क्या घुसुरी त्रासदी बंगाल में अवैध शराब व्यापार की वापसी का संकेत है?

क्या घुसुरी त्रासदी बंगाल में अवैध शराब व्यापार की वापसी का संकेत है?
क्या घुसुरी त्रासदी बंगाल में अवैध शराब व्यापार की वापसी का संकेत है? कोलकाता, 30 जुलाई (आईएएनएस)। दिसंबर 2011 में दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर ब्लॉक के मगरहाट पुलिस क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले संग्रामपुर इलाके में एक बड़ी त्रासदी देखने को मिली थी। कड़ाके की ठंड के बीच शाम को मेथनॉल युक्त अवैध शराब के सेवन से 150 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। उसी दिन प्रारंभिक मृत्यु का आंकड़ा 143 बताया गया था, जो बाद में 172 हो गया था।

हालांकि, तब से, पश्चिम बंगाल में जहरीली शराब से संबंधित मौतें अत्यंत दुर्लभ हो गई हैं। संग्रामपुर हादसे के बाद अब तक दो घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन दोनों घटनाओं में से किसी में भी मरने वालों की संख्या संग्रामपुर में बताए गए आंकड़े के आस-पास कहीं नहीं थी।

सितंबर 2015 में पूर्वी मिदनापुर जिले के तमलुक उपमंडल के मोयना प्रखंड में 14 लोगों की मौत हुई थी। इस मामले में भी मेथनॉल युक्त शराब ने लोगों की जान ली थी।

इस तरह की ताजा घटना इस महीने हावड़ा जिले से सटे कोलकाता के मालीपंचघोरा थाना क्षेत्र के घुसुरी में हुई है, जिसमें अब तक 13 लोगों की जान जा चुकी है।

क्या घुसुरी त्रासदी नियमित रूप से जहरीली शराब से होने वाली मौतों के काले दिनों की वापसी का संकेत है? हालांकि, जिन लोगों को इस तरह की घटनाओं की विस्तृत जानकारी है, उन्हें लगता है कि मोयना या घुसूरी जैसे मामले इतना भी बड़ा संकेत नहीं है और वर्तमान शराब वितरण और राज्य आबकारी प्रणाली में ऐसा कुछ भी संकेत नहीं है कि ऐसी त्रासदी नियमित मामले होंगे। लेकिन साथ ही उनका कहना है कि अगर सत्ताधारी दल और पुलिस के वर्ग शराब संचालकों का बचाव नहीं करते हैं तो ऐसी छोटी-मोटी त्रासदियों से भी बचा जा सकता है।

वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य, जिनके पोर्टफोलियो में आबकारी विभाग आता है और सहकारिता मंत्री अरूप रॉय ने दावा किया है कि घुसूरी त्रासदी एक बार की घटना है और राज्य में शराब के खतरे का कोई पुनरुत्थान नहीं होगा। अरूप रॉय ने कहा, बेशक, एक भी मौत सही नहीं है। प्रशासन को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि घुसुरी त्रासदी में अपराधियों से यथासंभव सख्ती से निपटें। यदि कोई पुलिसकर्मी इसमें शामिल है, तो उसे भी बख्शा नहीं जाएगा।

आबकारी विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी करुणामय बसु ने बताया कि क्यों संग्रामपुर त्रासदी के बाद पश्चिम बंगाल में शराब का कारोबार एक लाभदायक उद्यम नहीं रह गया है। उन्होंने कहा, उत्पाद की मांग के कारण एक व्यवसाय फलता-फूलता है। अवैध शराब व्यापार उन राज्यों में फलता-फूलता है, जहां शराबबंदी लागू है या उन राज्यों में सस्ती लेकिन अधिकृत देशी शराब की सप्लाई चेन पर्याप्त नहीं है। कुल मिलाकर शराबबंदी वाले राज्यों में यह एक सुरक्षित विकल्प है और राज्यों में अधिकृत देशी शराब की उचित आपूर्ति श्रृंखला के बिना एक सस्ता विकल्प बन जाता है।

उन्होंने बताया कि दिसंबर 2011 की त्रासदी के बाद, राज्य सरकार ने शराब की समस्या का मुकाबला करने के लिए तीन काम किए। पहला राज्य के दूर-दराज के इलाकों में भी अधिकृत देशी शराब के आपूर्ति नेटवर्क को प्रभावी ढंग से बढ़ाना था, जिससे एक तरफ राज्य सरकार के लिए अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हुआ और दूसरी ओर सफलतापूर्वक शराब की मांग को पूरा किया गया।

उन्होंने कहा, दूसरा, आबकारी और पुलिस विभागों ने कुछ बचे हुए अवैध कारोबार की जांच करने और निर्मित अवैध शराब को नष्ट करने के लिए नियमित तौर पर छापेमारी शुरू कर दी। अंत में, आबकारी विभाग ने स्थानीय महिलाओं के बीच अपना खुद का खुफिया नेटवर्क बनाया, जो नियमित रूप से किसी भी नए अवैध शराब निर्माण के बारे में जानकारी देते थे।

उन्होंने आगे कहा, उसी समय, आबकारी विभाग ने राज्य के इन दूरदराज के इलाकों में अनधिकृत मेथनॉल आपूर्ति के रास्ते भी बंद कर दिए। फिर भी कुछ संचालकों ने अपना व्यवसाय जारी रखा, लेकिन उनका व्यापार मुख्य रूप से वहीं तक ही सीमित था, जहां देशी शराब आपूर्ति नेटवर्क के विस्तार की प्रक्रिया को पूरा किया जाना बाकी था, जैसा कि सितंबर 2015 में पूर्वी मिदनापुर जिले के मोयना के मामले में हुआ था। जहां तक घुसुरी का सवाल है, मैं टिप्पणी करने में असमर्थ हूं, क्योंकि मैं अब सेवा में नहीं हूं।

पश्चिम बंगाल में पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक नजरूल इस्लाम के अनुसार, हालांकि अवैध शराब निर्माता अब राज्य में कम हो सकते हैं, मगर वे तब तक संचालित नहीं हो सकते हैं, जब तक कि ऑपरेटरों को सत्ताधारी पार्टी के नेताओं और स्थानीय लोगों के एक वर्ग के संरक्षण प्राप्त न हो। उन्होंने कहा, घुसुरी त्रासदी के बारे में मुझे जो भी पता है, वह यह है कि वहां अवैध शराब कारोबार के प्रमुख संचालक प्रताप करमाकर के स्थानीय सत्तारूढ़ दल के नेताओं के साथ बेहद करीबी संबंध रहे हैं। साथ ही, यह मालीपंचघोरा पुलिस स्टेशन से बेहद करीब हो रहा था। क्या स्थानीय पुलिस की जानकारी के बिना करमाकर के लिए इसे संचालित करना संभव था? इसलिए, मेरी राय में प्रशासन को दोषी पुलिस कर्मियों के बारे में समान रूप से सख्त होना चाहिए।

--आईएएनएस

एकेके/एएनएम

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