध कर दिया है कि उसके पास आयुर्वेद के रूप में एक ऐसा हथियार है जो किसी भी बीमारी अथवा महामारी से लड़ने में कारगर सिद्ध हो सकता है, अब सोंचना हमें है कि हम अपनी प्राचीन धरोहरों का तिरस्कार करके और हर जगह अंग्रेजों की नक़ल करने के साथ ही उनकी जीवनशैली अपनाकर आखिर क्या हांसिल कर पाये ?

                   कोरोना की ये दूसरी लहर सीधे मनुष्य के फेफड़ों पर वार कर रही है जिससे उसके फेफड़े कमजोर होने से साँस लेने में परेशानी होती है और इसीलिए अंततः उसे कृत्रिम मेडिकल आक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है किन्तु प्राकृतिक और मेडिकल आक्सीजन की कमी से जूझते सिस्टम के कारण समय पर आक्सीजन न मिल पाने से अंततः मरीज की मौत तक हो जाती है ! “भारतीय संस्कृति की पहचान आयुर्वेद” में फेफड़ों को मजबूत करने के लिए भी अनेकों उपाय युगों पहले से विध्यमान हैं जिसका उपयोग करने की सलाह आज वही डाक्टर और स्वयंभू बुद्धिजीवी दे रहे हैं जो आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति का वर्षों से उपहास करते आ रहे थे !

                           कोरोना महामारी में शरीर को स्वस्थ रखने के लिए “योग” का उपयोग भी आज हर व्यक्ति की दैनिक दिनचर्या में सम्मिलित हो चुका है फिर चाहे वो बौद्धिक वर्ग हो या फिर सामान्य नागरिक! ये आधुनिक विज्ञान भी मान चुका है कि यदि कोई व्यक्ति पीपल के वर्ष के नीचे बैठकर अनुलोम-विलोम या प्राणायाम जैसे योग करे तो उसके फेफड़े मजबूत होने के साथ ही श्वसन क्रिया भी सुचारू रूप से चलने लगती है भारतीय संस्कृति के द्वारा प्राप्त इस दुर्लभ विज्ञान “योग” को पुनः जन-सामान्य तक पहुँचाने में बाबा रामदेव का नाम आज देश के साथ ही विदेशों तक भी जाना-पहचाना जाता है ! योग के इस दुर्लभ महत्व को समझते हुए ही प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ में 177 देशों की मंजूरी मिलने के बाद योग को पूरे विश्व में प्रचारित प्रसारित करने का बीड़ा स्वयं उठाया और “संयुक्त राष्ट्र महासंघ” में सम्मिलित देशों की सर्व-सहमति लेकर प्रतिवर्ष “21 जून” को “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” घोषित किया,जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की उपलब्धियों में योग को भी गिना जाने लगा और अगले ही वर्ष 2015 से योग पूरे विश्व में भारत की पहचान बन चुका है ! ये भारत सरकार की ओर से उठाया गया एक ऐसा ऐतिहासिक कदम था जिसने भारतीय संस्कृति और उसके समृद्ध मूल्यों को विश्व में एक बार फिर पुनर्स्थापित करने में सफलता पायी, किन्तु दुर्भाग्य ये है कि जिस “योग चिकित्सा” के समर्थन में विश्व के लगभग सभी छोटे- बड़े देश थे उस योग के जनक देश “भारतवर्ष” में ही अनेकों विपक्षियों ने अपनी राजनीतिक स्वार्थपूर्ति के लिए इस पर भी प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये, दूसरी तरफ विश्व के अनेकों देशों ने योग के अनगिनत लाभों को पहचानकर इसका फायदा लेना शुरू कर दिया, जिनमे कुछ मुस्लिम देश जैसे सऊदी अरब, दुबई,बांग्लादेश,अफगानिस्तान और यहाँ तक की भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान भी शामिल हैं जबकि इसके उलट विरोध की राजनीति के चलते देश के अन्दर ही सूर्य नमस्कार की सुप्रसिद्ध 12 मुद्राओं और उसके संस्कृत मन्त्रों को लेकर एक वर्गविशेष में भ्रम व अराजकता फ़ैलाने का कुत्सित प्रयास किया गया किन्तु संयोग देखिये कि आज इसी “योग” के दम पर सभी लोगों को कोरोना जैसी महामारी से लड़ने की शक्ति प्राप्त हो रही है !

               “समय परिवर्तनशील होता है” इसीलिए जिस भारत की बौद्धिक सम्पदा और वेदों-पुराणों के द्वारा प्रदत्त ज्ञान-विज्ञान को विश्व में तिरस्कार की द्रष्टि से देखा जाता था आज संपूर्ण विश्व के साथ ही भारतीय मानव समाज भी पुनः उसी भारतीय संस्कृति की ओर आस भरी नजरों से देख रहा है, ये हर भारतीय के लिए अत्यंत गर्व का विषय होने के साथ ही एक शुभ संकेत भी है क्योंकि संपूर्ण विश्व में सिर्फ अकेली भारतीय संस्कृति ही ऐसी है जो युगों-युगों से संपूर्ण मानव सभ्यता को “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयासर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।” का मन्त्र देती आई है !   

लेखक- पं.अनुराग मिश्र “अनु”

                                                               स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक   

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