भारत की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू अब रायसीना की दौड़ में

भारत की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू अब रायसीना की दौड़ में
भारत की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू अब रायसीना की दौड़ में रांची, 21 जून (आईएएनएस)। भाजपा ने मंगलवार को झारखंड की पूर्व राज्यपाल और आदिवासी नेता द्रौपदी मुर्मू को 18 जुलाई को होने वाले चुनाव के लिए विपक्षी उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के खिलाफ राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार चुना है।

ओडिशा की रहने वाली द्रौपदी मुर्मू देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए चुनाव लड़ने वाली पहली महिला आदिवासी नेता बन गई हैं। इससे पहले वह देश की पहली आदिवासी महिला राज्यपाल होने का रिकॉर्ड भी रखती हैं।

झारखंड की राज्यपाल के रूप में उनका 6 साल से अधिक का कार्यकाल न केवल गैर-विवादास्पद रहा, बल्कि यादगार भी रहा। अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद वह 12 जुलाई, 2021 को ओडिशा के रायरंगपुर जिले स्थित अपने गांव से झारखंड राजभवन के लिए निकली थीं और तब से वहीं रह रही हैं।

रांची से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक हरिनारायण सिंह ने बताया कि 2017 में राष्ट्रपति पद के लिए द्रौपदी मुर्मू के नाम पर भी चर्चा हुई थी।

द्रौपदी को राज्यपाल के रूप में छह साल से अधिक का समृद्ध अनुभव है। उनकी उम्मीदवारी से भाजपा कई तरह से पूरे देश को सांकेतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है।

शीर्ष पद के लिए उनका चयन भी आदिवासी समाज में पैठ बनाने की भाजपा की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जो अब तक कांग्रेस का गढ़ रहा है। भाजपा आगामी राज्य विधानसभा चुनावों पर नजर गड़ाए हुए है। गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय इसका मुख्य फोकस बिंदु है, जहां आदिवासियों के वोट पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

दौपदी मुर्मू ने 18 मई, 2015 को झारखंड की राज्यपाल के रूप में शपथ लेने से पहले दो बार विधायक और एक बार ओडिशा में मंत्री के रूप में कार्य किया था। राज्यपाल के रूप में उनका पांच साल का कार्यकाल 18 मई, 2020 को समाप्त होना था, लेकिन एक साल और बढ़ा दिया गया था, कोविड महामारी के चलते नए राज्यपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई थी।

वह आदिवासी मामलों, शिक्षा, कानून व्यवस्था और झारखंड के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों से हमेशा अवगत थीं। कई मौकों पर उन्होंने राज्य सरकारों के फैसलों पर सवाल उठाया, लेकिन हमेशा संवैधानिक गरिमा और शालीनता के साथ। विश्वविद्यालयों की पदेन कुलाधिपति के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान राज्य के कई विश्वविद्यालयों में कुलपति और प्रति-कुलपति के रिक्त पदों पर नियुक्ति हुई थी।

विनोबा भावे विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. शैलेश चंद्र शर्मा याद करते हैं कि उन्होंने खुद राज्य में उच्च शिक्षा से संबंधित मुद्दों पर लोक अदालतों का आयोजन किया, जिसमें विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों के लगभग 5,000 मामलों का निपटारा किया गया। उन्होंने राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में नामांकन प्रक्रिया को केंद्रीकृत करने के लिए कुलाधिपति का पोर्टल बनाया।

20 जून, 1958 को ओडिशा में एक साधारण संथाल आदिवासी परिवार में जन्मीं दौपदी मुर्मू ने 1997 में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। वह 1997 में रायरंगपुर में जिला बोर्ड की पार्षद चुनी गईं। राजनीति में आने से पहले उन्होंने श्री अरबिंदो इंटीग्रल एजुकेशन एंड रिसर्च, रायरंगपुर में मानद सहायक शिक्षका के और सिंचाई विभाग में कनिष्ठ सहायक के रूप में रूप में काम किया। वह ओडिशा में दो बार विधायक रही हैं और नवीन पटनायक सरकार में मंत्री के रूप में काम करने का भी मौका मिला, जब भाजपा बीजू जनता दल के साथ गठबंधन में थी।

द्रौपदी मुर्मू को ओडिशा विधानसभा द्वारा सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए नीलकंठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

--आईएएनएस

एसजीके/एएनएम

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